''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,

>> Wednesday, May 5, 2010

बस्तर अशांत है, हिंसा का खेल खेलने वाले नक्सलियों के कारण. नक्सली विकास की बात करते है और हमेशा विनाश के दृश्य उपस्थित करते है. अरुंधती राय जैसी लेखिकाएं और कुछ छद्म बुद्धिजीवी नक्सलियों को महिमामंडित करते रहते है, जबकि नक्सलियों की हरकतें केवल निंदनीय है. आज देश भर से आये बुद्धिजीवियों ने रायपुर में एक शान्ति सभा ली. जिसमे कुछ समय के लिए शान्ति फ़ैल गयी. (देखे सद्भावना दर्पण)कल वे बस्तर जायेंगे. सभा में नक्सली हिंसासमर्थक नकली बुद्धिजीवी नहीं थे. सब गांधीवादी सोच से संपृक्त. सभा से लौटा तो लगा मन में कुछ उमड़ रहा है, सो एक गीत बन गया, उसे पेश कर रह हूँ.  
 

गीत...

अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,
तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है..

ये जीवन है बड़ा सुन्दर करें दुखियों की सेवा हम,
न पालें द्वेष आपस में, करें न प्यार अपना कम.
ये साँसें चल रही कब तक अरे इसमे भी छलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है....

ये हिंसा क्यों हमें इतना लुभाने लग गयी भाई
कभी हिंसा से ही बदलाव की आंधी कहाँ आई.
जो खूनी मन है लोगों का उसे पहले बदलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.

चले हम राह ऐसी जिसपे चलते हो सभी साथी.
नहीं ऊंचा कोई नीचा, रहे दीया के संग बाती.
चलेंगे हम गिरेंगे भी मगर हमको संभालना है
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.

तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.....

9 टिप्पणियाँ:

राजीव तनेजा May 5, 2010 at 9:58 AM  

तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है....

बहुत ही बढ़िया...सीख देती रचना

usha rai May 5, 2010 at 10:02 AM  

तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.....!!!
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी खासियत अहिंसा है ! आप देशभक्ति का अलख जगाते रहिये ! हर भारतीय आपके साथ है !

ललित शर्मा May 5, 2010 at 10:08 AM  

गि्रीश भैया
कई वर्षो पहले आडवाणी के मुंह से छद्म धर्मनिरपेक्षता नामक शब्द सुना था, उससे पहले कभी सुना नहीं था। तब से यह शब्द सब जगह प्रचलन में आ गया है।

छद्म की जगह सीधे सीधे नकली नहीं कह सकते क्या? या इस शब्द को सम्मान जनक बनाने लिए कुछ और भी प्रयोग इसके साथ किए जाने चाहिए।

बहुत अच्छा गीत है, तिमिर को भागना ही होगा।
जब चल पड़े है कदम तो,सभी को जागना ही होगा
आभार

शिवम् मिश्रा May 5, 2010 at 10:21 AM  

अब की बार आपने शब्दों के अर्थ नहीं दिए सो मुझे थोड़ी दिक्कत आ रही है पर फिर भी आप के मन की बात मेरे मन तक अपना असर छोड़ने में सफल रही !!

एक बढ़िया रचना के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ !!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" May 5, 2010 at 5:52 PM  

नहीं ऊंचा कोई नीचा, रहे दीया के संग बाती.

सुन्दर सेवा भाव से लिखी गयी रचना है ...

Udan Tashtari May 5, 2010 at 6:03 PM  

बहुत जबरदस्त!!

वाणी गीत May 5, 2010 at 7:29 PM  

तिमिर को गर भागना है ..हमें हर पल जलना है ...
चलेंगे , गिरेंगे मगर संभलेंगे भी ...
जोश उत्साह बना रहे ...बनाते रहे ..शुभकामनायें ...!!

मनोज कुमार May 7, 2010 at 9:47 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

संजय भास्कर June 2, 2010 at 8:12 PM  

एक बढ़िया रचना के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ !!

सुनिए गिरीश पंकज को

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