''सद्भावना दर्पण'

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नई ग़ज़ल / नफ़रत ही नफ़रत बस पाए बस्ती में........

>> Monday, May 9, 2011

बिना कुछ कहे...फिर एक ग़ज़ल..इसी भरोसे के साथ कि बात बोलेगी शायद, हम नहीं . 
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आ कर हम बेहद पछताए बस्ती में
कितने हो गए लोग पराए बस्ती में

पानी तक के लिए नहीं पूछा सब ने
पता नहीं क्या सोच के आए बस्ती में

हम तो प्यार लुटाने आए थे लेकिन
नफ़रत ही नफ़रत बस पाए बस्ती में

प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में

बदल गए हालात देख कर लोग सभी
अपनों को पहचान न पाए बस्ती में

सुन्दर चेहरा है थोड़ी-सी दौलत भी
इस पर वो नादां इतराए बस्ती में

डरता हूँ के अगर मर गया मैं तनहा
लाश हमारी कौन उठाए बस्ती में

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो 
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

28 टिप्पणियाँ:

Kailash C Sharma May 9, 2011 at 7:42 AM  

बदल गए हालात देख कर लोग सभी
अपनों को पहचान न पाए बस्ती में

...आज के यथार्थ का बहुत भावपूर्ण और संवेदनशील चित्रण...हरेक शेर दिल को छू जाता है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) May 9, 2011 at 8:27 AM  

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

बहुत सुन्दर गज़ल ..सच को कहती हुई

दीपक 'मशाल' May 9, 2011 at 8:47 AM  

कहकर बीती यादों ने बुलवाया था
यार मेरे मरते हैं मुझ पर बस्ती में

ये एक कच्चा शेर और सर...
सच्ची और अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई..

सतीश सक्सेना May 9, 2011 at 9:22 AM  

"कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में"

वाकई यहाँ कोई नहीं मुस्कराता, एक दूसरे को देख कर ! शुभकामनायें !

अशोक बजाज May 9, 2011 at 9:23 AM  

कोई नहीं रोयेगा जग में ,
जब तक पंकज मुस्काए बस्ती में

राज भाटिय़ा May 9, 2011 at 10:35 AM  

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

सब जानते हे इस बात को फ़िर भी अनजान बने फ़िरते हे, बहुत सुंदर गजल, धन्यवाद

देवेन्द्र पाण्डेय May 9, 2011 at 11:03 AM  

भावपूर्ण।

ehsas May 9, 2011 at 11:26 AM  

कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

हमेशा की तरह शानदार। आभार।

परमजीत सिँह बाली May 9, 2011 at 1:02 PM  

बेहतरीन।

udaya veer singh May 9, 2011 at 6:39 PM  

basti bhi vahi ,basnik bhi vahi bas---

' BASTI KO BASANA KHEL NAHIN ,VAH BASTE BASTE ,BASATI HAI '
rochak laga dristikon ---

आ कर हम बेहद पछताए बस्ती में
कितने हो गए लोग पराए बस्ती में

aabhar ji .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन May 9, 2011 at 6:40 PM  

हालात का सटीक चित्रण है।

Shah Nawaz May 9, 2011 at 8:39 PM  

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में


कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में


खूबसूरत ग़ज़ल है... बेहतरीन!

रश्मि प्रभा... May 9, 2011 at 8:40 PM  

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में
waah

Sunil Kumar May 9, 2011 at 9:02 PM  

प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में
संवेदनशील शेर, बहुत सुंदर गजल.......

वाणी गीत May 9, 2011 at 9:42 PM  

प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में...
दौलत सब पर भारी है , जबकि सभी जानते हैं सबकुछ यही रह जाना है ...
बेहतरीन !

दर्शन कौर धनोए May 9, 2011 at 10:05 PM  

कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

एकदम बढ़िया शब्द और रचना ---मुस्कुराते रहे यु ही बस्ती में ...

prerna argal May 9, 2011 at 10:09 PM  

bahut achchi gajal.aaj ki matalabi duniya ki asliyat bayan karati hui.dunia ki aajkal yahi reet ho gai hai.badhhi aapko.

please visit my blog also and leave the comments.thanks

Dr Satyajit Sahu May 9, 2011 at 11:27 PM  

bahut aacha laga padkar ..........................aapko badhai...................

Khare A May 9, 2011 at 11:36 PM  

bahut hi bhavpurn abhivyakti,
dil ke ass pass, aisa hi kuch apna bhi hal he!

bas main bhi yahi geet gungunata hun aajkal

"ik din bik jayega mati ke mol, jag me reh jayenge pyare tere bol"


sundar shaandar, messgae deti hui aapki is rachna ko mera salaam!

vandana May 10, 2011 at 12:53 AM  

भीड़ भरे शहर गांव और हर आदमी निपट अकेला ...सब इसी डर में जीते हुए... गज़ल की आखिरी पंक्तियों ने जता दिया कि मुस्कुराना भी मुश्किल प्रतीत होता है बहुत अच्छी गज़ल

Maheshwari kaneri May 10, 2011 at 1:35 AM  

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में बहुत सुंदर गजल. आभार।......

singh May 10, 2011 at 5:19 AM  

गिरीश जी
आ कर हम बेहद पछताए बस्ती में
कितने हो गए लोग पराए बस्ती में
अच्छे मतले से सजी इस ग़ज़ल के शेर भी काबिले दाद हैं

डरता हूँ के अगर मर गया मैं तनहा
लाश हमारी कौन उठाए बस्ती में

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

daanish May 10, 2011 at 6:28 AM  

प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में

जिंदगी की सच्चाईयों को
बयान करते हुए लाजवाब शेर ....
बहुत ही अच्छी और यादगार ग़ज़ल !!

mahendra verma May 10, 2011 at 8:11 AM  

प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में

बदल गए हालात देख कर लोग सभी
अपनों को पहचान न पाए बस्ती में

बदलते सामाजिक और नैतिक परिदृश्य को रेखांकित करती अच्छी ग़ज़ल।

संतोष कुमार May 10, 2011 at 9:41 PM  

डरता हूँ के अगर मर गया मैं तनहा
लाश हमारी कौन उठाए बस्ती में


बहुत सुंदर बधाई !

S.M.HABIB May 11, 2011 at 4:57 AM  

"कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में"

हमेशा की तरह लाज़वाब गज़ल है भईया...
सादर प्रणाम....

कविता रावत May 11, 2011 at 6:27 AM  

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में
कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

लाज़वाब गज़ल ....

Dr Varsha Singh May 11, 2011 at 12:35 PM  

EXCELLENT....

सुनिए गिरीश पंकज को

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