''सद्भावना दर्पण'

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नई ग़ज़ल / जुबां खामोश रहती है इशारे बोल उठते हैं.....

>> Wednesday, August 31, 2011

जुबां खामोश रहती है इशारे बोल उठते हैं
हम अक्सर बस इसी के ही सहारे बोल उठते हैं

रखोगे कब तलक बंदिश में सच को पूछता हूँ मैं
हमारे होंठ तो ये बिन पुकारे बोल उठते हैं

हमें अपनों से क्या लेना कहाँ ये काम आते हैं
मगर जो गैर होते हैं वो प्यारे बोल उठते है

तुम्हारा हाल कैसा है तुम्हारा मूड क्या कहता
रहो तुम मौन लेकिन ये नज़ारे बोल उठते हैं

यहाँ वे लोग दण्डित हो रहे जो सत्य कहते हैं
जो दिखता है हकीकत में बेचारे बोल उठते हैं

भंवर में फंस न जाना तुम भले तैराक हो पंकज 
नदी खामोश रहती है किनारे बोल उठते हैं
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और चलते-चलते आज के हालात पर एक शेर
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बहुत खामोश रहते है यहाँ लाखों मगर सच है
समूचा देश जागे जब ''हजारे'' बोल उठते हैं

10 टिप्पणियाँ:

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') August 31, 2011 at 8:51 AM  

यहाँ वे लोग दण्डित हो रहे जो सत्य कहते हैं
जो दिखता है हकीकत में बेचारे बोल उठते हैं

क्या बात है...
बेहद उम्दा ग़ज़ल है भईया...
सादर प्रणाम...

संध्या आर्य August 31, 2011 at 9:18 AM  

khubsurat nazm ....aabhaar

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ August 31, 2011 at 12:26 PM  

हमें अपनों से क्या लेना कहाँ ये काम आते हैं
मगर जो गैर होते हैं वो प्यारे बोल उठते है


बहुत ख़ूब!!!

Dr Varsha Singh September 1, 2011 at 10:17 AM  

तुम्हारा हाल कैसा है तुम्हारा मूड क्या कहता
रहो तुम मौन लेकिन ये नज़ारे बोल उठते हैं

बहुत खामोश रहते है यहाँ लाखों मगर सच है
समूचा देश जागे जब ''हजारे'' बोल उठते हैं

यथार्थपरक..... सुन्दर सार्थक.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ September 3, 2011 at 10:44 PM  

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 05-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

Amrita Tanmay September 4, 2011 at 6:43 PM  

बेहतरीन रचना

Amrita Tanmay September 4, 2011 at 6:44 PM  

बेहतरीन रचना

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" September 4, 2011 at 8:16 PM  

behatarin dil ko choo gayi...bartmaan ke sach ko ujagar karta ek shandar pryas..hardi badhayee aaur apne blog per aane ka nimantran bhi

mahendra verma September 5, 2011 at 8:19 AM  

हमें अपनों से क्या लेना कहाँ ये काम आते हैं
मगर जो गैर होते हैं वो प्यारे बोल उठते है

अपनों और परायों का अर्थ विपर्यय...!

सच्ची बातों को स्वर देती हुई अच्छी ग़ज़ल।

Ojaswi Kaushal September 5, 2011 at 9:48 AM  

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