''सद्भावना दर्पण'

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नयी कविता/ लोकतंत्र की खुशहाली और शांति के लिए

>> Tuesday, May 11, 2010

इधर हमारी सरकार ने लोकतंत्र की खुशहाली और शांति के कुछ फार्मूले
जनहित में कर दिए हैं जारी
अनुरोध है देश की जनता से कि वह जनता द्वारा ही चुनी गयी
लोकप्रिय सरकार की बात मानकर लोकतंत्र के हाथ मजबूत करे.
सबसे पहले तो जनता एक बड़ा काम यह करे कि
नेता-अफसरों के घरों और कार्यालयों के आसपास
धरना-प्रदर्शन करके सरकार के जनहित को समर्पित चिंतन में खलल न डाले.
अगर किसी मांग को लेकर धरना-प्रदर्शनज़रूरी हो तो शहर से दूर एक नदी बहती है,
उसके किनारे बैठे कर जोर-जोर से चिल्लाया जा सकता है.
इससे सरकार को कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि
उसके कानो में व्यवस्था-विरोधी नारे नहीं पड़ेंगे
वरना होता यह है कि बेचारी सरकार की पुलिस को अलबर्ट पिंटो की तरह गुस्सा जाता है और वह
प्रदर्शनकारियों की पिटाई कर देती है या गोली-फोली चला देती है या फिर जेल में डाल देती है.
अपने देश में बनी रहे लोकतंत्र की प्रतिष्ठा इसलिए ज़रूरी है कि शहर में शांति बनी रहे
और शहर के बाहर भी जितना संभव हो मौन प्रदर्शन ही किया जावे
आखिर नारेबाजी, प्रदर्शन, धरना-फरना से होगा क्या. अपना खून सुखाने से फायदा ही क्या?
बेहतर यही है कि जनता राजप्रसाद तक जा कर
एक ज्ञापन सौप दे और अपने दर्द का सात्विक इज़हार कर के लौट आये
हम यह भी मानते है कि ज्ञापन देने के पहले जनता को थोड़ी-बहुत असुविधा तो होगी..
धक्के-वक्के खाने पड़ेंगे...पुलिस उन्हें दुतकारेगी...अफसर उन्हें घूरेंगे..., चमचे मजाक उड़ायेंगे
लेकिन हो सकता है जनता ज्ञापन देने में सफल भी हो जाये.
आज नहीं तो कल ज्ञापन सरकार तक ही पहुच ही जाएँगे
शान्ति बनाये रखें और देखे कि कभी न कभी सरकार आपकी मांगे पूरी करके रहेगी.
इसलिए लोकतंत्र में धैर्य सबसे बड़ी परीक्षा है.
वे लोग सच्चे लोकतांत्रिक नागरिक है जो धक्के खाकर भी मौन रहते है.
इसलिये सरकार चाहती है कि लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे
हो-हल्ला बिल्कुल ही न हो इसलिए शहर से बाहर जा कर धरना-प्रदर्शन किया जाये और
लोकतंत्र के हाथों को मजबूत करके आदर्श नागरिक होने का सबूत दिया जाये.
देखिये, केवल सरकार-विरोधी प्रदर्शन ही एक काम नहीं है.
हम दहेज़ प्रथा के विरुद्ध नारे लगायें...अंधश्रद्धा के विरोध में जी भर कर चीखे..
भ्रूण-ह्त्या कितनी बड़ी समस्या है.इस पर भी कुछ बोलें.
लोक कला पर चर्चा करें 
अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बढ़ाने की मांग करे.
पेड़ों को काट कर भी अगर फोरलेन सड़कें बनती है तो
इसके लिए प्रदर्शन करें. कुल मिला कर जनता विकास से जुड़े विनाश से नहीं
सरकार के खिलाफ उसके भवनों के बाहर प्रदर्शन कर मुर्दाबाद करने से क्या फायदा?
पागल सिपाही लाठी-गोली लेकर खड़े रहते है. आखिर उन बेचारों का क्या दोष?
वे तो व्यवस्था बनाने के लिए कुछ भी कर सकते है.
जनता की जान बड़ी कीमती है उसे अभी मनोरंजन करना है....सिनेमा देखना है..घूमना-फिरना  है ..
उसे शापिंग माल जाना है.... पिज्जा-बर्गर आदि भकोसना है..
कितने काम करने है उसे मगर इधर कुछ लोग है कि बस सरकारविरोधी काम में लगे रहते है
आईबी, एलआईबी..सीआईबी आदि-आदि सबके सब काम पर लगे है. सबकी नज़रें है आप पर
इसलिए हे नागरिको, लोकतंत्र को मजबूत करो और
शहर से बाहर जाकर प्रदर्शन आदि करके अच्छे शहरी होने का प्रमाण दो.
देखो तुम्हारे प्रदर्शन से यातायात बाधित होता है और जनप्रतिनिधियों का आना-जाना भी प्रभावित हो जाता है. इसलिए वक्त का यही तकाजा है कि हम फिलहाल देश हित में सारे प्रदर्शन स्थगित करके
घर बैठे मनोरंजक चैनल देखे और मूड फ्रेश करें.
समस्याओं से सरकार निपट लेगी/ आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा.
आखिर आपके द्वारा चुनी हुई सरकार है.कुछ न कुछ तो करेगी ही.
इसलिए अंत में हम सब लोग कसम खाएं कि हर हाल में हम लोकतंत्र के हाथ मजबूत करेंगे और
राजप्रासादों के इर्द-गिर्द धरना-प्रदर्शन, रैली आदि कर के सरकार का मूड खराब नहीं करेंगे.
धीरे-धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा.
और अब अन्त में बोलिए...
लोकतंत्र जिंदाबाद ...
भारत माता की जय.

5 टिप्पणियाँ:

विनोद कुमार पांडेय May 11, 2010 at 10:17 AM  

भारत माता की जय ..लोकतंत्र तो हमेशा जिंदाबाद रहेगा क्योंकि इसमें आम आदमी होते ही नही और मरते है आम आदमी..बढ़िया रचना बधाई

Udan Tashtari May 11, 2010 at 11:04 AM  

लोकतंत्र जिंदाबाद ...
भारत माता की जय

शिवम् मिश्रा May 11, 2010 at 11:38 AM  

गुलज़ार साहब ने लिखा था,
" बंदोबस्त है ज़बरदस्त है ...........हमारा हुक्मरान अरे कमबख्त है ....."
कुछ कुछ वही भावना आपकी इस रचना में दिखी !!
बहुत बहुत आभार आम मानस की भावना को शब्द देने के लिए !!

लोकतंत्र जिंदाबाद ...
भारत माता की जय

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" May 11, 2010 at 9:18 PM  

बेहतरीन व्यंग्य है ...
बधाई कि आप भी एक अच्छे नागरिक की तरह इतने अच्छे उपदेशों से भरी कविता लिखते हैं ...

संजय भास्कर May 12, 2010 at 12:37 AM  

बेहतरीन व्यंग्य है ...

सुनिए गिरीश पंकज को

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