''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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दो ग़ज़लें / काले धंधे में डूबा है.... जितना सुख हिस्से में आया..

>> Monday, May 3, 2010

मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है,यह देख कर कि, कुछ लोग मुझसे जुड़ते जा रहे है. ये ''गिव एंड टेक'' वाले नहीं हैं. ये सब दिल से जुड़ रहे हैं. ये भले लोग है. इनमे विवेक है. भले-बुरे की समझ है. यही चाहता रहा हूँ कि मुझे कम लोग ही मिलें मगर वे सज्जन हों, उनका मन निर्मल हो. जब मेरी रचना कोई दिल में उतारता है तो सृजन की सार्थकता लगती है. मै उनसे कुछ सीखता हूँ, कोई मुझसे कुछ सीख पाए, ऐसी प्रतिभा मेरे पास नहीं है, लेकिन मुझसे जुड़ने वालों से मै बहुत कुछ सीखता रहता हूँ. मेरे चाहने वालों को मै अपनी आत्मा में बसाता हूँ. ''अच्छे पाठकों पर'' कभी अपना लेख भी आप तक पहुचाऊंगा. फिलहाल दो ग़ज़ले पेश कर रहा हूँ. देखें...

(१)

काले धंधे में डूबा वो उजियारे की बात करे
हत्यारा ही भोला बनकर हत्यारे की बात करे

चेहरे से अब हत्यारे को समझ नहीं हम पाएंगे
वो तो ईश्वर-अल्ला उनके जयकारे की बात करे

धरती को तो देख न पाया घर से बाहर गया नहीं
बैठे-बैठे सूरज-चंदा और तारे की बात करे

कविता दिल से बनती है वे दिमाग से लिखते हैं
अब तो भरे पेटवाला ही भुखियारे की बात करे

भला आदमी है बेचारा हरदम ठोकर खाता है
कोई तो इस बस्ती में उस बेचारे की बात करे

सच कहने वाले तो अक्सर क़त्ल हुए हैं पहले भी
पंकज उनका ही विरसा है अंगारे की बात करे

(२)

जितना सुख हिस्से में आया.. काफी है
मन को तूने ये समझाया.. काफी है  

अपनों से ज्यादा उम्मीदें मत रखना 
जिसने जितना साथ निभाया.. काफी है

हम तो सोच रहे थे वो क्या आयेगा
बहुत दिनों के बाद वो आया.. काफी है

दौलत तेरे हाथ कभी ना आ पाई
लायक बेटा एक कमाया.. काफी है 

सुबह खुली है आँख शाम मुंद जायेगी
जिसने भी इस सच को पाया..काफी है 

9 टिप्पणियाँ:

आनन्‍द पाण्‍डेय May 3, 2010 at 12:35 AM  

सुबह खुली है आँख शाम मुंद जायेगी
जिसने भी इस सच को पाया..काफी है


really inspiring poem

ललित शर्मा May 3, 2010 at 1:07 AM  

कविता दिल से बनती है वे दिमाग से लिखते हैं
अब तो भरे पेटवाला ही भुखियारे की बात करे

कैसी विडम्बना है जिसने भूख धूप देखी नही वह वातनुकूलित कमरों में बैठकर भुखियारे की भूख मिटाने की योजना बना रहे हैं।

बहुत खुब गिरीश भैया-व्यवस्था पर करारी चोट है।

राम राम

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' May 3, 2010 at 1:57 AM  

pasand aayi

शिवम् मिश्रा May 3, 2010 at 2:28 AM  

बेहद करारी चोट करी है व्यवस्था पर............. बहुत बहुत बधाइयाँ !

M VERMA May 3, 2010 at 5:41 AM  

सुबह खुली है आँख शाम मुंद जायेगी
जिसने भी इस सच को पाया..काफी है
सच तो यही है

Shekhar Kumawat May 3, 2010 at 6:41 AM  

bahut khub

Rajendra Swarnkar May 3, 2010 at 6:47 AM  

दोनों ग़ज़लों ने प्रभावित किया ।

क्या ख़ूब कहा है…
"कविता दिल से बनती है वे दिमाग से लिखते हैं
अब तो भरे पेटवाला ही भुखियारे की बात करे"

मेरा भी अंदाज़े-बयां शामिल है इस शे'र में…
"सच कहने वाले तो अक्सर क़त्ल हुए हैं पहले भी
पंकज उनका ही विरसा है अंगारे की बात करे"

अपने आप में संपूर्ण दर्शन भी है यह शे'र…
"दौलत तेरे हाथ कभी ना आ पाई
लायक बेटा एक कमाया.. काफी है"
सबूरी हो तो ऐसी …
"अपनों से ज्यादा उम्मीदें मत रखना
जिसने जितना साथ निभाया.. काफी है"

अच्छे सृजन की प्यास फिर से यहीं खींच कर लाएगी ,
यह जानते हुए विदा लेता हूं…
- राजेन्द्र स्वर्णकार
http://shabdswarrang.blogspot.com

मनोज कुमार May 7, 2010 at 9:46 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

संजय भास्कर June 2, 2010 at 8:08 PM  

. बहुत बहुत बधाइयाँ !

सुनिए गिरीश पंकज को

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