''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

ग़ज़ल/ स्वारथ सधे तो रिश्ता...स्वारथ के सम्बन्ध हो गए

>> Tuesday, February 23, 2010

बहुत दिनों के बाद अचानक मन दुखी हुआ तो कुछ शेर बन गए, सो पेश-ए-खिदमत है. आसपास का परिवेश, लोगों की मानसिकता दुख देती है. आप किसी को कुछ बोल नहीं सकते, समझा नहीं सकते. दिमाग में भौतिकता इस कदर हावी है कि मत पूछिए. एक लेखक अपने मन की पीड़ा को शब्दों में ढाल कर खामोश रह जाता है. खैर, पेश है कुछ शेर. वैसे इसमे सुधार की भी गुंजाइश है, लेकिन फिलहाल तो सुधी पाठको तक पहुँचने का मोह संवरण नहीं कर पाया, सो हाज़िर हूँ--
दो ग़ज़ले...
(१)
स्वारथ सधे तो रिश्ता वरना यही लहू-सा रिसता है
तेरी-मेरी नहीं कहानी, घर-घर का यह किस्सा है

चलो दूर जा कर हम रह लें, यहाँ तो सौदेबाजी है
इसमें मेरा हिस्सा है 'बे' उसमें तेरा हिस्सा है 
 (पाठक ''बे''की जगह ''रे'' भी कर सकते हैं)
प्यार-मोहब्बत-अपनापन ये लगे कहानी पुस्तक की 
अब तो नफ़रत, लूट-मार बस हर घर में यह चलता है

चलते-चलते जो गिर जाए उस पर हंसती है दुनिया 
कौन उठाए, फुरसत किसको बिजी आदमी ऐसा है 

कहने को इनसान हो गए पर वैसी तहजीब कहाँ
हैवानों-सा यहाँ आचरण इनसानों में देखा है

'जो मेरा है वो भी तेरा' अब कहता है कौन यहाँ
'तेरा जो है वो भी मेरा' खून-खराबा करता है

तेरी दौलत, मेरी दौलत करते-करते मरे सभी
अकल न आयी पंकज को सदियों से कोई कहता है

(२)
स्वारथ के सम्बन्ध हो गए 
झूठे हर अनुबंध हो गए 

आड़े-तिरछे शब्द आ गए 
निर्वासित अब छंद हो गए 

कौन कहेगा सत्य यहाँ जब 
अधरों पर प्रतिबन्ध हो गए

कैसे छिपे गरीबी अपनी 
जगह-जगह पैबंद हो गए 

नफ़रत नींद उड़ा लेती है
आँखें हो कर अंध हो गए

प्यार बांटना था जिनको वे
हिंसा की ही गंध हो गए

पूजा सारी व्यर्थ हो गयी
हम अपने में बंद हो गए 

पंकज कोई प्यार करेगा 
हम पागल-मतिमंद हो गए 

7 टिप्पणियाँ:

विनोद कुमार पांडेय February 23, 2010 at 9:58 AM  

पंकज की दोनों रचनाएँ..बेहतरीन...भावपूर्ण ग़ज़ल..प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार

venus kesari February 23, 2010 at 11:11 AM  

पहली के भाव समयानुकूल हैं दूसरी गजल ज्यादा पसंद आई मगर शायद इसमें काफिया दोष भी है

Udan Tashtari February 23, 2010 at 5:23 PM  

सच कहा..घर घर का किस्सा है..यथार्थ ही उकेरा है! बहुत उम्दा!

राजीव तनेजा February 23, 2010 at 6:24 PM  

कटु सत्य ....
अंतर्मन से निकली हुई आवाज़ जैसी महसूस हुई आपकी ये रचना ....

योगेश स्वप्न February 23, 2010 at 7:14 PM  

wah pankaj ji, donon rachnayen lajawaab, dheron badhaai.

दिगम्बर नासवा February 24, 2010 at 12:23 AM  

लाजवाब शेर ... बहुत कमाल की है दोनों रचनाएँ..बेहतरीन...भावपूर्ण ....

संजय भास्कर February 25, 2010 at 9:15 PM  

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

सुनिए गिरीश पंकज को

  © Free Blogger Templates Skyblue by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP