''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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१० सितम्बर विश्व आत्महत्या निषेध दिवस पर ....

>> Friday, September 9, 2011

१० सितम्बर विश्व आत्महत्या निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर कुछ शेर ..

सिर्फ अपने वास्ते  हो बंदगी अच्छी नहीं
जो हमें अंधा करे वो रौशनी अच्छी नहीं


हर मुसीबत से करेंगे हर  घड़ी हम  सामना
हों भले हालात जैसे खुदकशी अच्छी नहीं


हार कर के बाजियों को जीतना है ज़िंदगी
हार कर रोने लगें यह कमतरी अच्छी नहीं


हर किसी के भाग में होता नहीं है चन्द्रमा
क्या इसी इक बात से है चांदनी अच्छी नहीं


आज अपना है नहीं पर कल रहेगा दोस्तो
कुछ नहीं होगा कभी यह सोच ही अच्छी नहीं


जब तलक है ज़िंदगी इंसानियत के नाम हो
हम रहे खुदगर्ज़ तो ये ज़िंदगी अच्छी नहीं


मसखरी करते रहो पर बात यह भी जान लो
वक़्त के मारे हुओ से  मसखरी अच्छी नहीं


जो हमें इंसानियत से  जोड़ न पाए कभी
सच कहूँ पंकज कभी वो शायरी अच्छी नहीं 

9 टिप्पणियाँ:

सतीश सक्सेना September 9, 2011 at 10:03 PM  

वाह वाह ...शुभकामनायें गिरीश भाई !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ September 10, 2011 at 2:17 AM  

क्या बात है...बहुत सुन्दर

PRAN SHARMA September 10, 2011 at 4:04 AM  

JO hamen insaaniyat se
jod n paaye kabhee
sach kahoon pankaj kabhee
vo shaayree achchhe nahin

Bahut khoob , pankaj ji !

Dr (Miss) Sharad Singh September 10, 2011 at 6:52 AM  

जो हमें इंसानियत से जोड़ न पाए कभी
सच कहूँ पंकज कभी वो शायरी अच्छी नहीं

बहुत सुन्दर...

Dr Varsha Singh September 10, 2011 at 9:09 AM  

हार कर के बाजियों को जीतना है ज़िंदगी
हार कर रोने लगें यह कमतरी अच्छी नहीं

हर किसी के भाग में होता नहीं है चन्द्रमा
क्या इसी इक बात से है चांदनी अच्छी नहीं


बहुत खूब...बहुत खूब....बहुत खूब....

कुश्वंश September 10, 2011 at 7:45 PM  

हर मुसीबत से करेंगे हर घड़ी हम सामना
हों भले हालात जैसे खुदकशी अच्छी नहीं

बहुत खूब.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') September 10, 2011 at 10:40 PM  

वाह वाह भईया...
बहुत ही उम्दा अशआर... प्रेरक...
सादर प्रणाम...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) September 11, 2011 at 9:47 AM  

हर किसी के भाग में होता नहीं है चन्द्रमा
क्या इसी इक बात से है चांदनी अच्छी नहीं

आज अपना है नहीं पर कल रहेगा दोस्तो
कुछ नहीं होगा कभी यह सोच ही अच्छी नहीं

वाह !!! बेहतरीन , बेजोड़ , बेमिसाल. जीने की राह दिखाती सारगर्भित गज़ल.

NEELKAMAL VAISHNAW September 12, 2011 at 6:32 AM  

Girish jee आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए..
MADHUR VAANI कृपया यहाँ चटका लगाये
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