''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

नई ग़ज़ल/ प्यार बड़ा बेमज़ा लग रहा

>> Sunday, September 26, 2010

जीवन की कुछ और सच्चाईयों से रूबरू करने की कोशिश में पेश है कुछ और नए शेर.....

कहते हो तुम आते क्यों नहीं
दिल से हमें बुलाते क्यों नहीं

सबको टिप्स दिया करते हो 
खुद को भी समझाते क्यों नहीं

अगर सही में खुश हो मुझसे 
देख इधर मुसकाते क्यों नहीं 

दिल में इक बच्चा रहता है
उसको तुम बहलाते क्यों नहीं

कौन तुम्हारे घर आएगा 
अरे कहीं तुम जाते क्यों नहीं   

मत कोसो तुम अन्धकार को
दीपक एक जलाते क्यों क्यों नहीं

बातें बड़ी-बड़ी करते हो
उसे अमल में लाते क्यों नहीं

प्यार बड़ा बेमज़ा लग रहा 
मुझको तनिक सताते क्यों नहीं

भीतर-भीतर क्यों घुलते हो
दिल की बात बताते क्यों नहीं   

हो जाएगा वह भी तेरा 
पहले हाथ बढ़ाते क्यों नहीं

देखो मौसम खुशगवार है
पंकज अब तुम गाते क्यों नहीं    

12 टिप्पणियाँ:

Majaal September 26, 2010 at 7:54 AM  

क्यों बुरा मानेंगे हम ?
हक तुम जताते क्यों नहीं ...
बहुत उम्दा ! लिखते रहिये,...

महेन्द्र मिश्र September 26, 2010 at 7:58 AM  

कहते हो तुम आते क्यों नहीं
दिल से हमें बुलाते क्यों नहीं


सबको टिप्स दिया करते हो
खुद को भी समझाते क्यों नहीं

वाह सर गजब के भाव .... सुन्दर रचना ...आभार

ललित शर्मा September 26, 2010 at 8:00 AM  

प्यार बड़ा बेमजा लग रहा है
तुम्हारा आना कज़ा लग रहा है
जब से पुछा एटीएम है क्या?
तब से प्यार सजा लग रहा है।

हा हा हा,
बस युं ही कह दिया भैया
उम्दा गजल के लिए आभार

usha rai September 26, 2010 at 8:24 AM  

अगर सही में खुश हो मुझसे
देख इधर मुसकाते क्यों नहीं !!!
बड़ी सुंदर ग़जल निकल पड़ी है ,सीधे साधे मनोभावों के लिबास में !पीछे पीछे चेरी की तरह चल रही है भाषा ! क्या कहने ! आभार

राज भाटिय़ा September 26, 2010 at 10:30 AM  

वाह गिरीज जी जबाब नही आप की सुंदर गजल का, बहुत सुंदर

खबरों की दुनियाँ , भाग्योत्कर्ष September 26, 2010 at 6:37 PM  

अच्छा लगा । सुंदर - मनोहारी गजल । बधाई । कुछ और लाईनें बरबस ही याद आई । … दिवाना होता है , मस्ताना होता है । हर खुशी - हर गम से बेगाना होता है ।

निर्मला कपिला September 27, 2010 at 12:44 AM  

सभी शेर बहुत अच्छे लगे।
कौन तुम्हारे घर आएगा
अरे कहीं तुम जाते क्यों नहीं

हो जाएगा वह भी तेरा
पहले हाथ बढ़ाते क्यों नही
वाह ! बहुत अच्छी लगी आपकी गज़ल बधाई।
गज़ल लिखना है मुश्किल बहुत्
आप हमे सिखलाते क्यों नहीं

S.M.HABIB September 27, 2010 at 3:15 AM  

भईया प्रणाम. बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई.

mahendra verma September 27, 2010 at 6:01 AM  

शानदार ग़ज़ल । सीधे सादे शब्दों में बहुत गहरी बातें ...वाह...बहुत खूब।

ZEAL September 27, 2010 at 9:36 AM  

सुन्दर रचना ...आभार

शिवम् मिश्रा September 27, 2010 at 7:50 PM  


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

शरद कोकास September 28, 2010 at 6:55 AM  

सही है पंकज अब कैसे गाये ..

सुनिए गिरीश पंकज को

  © Free Blogger Templates Skyblue by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP