''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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महावीर वचनामृत-६

>> Tuesday, February 2, 2010

(46)

हो जैसा अभ्यास तो, वैसा बनता भाव।
नेक जनों का संग हो,तो कैसा पछताव।।

(47)
जिसे मृत्यु का भय नहीं, वह दुर्लभ इनसान।
भोगी ही भयगस्त है, करते संत बखान।।

(48)
ज्ञान-शरण जो भी गया, उसका बढ़ा विवेक।
नैतिक, तप, संयम सभी, पा लाखों में एक।।

(49)
मेरा मत केवल सही, बाकी सब बेकार।
वे निंदा के पात्र हैं, जिनके तुच्छ विचार।।

(50)
सबकी अपनी सोच है, सबके अपने कौल।
नीर-झीर करते रहो, तुम बातों को तौल।।

(51)
तरह-तरह के पंथ हैं, सबके अपने कथ्य।
उसने ही नव-पथ गढ़ा, जिसने पाया सत्य।।

(52)
अगर अधर्मी जीव है, कभी नहीं सुख पाय।
बिन पानी के कुंड की, कैसे प्यास बुझाय।।

(53)
तनिक रहे अभिमान तो, नहीं मिलेगा बोध।
विनय जगे तो उस घड़ी, नष्ट काम अरु क्रोध।।

(54)
इक दिन सबका अंत है, ज्ञानी, राजा, रंक।
जो मानव हित में मरे, मिले मोक्ष नि:शंक।।

(55)
सबकी जो निंदा करे, सदा रुष्ट,भयभीत।
वह मनुष्य कमजोर है, कौन करेगा प्रीत।।

3 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari February 2, 2010 at 4:20 PM  

आभार आपका.

योगेश स्वप्न February 3, 2010 at 5:07 AM  

anmol , anupam , ati sunder.

संजय भास्कर March 1, 2010 at 6:18 AM  

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

सुनिए गिरीश पंकज को

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