''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नई ग़ज़ल,/ बढ़े बैंक-बैलेंस तुम्हारा

>> Tuesday, September 21, 2010

बहुत दिनों के बाद फिर हाज़िर हूँ आपकी अदालत में. आज ही एक नई ग़ज़ल कही है. सो, आपकी सेवा में प्रस्तुत है. देखें..शायद एकाध शेर पसंद आ जाये..सौभाग्य होगा मेरा.

गुस्सा कम हो प्यार ज़ियादा 
सुन्दर हो संसार ज़ियादा

करना हो तो प्यार करो तुम 
क्यों करना तकरार ज़ियादा

प्यार वही होता है सच्चा 
बढ़ता जो हर बार ज़ियादा

चुभन मिली जिसको काँटों की 
फूलों का हक़दार ज़ियादा

ऊपर वाला मेहरबान है 
तो फिर बनो उदार जियादा

बढ़े बैंक-बैलेंस तुम्हारा 
दोस्त बनें दो-चार ज़ियादा

कट जाते हैं अपने सारे 
गर नफ़रत की धार ज़ियादा

रिश्ते भी अब हुए बिकाऊ 
घर कम है बाज़ार ज़ियादा

बोल अगर हों मीठे पंकज 
जीवन हो रसदार ज़ियादा 

13 टिप्पणियाँ:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार September 21, 2010 at 7:11 AM  

आदरणीय गिरीश पंकज जी

नमस्कार !
अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई !
इस शे'र ने दिल ले लिया …

प्यार वही होता है सच्चा
बढ़ता जो हर बार ज़ियादा


बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Majaal September 21, 2010 at 7:18 AM  

इस कदर बेहतरीन लिखेंगे पंकज ,
होगी आगे खुदी से तकरार जियादा

माधव September 21, 2010 at 7:28 AM  

nice

गजेन्द्र सिंह September 21, 2010 at 7:48 AM  

अच्छी पंक्तिया लिखी है ...

इसे भी पढ़े और कुछ कहे :-
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/86.html

निर्मला कपिला September 21, 2010 at 7:58 AM  

har sher laajavaab
badhaaI

वीना September 21, 2010 at 8:41 AM  

बहुत अच्छी है ग़ज़ल
ये शेर बहुत भाया

चुभन मिली जिसको काँटों की
फूलों का हक़दार जियादा
http://veenakesur.blogspot.com/

अमिताभ मीत September 21, 2010 at 9:30 AM  
This comment has been removed by the author.
ललित शर्मा September 21, 2010 at 9:47 AM  

सुंदर गजल है भाई साहब

कई दि्नों की गैर हाजरी के बाद

Kusum Thakur September 21, 2010 at 12:54 PM  

"प्यार वही होता है सच्चा
बढ़ता हो हर बार जियादा"

बहुत खूब ...

शरद कोकास September 21, 2010 at 1:52 PM  

भई इस गज़ल को बैंक वालो को सुनाया या नही राजभाषा मास में ?

अमिताभ मीत September 21, 2010 at 7:05 PM  

सही है भाई ....

हाल ये है अपने गुलशन का
फूल हैं कम और ख़ार ज़िआदा

फ़ितरत देख यहाँ मित्रों की
दोस्ती कम .. व्यापार ज़िआदा

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 21, 2010 at 11:05 PM  

बहुत अच्छी बातें बताती सुन्दर गज़ल ..

ZEAL September 22, 2010 at 12:16 AM  

प्यार वही होता है सच्चा
बढ़ता जो हर बार जियादा

true !

सुनिए गिरीश पंकज को

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