''सद्भावना दर्पण'

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दो ग़ज़लें / इतना अधिक ज़हर मत घोलो,, पाँच सितारा होटल में...

>> Wednesday, April 28, 2010

अपना देश जब आजाद हुआ तो एक उम्मीद जगी थी, कि अब नया भारत बनेगा. हम स्वतन्त्र हो कर अपना विकास कर सकेंगे. हमारा 'शासन' होगा. 'लोक' का ही 'तंत्र' होगा. हमारे जनप्रतिनिधि ईमानदारी से काम करेंगे और देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगा.लेकिन आज हालत क्या हैं? जो प्रगति दिखाती है,वह छह दशक बाद तो दिखानी ही थी, लेकिन इन वर्षों में हमने एक भ्रष्ट-अपराधी व्यवस्था को भी मजबूत कर दिया है. जिन लोगों को हमने अपना सेवक समझा था, वे हमारे स्वामी बन बैठे. इनको 'सेवा' करना था, मगर 'मेवा' खाने लगे. सरकारी तंत्र इतना भ्रष्ट हुआ कि मत पूछिए. ऊपर से चली भ्रष्टाचार की नदी नीचे तक बह रही है,जिसका जल पीना मजबूरी हो गयी है. बात बहुत लम्भी हो जायेगी. फिर कभी ज़रूर करूंगा. आज अपनी दो ग़ज़ले दे रहा हूँ. पहली ग़ज़ल समाज में पाए जाने वाले घमंडी लोगो और विशेष कर नौकरशाहों के लिए है, जो समझते है कि वे 'तोपचंद' हैं कुछ नहीं, काम दो कौड़ी का नहीं करेंगे और ठसन है. शाहों जैसी दिखायेंगे. इनके घर पर छापा पड़ता है तो अरबो की दौलत निकलती है. कहाँ से आता है इतना पैसा? जाहिर है, देश के लोगों का है. छोटे-मोटे अफसर की ''अदाएं'' तो खैर देखते ही बनाती है, मैं मगरमच्छों की बात करना चाहता हूँ. हम जिनको आईपीस,आईएस या कलेक्टर-फलेक्टर बनाते है, उनके तेवर देखिये. लगता है पता नहीं किस लोक से अवतरित हुए है. सीधे मुंह बात ही नहीं करते. मुस्कराने में भी इन्हें तकलीफ होती है. बहुत पहले मैंने एक ग़ज़ल कही थी-''साहबजी कलेक्टर हैं''. बहुत जल्दी उसे भी पोस्ट करूंगा. आज तो मै ''साहबजी'' पर कुछ शेर पेश कर रहा हूँ, इसमे छोटे-बड़े सभी साहबों की विशेषताओं पर ''प्रकाश'' डालेंगे. दूसरी ग़ज़ल उन प्रवृत्तियों पर है जो पाखण्ड से भरी हुई है. ग़रीबो पर बात होगी, मगर पांच सितारा होटलों में. कोई गरीब आ जाये तो लात मार कर भगा देंगे, मगर चर्चा करेंगे गरीबी कैसे हटे, बदहाली कैसे दूर हो. भकोसकर खायेगे-''पीयेंगे'' और वातानुकूलित कार में बैठ कर चल देंगे. इन लोगो में नेता, अफसर, तथाकथित बुद्धिजीवी सभी शामिलहैं.यहाँ अपने शहर में ये मंज़र देखता रहता हूँ, आप भी देखते होंगे. हम सब इसी दंश को भोग रहे है तभी तो मन की पीड़ा लिखते है, और पढ़ाते भी है. अब चर्चा बन, रचनाएँ देखिये-
ग़ज़ल-१
इतना अधिक ज़हर मत घोलो साहब जी 
जब भी बोलो मीठा बोलो साहब जी

अपनी काया में ही सिमटे रहते हो
कभी-कभी तो घर के हो लो साहब जी

सबको ही तुमने ख़ारिज कर डाला है
अपने को भी इक दिन तौलो साहब जी

दूजे के चेहरे पे कालिख देख रहे
पहले अपना मुंह तो धो लो साहब जी

लोकतंत्र में अंगरेजों के ओ वंशज...
दिल को थोड़ा आज टटोलो साहब जी

रहे रात भर क्लब में वाईन-शाईन पी
भोर हो रही अब तो सो लो साहब जी

अरबो रुपये कमा डाले तुमने अब तक 
कहाँ से लूटा मुंह तो खोलो साहब जी

हमने ही भस्मासुर पैदा किये कई 
पाप हमारे तुम भी रो लो साहब जी

ग़ज़ल-२

भूख-गरीबी पर चर्चा है पाँच सितारा होटल में
ये मजाक कितना अच्छा है पाँच सितारा होटल में

बहुत बिजी है नेता अपना हरदम उड़ता रहता है
बेचारा भोजन करता है पाँच सितारा होटल में

क्या नेता क्या लेखक-चिन्तक नक्कालों की फ़ौज खड़ी 
हर कोई जा कर मरता है पाँच सितारा होटल में 

''भारत'' के हिस्से में आँसू झूठे वादे औ सपने
''इंडिया' क्या वो तो रहता है पाँच सितारा होटल में

अरे शहीदों लहू तुम्हारा लगता है बेकार गया 
लोकतंत्र सिसकी भरता है पाँच सितारा होटल में

तेरी ''वाइफ'' मेरी 'वाइफ' आ जा फिर बदली कर लें 
नयी सदी में सब चलता है पाँच सितारा होटल में

सच कहने वाला है बागी पंकज मारा जाएगा
शातिर तो खुलकर हंसता है पाँच सितारा होटल में

9 टिप्पणियाँ:

नरेश सोनी April 28, 2010 at 9:34 PM  

गिरीश जी, इन साहबों से तो भगवान ही बचाए।

राजेन्द्र मीणा April 28, 2010 at 9:40 PM  

सटीक सत्य ...धन्यवाद

http://athaah.blogspot.com/

rajeevspoetry April 28, 2010 at 10:59 PM  

बहुत अच्छी ग़ज़लें. पढ़ कर अच्छा लगा.

-राजीव भरोल

Shekhar Kumawat April 28, 2010 at 11:57 PM  

bahtrin bahut khub

संजय भास्कर April 29, 2010 at 5:21 AM  

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

मनोज कुमार April 29, 2010 at 8:55 AM  

अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

Rajendra Swarnkar April 29, 2010 at 9:13 AM  

" पाँच सितारा होटल में " और " साहब जी " संबोधन ग़ज़ल में महान हिंदुस्तान के वर्तमान स्वरूप का सटीक चित्रण हुआ है ।
किसी एकाध शे'र पर बात करना ग़ज़लगो के फ़न ही नहीं …उसकी संपूर्ण सजगता , सोच , और इंसानियत को आंशिक रूप से नकारना हो सकता है ।
… … …
क़लम को काजल का टीका लगा लें , गिरीशजी !

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" April 30, 2010 at 9:08 PM  

दोनों के दोनों ग़ज़ल इतनी बढ़िया है कि तारीफ़ करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है ... एक एक शेर जैसे तीखे व्यंग्य के चाशनी में डुबो डुबो कर छोड़ा गया हो ...

दूजे के चेहरे पे कालिख देख रहे
पहले अपना मुंह तो धो लो साहब जी

हमने ही भस्मासुर पैदा किये कई
पाप हमारे तुम भी रो लो साहब जी

क्या बात है ... एकदम सही कहा है आपने ... ये हम जैसे आम आदमी का पाप है कि आज सारा सरकारी व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प हो गई है ...

भूख-गरीबी पर चर्चा है पाँच सितारा होटल में
ये मजाक कितना अच्छा है पाँच सितारा होटल में

''भारत'' के हिस्से में आँसू झूठे वादे औ सपने
''इंडिया' क्या वो तो रहता है पाँच सितारा होटल में

अरे शहीदों लहू तुम्हारा लगता है बेकार गया
लोकतंत्र सिसकी भरता है पाँच सितारा होटल में

तेरी ''वाइफ'' मेरी 'वाइफ' आ जा फिर बदली कर लें
नयी सदी में सब चलता है पाँच सितारा होटल में

सच कहने वाला है बागी पंकज मारा जाएगा
शातिर तो खुलकर हंसता है पाँच सितारा होटल में

आपने तो बड़े शहरों कि पांच सितारा संस्कृति पर ज़ोरदार व्यंग्य कर डाला ... और आपकी कही हुई हर शब्द सच है ...
आपके लेखनी को सलाम ...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' May 1, 2010 at 1:11 AM  

behad umda likha hai aapne pankaj ji ... aap ke sahab ji ki paanch sitara hotel me ki gayi aiyaashi behtareen vyang kiya hai aapne..maze aa gaye ...chittha charcha pe aap ki ghazal ka link dekh kar aaya hun idhar..

सुनिए गिरीश पंकज को

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