''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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ग़ज़ल/ बस चलना है...यानी लिखना

>> Sunday, August 29, 2010


ऐसी एक जवानी लिखना 
तुम आँखों में पानी लिखना 

दुहराती हैं जिसको सदियाँ 
ऐसी कोई कहानी लिखना

इंसां बन कर ही रहना है
खुद को तू मत ज्ञानी लिखना

देख ज़ुल्म को चीख जरा तू
या जीवन बेमानी लिखना

दूजे की गलती देखी है 
अपनी भी नादानी लिखना

वो घमंड में क्यों डूबा है 
ये जीवन है फानी लिखना 

राणा का विष अमृत होगा
मीरा इक दीवानी लिखना 

कविता को वो युग लौटेगा
तू कबिरा की बानी लिखना 

कलम हमारी है गर पूजा 
बातें ना बचकानी लिखना

अगर लिख रहा है तू पावस
टूटी छप्पर-छानी लिखना

लोकतंत्र गर ज़िंदा है तो 
न राजा, ना रानी लिखना

जब तक ज़िंदा है तू पंकज 
बस चलना है...यानी लिखना

16 टिप्पणियाँ:

S.M.HABIB August 29, 2010 at 7:44 AM  

दुहराती हैं जिसको सदियाँ
ऐसी कोई कहानी लिखना
वह भईया. शानदार ग़ज़ल. प्रणाम.

महेन्द्र मिश्र August 29, 2010 at 7:50 AM  

दूजे की गलती देखी है
अपनी भी नादानी लिखना

बहुत बढ़िया रचना गिरीश जी...आभार

गजेन्द्र सिंह August 29, 2010 at 7:55 AM  

अच्छी ग़ज़ल है .....आभार

http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/

Etips-Blog Team August 29, 2010 at 8:47 AM  

एक एक शब्द दिल की गहराइयोँ मे बस गया है ।

आपकी ये गजल ,गजल नही एक संदेश है उस हर युवा के लिए जो कुछ करना चाहता है ,आप वो इबारत लिख रहे हैँ जिसे हर युग मे दुहराया जाएगा ।

मै भी एक कहानी लिखूँगा
न राजा न रानी लिखूँगा
जो चिख-2 कर पुकारता है वतन,
हर वो जिन्दगानी लिखूँगा ।
जिसे देखकर चलते रहेँ लोग ,ऐसी एक लिक निशानी लिखूँगा ।

राज भाटिय़ा August 29, 2010 at 10:31 AM  

इंसां बन कर ही रहना है
खुद को तू मत ज्ञानी लिखना
बहुत सुंदर रचना जी धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) August 29, 2010 at 11:47 AM  

कलम हमारी है गर पूजा
बातें ना बचकानी लिखना

अगर लिख रहा है तू पावस
टूटी छप्पर-छानी लिखना

खूबसूरत गज़ल...सीख देती हुई

Udan Tashtari August 29, 2010 at 6:12 PM  

हर शेर जबरदस्त!! वाह! मजा आ गया.

Majaal August 29, 2010 at 7:49 PM  

नया तो क्या लिखोगे 'मजाल',
हाँ, पर अपनी जुबानी लिखना.

संजय कुमार चौरसिया August 29, 2010 at 8:16 PM  

खूबसूरत गज़ल...सीख देती हुई

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

शिवम् मिश्रा August 29, 2010 at 9:57 PM  

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

Shah Nawaz August 29, 2010 at 10:19 PM  

बहुत ही बेहतरीन रचना!

arvind August 30, 2010 at 12:20 AM  

जब तक ज़िंदा है तू पंकज
बस चलना है...यानी लिखना ......behatareen ghajal...aabhaar.

Ramesh Sharma August 30, 2010 at 3:49 AM  

gagar me sagar jaisi kawita. sagar me jahaan jaisi kawita aur jahaan me ek alag pahchan kawita. prerak margdarshak kawita

कौशल तिवारी 'मयूख' August 30, 2010 at 7:13 AM  

जब तक ज़िंदा है तू पंकज
बस चलना है...यानी लिखना

JanMit August 30, 2010 at 8:59 AM  

जीवन चलने का नाम,
चलते रहो सुबह शाम !
रचते रहो नए आयाम !
आपको प्रणाम ! प्रणाम !!
बेहतरीन रचना ! मन प्रसन्न हो गया !
बहुत बहत बधाई .............................

ललित शर्मा-ਲਲਿਤ ਸ਼ਰਮਾ August 30, 2010 at 7:05 PM  


उम्दा गजल के लिए गिरीश भैया आभार

खोली नम्बर 36......!

सुनिए गिरीश पंकज को

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