''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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स्वारथ जब दिमाग पर छाया रिश्ते टूट गए...

>> Friday, May 7, 2010

इस क्रूर समय में अच्छे लोगों का जीना कठिन हो गया है, बाहर की क्या बात करुँ , अब तो घर-घर में नफ़रत और अलगाव का मंज़र नज़र आने लगे हैं. दुःख होता है देख कर, जब एक भाई दूसरे भाई की जान लेने पर आमादा हो जाता है,क्योंकि उसे संपत्ति में बंटवारा चाहिए. यह दौलत कितनी खतरनाक होती है कि दो दिल, दो खून अलग-अलग हो जाते है. अरबपति अम्बानी से लेकर अनेक आम मध्यमवर्गीय परिवार में भी आर्थिक मामलों में कोई संतुष्टि नहीं दिखती. एक भाई दूसरे भाई के लिए त्याग क्यों नहीं कर पाता..? क्या धन-दौलत में इतनी ताकत होती है, कि वह सगे लोगों को भी पराया बना देता है. हम भाई सौभाग्यशाली है कि अभी तक प्रेम से ही रहते है, और हमारे सामने ऐसी कोई नौबत भी नहीं आने वाली. आज की पोस्ट लिखने का कारण है. कल मै बहुत दिन बाद एक किराना दूकान पर समान लेने गया. बारह फुट चौड़ी दूकान को दो भाई मिल कर संचालित करते थे. कल देखा तो दंग रह गया कि वही दूकान दो भागों में बंटी हुई है. छः-छः फुट की दूकान...देख कर झटका-सा लगा. मैंने फ़ौरन नाराज़गी व्यक्त की कि ''ये क्या है भाई..?तुम लोग साथ-साथ नहीं रह सकते थे?'' बड़े भाई ने संकोच के साथ कहा-''क्या करे साब, छोटा नहीं माना.'' मैंने छोटे को देखा. वह मौन था. मुस्कराता रहा, बस. मैं क्या करता. कोई पंचायत तो था नहीं कि फैसला सुना देता कि कल से दोनों भाई एक साथ रह कर व्यवसाय करेंगे. दुखी मन से लौट आया. कल से ही सोच रहा था, कि इस विघट्नवादी-अलगाववादी प्रवृत्तियो पर कुछ लिखूंगा. यह जानता हूँ, कि मेरे लिखने से कुछ होने से रहा. हो सकता है उलटे लोग नाराज़ भी हो जाये, यह भी हो सकता है कुछ लोगों को मेरी बात ठीक लगे. बहुत संभव है कुछ भाइयों वे ऐसे बंटवारे का दर्द भोगा भी हो. बंटवारा घर का हो चाहे देश का, दुखद है. देश तो फिर भी भौगोलिकता के कारण स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन घर का टूटना आत्मा को छलनी करना होता है. दो लोग अलग होते है तो केवल दो लोग ही अलग नहीं होते, कितने लोग प्रभावित हो जाते है. प्रेम, सद्भावना, अपनापन सब ख़त्म हो जाता है. हम पशु बन कर जीते है, बस...खैर इस पर जितना लिखा जाये, कम है, अपनी भावनाओं को आज ग़ज़ल नहीं, एक नवगीत के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा हूँ.

नवगीत 
स्वारथ जब दिमाग पर छाया,
रिश्ते टूट गए..

घर-घर में बाज़ार घुस गया,
बन गए सब व्यापारी.
ऐसी आंधी चली बिखर गयी,
हरी-भरी सब क्यारी.
साथ-साथ चलने वाले क्यों
पीछे छूट गए..

दूर किताबों से जब थे हम,
तब था कितना प्यार.
जैसे-जैसे पढ़ना सीखा,
बिखर गया घरबार.
पढ़े-लिखे कुछ लोग स्वयं के,
घर को लूट गए...

धीरे-धीरे हरा-भरा 'यह,
बाग़' उजड़ता लागे.
समझ न पाऊँ इस तेज़ी से,
लोग कहाँ..क्यूं भागे?
खुशबू के ये देव अचानक,
क्यूं कर रूठ गए.

स्वारथ जब दिमाग पर छाया,
रिश्ते टूट गए..

11 टिप्पणियाँ:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" May 7, 2010 at 5:51 AM  

बेहतरीन ! लाजवाब रचना है ...
ये सच है कि लोग पढ़ना लिखना सीख कर और स्वार्थपर हो गए हैं ...

राजकुमार सोनी May 7, 2010 at 6:09 AM  

चाहे गीत हो, गजल हो अथवा नई कविता आप सब कुछ ऐसा लिखते हैं जो शाश्वत है। बेहतरीन लाजवाब रचना। आपको बधाई।

Rajendra Swarnkar May 7, 2010 at 6:23 AM  

गिरीशजी
मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित होकर सृजित प्रस्तुत नवगीत बहुत अच्छा लगा । लेकिन सच कथने वालों से लोग ख़ुश कम , नाराज़ अधिक होते हैं , यह भी सच है।
"हम भाई सौभाग्यशाली है कि अभी तक प्रेम से ही रहते है, और हमारे सामने ऐसी कोई नौबत भी नहीं आने वाली." ईश्वर आप जैसे परिवारों को नज़र से बचाए ।
शस्वरं
-राजेन्द्र स्वर्णकार

M VERMA May 7, 2010 at 8:28 AM  

स्वारथ जब दिमाग पर छाया,
रिश्ते टूट गए..
बहुत सुन्दर सामयिक रचना

दिलीप May 7, 2010 at 10:01 AM  

lajawaab rachna sahej kar rakhne layak...

विनोद कुमार पांडेय May 7, 2010 at 10:26 AM  

दूर किताबों से जब थे हम,
तब था कितना प्यार.
जैसे-जैसे पढ़ना सीखा,
बिखर गया घरबार.
पढ़े-लिखे कुछ लोग स्वयं के,
घर को लूट गए..

पंकज जी कितनी खूबसूरती से समाज की सच्चाई बयाँ कर दी आपने...बहुत भावपूर्ण रचना धन्यवाद

राजेन्द्र मीणा May 7, 2010 at 10:56 AM  

दूर किताबों से जब थे हम,
तब था कितना प्यार.
जैसे-जैसे पढ़ना सीखा,
बिखर गया घरबार.

अच्छी पंक्तिया ...बढ़िया रचना

शिवम् मिश्रा May 7, 2010 at 1:23 PM  

बहुत बढ़िया रचना !! आपको बधाई।

शरद कोकास May 7, 2010 at 1:47 PM  

गीत भी सही है और यह चिंतन भी ।

संजय भास्कर May 8, 2010 at 12:19 AM  

पंकज जी कितनी खूबसूरती से समाज की सच्चाई बयाँ कर दी आपने.

संजय भास्कर May 12, 2010 at 12:51 AM  

बहुत भावपूर्ण रचना धन्यवाद

सुनिए गिरीश पंकज को

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