''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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वो अंधियारे में बैठा है जो सचमुच में ज्ञानी है

>> Sunday, March 6, 2011

कभी-कभी लगता है मन में जीने का क्या मानी है
वही सफल दिखता है जिसका जीवन ही बे-पानी है

हम जीवन भर संघर्षों के पथ पर चलते रहते हैं
और वहीं शातिर लोगों का जीवन सफल कहानी है

मूरख के सर ताज दीखते जय-जयकार करें चमचे
वो अंधियारे में बैठा है जो सचमुच में ज्ञानी है

होगी उसके पास में दौलत, ज्ञान और सुविधाएँ भी
लेकिन वह इंसान नहीं है जो निर्मम-अभिमानी है

खतरों की परवाह नहीं है वैसे भी इस जीवन में 
मेरा घर है उस रस्ते पर जो रस्ता तूफानी है

जिनके दिल में दया नहीं है जो पत्थर की संतानें
उनसे करुणा की कुछ आशा करना ही बेमानी है

जाने कब वे मर जाएँगे है इत्ती-सी बात मगर
केवल नादां समझ न पाते बहुत बड़ी हैरानी है

बात अगर झकझोर सके ना लिखना भी क्या लिखना है
कविता तो वह पंकज सच्ची जैसे बहता पानी है

18 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) March 6, 2011 at 7:13 AM  

मूरख के सर ताज दीखते जय-जयकार करें चमचे
वो अंधियारे में बैठा है जो सचमुच का ज्ञानी है

मन की व्यथा शब्दों में उतर आई है ..अच्छी गज़ल

anupama's sukrity ! March 6, 2011 at 8:09 AM  

बात अगर झकझोर सके ना लिखना भी क्या लिखना है

अच्छी रचना है -
झकझोर गयी -
बहुत कड़े शब्दों में उतारी है व्यथा .

कुश्वंश March 6, 2011 at 10:36 AM  

होगी उसके पास में दौलत, ज्ञान और सुविधाएँ भी
लेकिन वह इंसान नहीं है जो निर्मम-अभिमानी है
खतरों की परवाह नहीं है वैसे भी इस जीवन में
मेरा घर है उस रस्ते पर जो रस्ता तूफानी है

सारगर्भित शब्दों का चयन , अच्छा काव्य, बधाई भी ,शुभकामनाएं भी

shikha varshney March 7, 2011 at 12:58 AM  

vyatha ko bahut saargarbhit shabd diye hain

संगीता स्वरुप ( गीत ) March 7, 2011 at 7:15 AM  

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/

राज भाटिय़ा March 7, 2011 at 9:11 AM  

बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

Udan Tashtari March 7, 2011 at 5:35 PM  

उम्दा रचना...

Patali-The-Village March 7, 2011 at 7:51 PM  

बहुत सुंदर रचना| धन्यवाद|

वन्दना March 7, 2011 at 10:45 PM  

म जीवन भर संघर्षों के पथ पर चलते रहते हैं
और वहीं शातिर लोगों का जीवन सफल कहानी है
होगी उसके पास में दौलत, ज्ञान और सुविधाएँ भी
लेकिन वह इंसान नहीं है जो निर्मम-अभिमानी है
जाने कब वे मर जाएँगे है इत्ती-सी बात मगर
केवल नादां समझ न पाते बहुत बड़ी हैरानी है

हमेशा की तरह शानदार गज़ल हर शेर गज़ब कर रहा है।

sandhya March 8, 2011 at 12:37 AM  

जाने कब वे मर जाएँगे है इत्ती-सी बात मगर
केवल नादां समझ न पाते बहुत बड़ी हैरानी है...

बहुत सारगर्भित और शानदार रचना.. अंतिम चार पंक्तियाँ तो लाजवाब हैं....

Kailash C Sharma March 8, 2011 at 1:07 AM  

कभी-कभी लगता है मन में जीने का क्या मानी है
वही सफल दिखता है जिसका जीवन ही बे-पानी है

हम जीवन भर संघर्षों के पथ पर चलते रहते हैं
और वहीं शातिर लोगों का जीवन सफल कहानी है

आज की व्यवस्था पर बहुत सटीक टिप्पणी...सभी शेर लाज़वाब..

Navin C. Chaturvedi March 8, 2011 at 4:37 AM  

आदरणीय गिरीश जी सादर नमन
एक एक शब्द में अनुभव दिख रहा है

अनामिका की सदायें ...... March 8, 2011 at 7:08 AM  

hamesha ki tarah behtareen abhivyakti.

सुनील गज्जाणी March 9, 2011 at 12:19 AM  

सम्मानिय गिरीश जी
प्रणाम !
बेहद सुंदर , हर शेर अच्छा है . आनद आया पढ़ !
साधुवाद
सादर

गौरव शर्मा "भारतीय" March 9, 2011 at 6:14 AM  

हम जीवन भर संघर्षों के पथ पर चलते रहते हैं
और वहीं शातिर लोगों का जीवन सफल कहानी है

बेहतरीन पंक्ति...बेहतरीन भावाभिव्यक्ति !!
सादर आभार !!

गौरव शर्मा "भारतीय" March 9, 2011 at 6:14 AM  

हम जीवन भर संघर्षों के पथ पर चलते रहते हैं
और वहीं शातिर लोगों का जीवन सफल कहानी है

बेहतरीन पंक्ति...बेहतरीन भावाभिव्यक्ति !!
सादर आभार !!

mahendra verma March 9, 2011 at 7:48 PM  

जिनके दिल में दया नहीं है जो पत्थर की संतानें
उनसे करुणा की कुछ आशा करना ही बेमानी है

पत्थर की संतानें...वाह,
यह प्रतीक एकदम मौलिक है। इस बिम्ब ने शेर को गहरा अर्थ दिया है।
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल।

S.M.HABIB March 15, 2011 at 9:50 AM  

शानदार रचना भैया...
सादर प्रणाम.

सुनिए गिरीश पंकज को

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