''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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महावीर वचनामृत-८

>> Sunday, February 14, 2010

(66)
यह तन इक नौका लघु, नाविक इसका जीव।
पार करे जीवन-जलधि, खारा पानी पीव।।

(67)
वीर मरे, कायर मरे, अंत सभी का होय।
लेकिन जो हँसकर मरे, वीर जानिए सोय।।

(68)
ध्यान करे जो ध्यान से, चित्त होय अनुकूल।
जन्म-मरण के  बंध को, प्राणी जाए भूल।।

(69)
चले आत्मा मोक्ष-पथ, करो उसी का ध्यान।
कर विहार ध्यानस्थ हो, तभी आत्म-कल्यान।।

(70)
कटु वचन जो बोलते, उन्हें क्षमा का दान।
मधुर-वचन बोलें सदा, यह सद्गुण की खान।।

(71)
सेनापति मर जाय तो, सेना का हो हा्रस।
मोह नष्ट हो जाय तो, दुष्कर्मों का नाश।।

(72)
दु:ख-सुख-पीड़ा से परे, जिसने किया प्रयाण।
क्षुधा गई, तृष्णा मिटी, वही सत्य निर्वाण।।

(73)
ज्ञान-शरण जो भी गया, तप-संयम के साथ।
मुक्ति उसे मिल जायगी, महावीर हैं नाथ।।

(74)
संत-वचन सुन लीजिए, हो जीवन की जय।
चले सुपथ पर जीव तब, नहीं मृत्यु का भय।।

(75)
जीवों की रक्षा करे, वही जैन है नेक।

जो ऐसा ना कर सके, विकसित नहीं विवेक।।
..........................
लेकिन मित्रो, इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है, कि मुंबई के देवनार में एशिया का सबसे बड़ा कसाईखाना एक जैन महाशय ही चला रहे है. जहाँ रोज हजारो बेबस पशु कटते है. और हमारी गौ माताएं...? उनकी संख्या तो पूछिए मत.. पता नहीं कब उनके मन में महावीर भगवान् की करुणा का उदय होगा? हम सब को मिलजुल कर इस अ-जैन के विरुद्ध एक वातावरण बनाने की कोशिश की जानी चाहिए.

3 टिप्पणियाँ:

गिरीश पंकज February 21, 2010 at 1:26 AM  

दोहे बहुत अच्छे लगे.

सादर

समीर लाल
http://udantashtari.blogspot.com/

गिरीश पंकज February 21, 2010 at 1:28 AM  

test

संजय भास्कर March 1, 2010 at 6:16 AM  

dohe bahut hi ache lage...

सुनिए गिरीश पंकज को

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