''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नई ग़ज़ल/ बाप से भी ये घूस वसूलें......

>> Thursday, October 21, 2010

साहब....'शार्टकट' में ''साब जी'' भी. हमारे यहाँ ये शब्द व्यंग्य में भी कहा जाता है. बहुत पहले एक फ़िल्मी गीत लोकप्रिय हुआ था-''साला मैं तो साहब बन गया, साहब बनके कैसा तन गया''. साहब बन कर अक्सर लोग तन जाते है. ऐसे ही तनने वाले लोगो को समर्पित है आज कुछ शेर. मनुष्य मनुष्य बना रहे, इससे उसका क्या बिगड़ जाता है. ठीक है, कोई साहब बन गया तो क्या यह ज़रूरी है कि वह मनुष्य ही न रहे. खैर, बात लम्बी हो जायेगी. ब्लॉग के माध्यम से अपनी लघु रचनाएँ ही देना चाहता हूँ. लम्बी रचना पढ़ने का अवकाश कहाँ है. बहरहाल, पेश है नई ग़ज़ल. देखें, कुछ सुधी पाठको को जाँच जाये शायद....

बस कहने को बड़े साब जी
भीतर से पर सड़े साब जी 

निकल न पाएँगे पापों से
इतना भीतर गड़े साब जी

बात है सच्ची लेकिन जिद है
झूठ पे अपनी अड़े साब जी 

हमने सच क्या बोल दिया बस
डंडा ले कर चढ़े साब जी 

उनकी थाह नहीं पाओगे 
इतनी परतें मढ़े साब जी

मुफ्तखोर हैं, कामचोर हैं
फिर भी तो हैं बड़े साब जी 

देख-देख उनकी बेशर्मी 
लोग शर्म से गड़े साब जी 

ज्ञान की बूँदें टिक ना पाईं
ऐसे चिकने घड़े साब जी 

झूठों से हैं बड़े मुलायम 
सच्चों से हैं कड़े साब जी 

बाप से भी ये घूस वसूलें 
अगर वक़्त कुछ पड़े साब जी

लूट, झूठ सारे छलछंदर
कहाँ पाठ ये पढ़े साब जी 

6 टिप्पणियाँ:

Akhtar Khan Akela October 21, 2010 at 8:46 AM  

saab logon ke liyen jo alfaz aapne istemal kiye hen sch voh adhiktm kuch aek apvadon ko chodkr isi laayq hen. akhtar khan akela kota rajsthan

Shah Nawaz October 21, 2010 at 9:00 PM  

आपने हकीक़त बयां कर दी है... बहुत खूब!

वन्दना October 22, 2010 at 12:16 AM  

सच दिखाती सुन्दर रचना।

नीरज गोस्वामी October 22, 2010 at 6:21 AM  

साब जी आपका जवाब नहीं..मजेदार रचना...बधाई
नीरज

निर्मला कपिला October 22, 2010 at 6:52 AM  

निकल न पाएँगे पापों से
इतना भीतर गड़े साब जी

मुफ्तखोर हैं, कामचोर हैं
फिर भी तो हैं बड़े साब जी

ज्ञान की बूँदें टिक ना पाईं
ऐसे चिकने घड़े साब जी
बहुत सुन्दर गज़ल है। वाह साब जी।

संजय भास्कर October 23, 2010 at 7:39 AM  

बस कहने को बड़े साब जी
भीतर से पर सड़े साब जी
.........मजेदार रचना

सुनिए गिरीश पंकज को

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