''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नई ग़ज़ल/ काश मिले मंदिर में अल्ला....

>> Friday, September 24, 2010

देश में प्यार रहे, अमन की बाहर रहे. हमारा देश इसके लिये सदा तैयार रहे. नफ़रत का अंत हो. प्यार का बसंत हो. खुशिया दिग-दिगंत हो. ऐसा समाज चाहिए. कुछ ही लोग सिरफिरे होते है. अपने धर्म या मजहब के लिये रोते है. जबकि धरम-मज़हब इतने कमजोर नहीं, कि उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाये. लेकिन जो मूर्ख है उन्हें समझने से क्या फायदा? और जो समझदार हैं, उनको तो कुछ समझने की भी ज़रुरत नहीं. बहरहाल फिर कुछ शेरों के साथ पेश है एक सामायिक ग़ज़ल....देखें...कुछ जमे तो मेरा सौभाग्य...

सुन्दर एक जहान मिले 
चेहरों पर मुसकान मिले 

काश मिले मंदिर में अल्ला
मस्जिद में भगवान मिले

वह घर पावन जिसमे गीता 
बाइबिल और कुरान मिले 

आते खाली जाते खाली
जितने भी इनसान मिले

धर्म-जात के झगड़े ना हों 
ऐसा हिन्दुस्तान मिले

धनवालों के भीतर भी
सुन्दर इक इनसान मिले

सुख हम भीतर खोजेंगे 
बाहर सब परेशान मिले 

दान दे सकें हम सबको 
क्यों सबका अहसान मिले

बस्ती में घर खोज रहा 
वैसे बहुत मकान मिले 

18 टिप्पणियाँ:

गजेन्द्र सिंह September 24, 2010 at 7:16 AM  

बहुत बढ़िया ......
अच्छी पंक्तिया की रचना की है ........

कृपया इसे भी पढ़े :-
क्या आप के बेटे के पास भी है सच्चे दोस्त ????

Majaal September 24, 2010 at 7:17 AM  

पढ़े जो हम पंकज की ग़ज़ल,
तो हमको भी आराम मिले ...

लिखते रहिये ...

Etips-Blog Team September 24, 2010 at 8:24 AM  

पढेँ जो गजल आपकी,
उनको भी आराम मिले
धर्म के नाम पर लङने वालोँ को ,
हराम मिले


Likhte rahiye, संक्षिप्त सटीक और बेबाक
सरजी मै तो कभी कभार टिप्पणी दे देता हूँ क्योँकी आपकी तरह मुझे कुछ लिखना नही आता है ।
Comments by: Admin of etips blog group.

संजीव गौतम September 24, 2010 at 8:37 AM  

achchhi rachana

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 24, 2010 at 9:50 AM  

बहुत सुन्दर ...भगवान एयर अलाह तो मंदिर मस्जिद बदल भी लें पर इंसानों का क्या जो पत्थर की इमारत को पूजते हों ..

'उदय' September 24, 2010 at 10:03 AM  

... ab kyaa kahen ... bas dubakee lagaa kar jaa rahe hain ... adbhut bhaav ... behatreen gajal !!!

ललित शर्मा September 24, 2010 at 10:36 AM  

सुंदर गजल,
कौमी एकता का भाव लिए हुए

आभार भाई साहब

राज भाटिय़ा September 24, 2010 at 11:27 AM  

पंकज जी काश आप की बात सब की समझ मै आ जाये तो यही सब को स्वर्ग मिल जाये, इस अति सुंदर रचना के लिये आप का धन्यवाद

Kusum Thakur September 24, 2010 at 5:00 PM  

काश ऐसा होता ........बहुत ही सुन्दर रचना !!

Udan Tashtari September 24, 2010 at 5:56 PM  

बेहतरीन गज़ल.

वाणी गीत September 24, 2010 at 7:33 PM  

ऐसा ही हिन्दुस्तान मिले ...
सकारात्मक आशावादी रचना के लिए साधुवाद ...!

Rahul Singh September 24, 2010 at 9:11 PM  

मौजूं और सार्थक, बधाई.

अजय कुमार September 25, 2010 at 12:27 AM  

सद् भावना का सुंदर संदेश

mahendra verma September 25, 2010 at 7:34 AM  

इतनी छोटी बहर की ग़ज़ल में इलनी बड़ी-बड़ी बातें ... बहुत खूब... ऐसा चमत्कार आप ही कर सकते हैं।

S.M.HABIB September 25, 2010 at 10:05 PM  

"जात पात की रेखा खींचे बैठा है नादान.
धरती बांटी, खुद को बांटा, बाँट लिया भगवान्.
मंदिर मस्जिद दरअसल इंसानों की रचना है भईया इसीलिए इनमें इतने टंटे हैं.
"बुल्लेशाह शहु अन्दर मिलिया
दुनिया फिरे लुकाई हो."
मंदिर और मस्जिद में अल्लाह और भगवान् की तलाश ऐसा ही है जैसे पानी में रेखाचित्र बनाना.
आपके इन पवित्र भावनाओं को प्रणाम.

विनोद कुमार पांडेय September 26, 2010 at 3:29 AM  

काश मिले मंदिर में अल्ला
मस्जिद में भगवान मिले

सुंदर भावों से सजी बेहतरीन ग़ज़ल..पढ़ने के बाद दिल खुश हो जाता है...प्रणाम चाचा जी

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι September 26, 2010 at 9:24 AM  

क़ौमी एकता के भावों से लबरेज़ अच्छी ग़ज़ल के लिये गिरिश भाई को मुबारक बाद।

Anonymous November 16, 2010 at 3:40 PM  

Thanks due to the fact that this discriminative article, it's absolutely conspicuous blogs

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