''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

दस वासंती दोहे

>> Thursday, February 4, 2010

(१)

अधरों पर मुस्कान लख,
हुआ दुखों का अंत,
लगा पास फिर आ गया,
भटका हुआ वसंत.
(२)
मन में थी दुःख की लहर,
मौसम दिखा उदास,
खुशियाँ जन्मी तो लगा,
चौतरफा मधुमास.
(३)
तुमने जब-जब भी छुआ,
भागा हर संताप,
मौसम भी हँसता प्रिये,
दूर खडा चुपचाप.
(४)
रंग भरे हर पल यहाँ,
देख तुम्हारा रूप,
रूमानी लगने लगी,
पल में तीखी धूप.
(५)
गीत मगन हो गा रहा,
मन ये सुबहोशाम,
संग तेरा मिल जाये,
दुःख लागे सुखधाम..
(६)
जब तक अंतस है युवा,
प्रतिदिन रहा वसंत.
जिस दिन हारे हम हुआ,
हर वसंत का अंत..
(७)
पतझर भी हमको दिखे,
खिला-खिला मधुमास.
जीवन जीवन है तभी,
जब सुन्दर अहसास.
(८)
फूल कहें सीखो ज़रा,
तुम जीवन की रीत.
काँटों में भी हम खिलें,
बिखरा दें नव-प्रीत.
(९)
तन मिलना आसान है,
मन मिलना है दूर.
मन मिल जाये तब लगे,
प्रेम हुआ भरपूर..
(१०)
मौसम लिखता प्रेमपत्र,
बांच रहा आकाश.
बोल पड़े खगवृन्द तब,
कुहू-कुहू मधुमास.

5 टिप्पणियाँ:

Arvind Mishra February 4, 2010 at 6:44 AM  

जबरदस्त -एक ही भारी है यहाँ दस दस
मुला एक बात है वसंत भर तो कम से कम तन से ही काम चला लीजिये और लेने दीजिये महराज !

योगेश स्वप्न February 4, 2010 at 7:18 AM  

wah wah wah..................wah girishji, ..........anupam.

विनोद कुमार पांडेय February 4, 2010 at 7:55 AM  

गिरीश जी बहुत बढ़िया लग रही है आज कल आपकी दोहो से भरी पोस्टें....बधाई स्वीकारें

सुलभ § सतरंगी February 5, 2010 at 1:03 AM  

दुःख लागे सुखधाम..

जीवन जीवन है तभी,
जब सुन्दर अहसास.

बोल पड़े खगवृन्द तब,
कुहू-कुहू मधुमास...

एक पर एक. सब बेहतरीन है. धन्यवाद आपका.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari February 5, 2010 at 3:37 AM  

बहुत सुन्दर दोहे भैया. मन बासंती हो गया

सुनिए गिरीश पंकज को

  © Free Blogger Templates Skyblue by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP