''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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>> Saturday, May 5, 2012

लोग मेरे साथ क्यों कर चल रहे हैं
बस इसे ही देख कर वे  जल रहे हैं

लोग खुद तो कुछ नहीं करते यहाँ
हम अगरचे कर रहे तो खल रहे हैं 

जो  सही थे हम नहीं पहचान पाए
मर गये तो हाथ केवल मल रहे है

ये मेरे सपने मुझी पर तो गए हैं
अस्त हो कर के दुबारा पल रहे हैं 

चन्द्रमा-सूरज नहीं बन पाएँगे
हम तो केवल दीप बन कर जल रहे हैं 

जिनको दौलत,  हुस्न पे कल नाज़ था
आज देखो वे सितारे गल  रहे हैं

एक दिन सूरत बदल कर ही रहेंगे
किन्तु अपने काम कल पे टल रहे हैं

11 टिप्पणियाँ:

dheerendra May 5, 2012 at 8:10 AM  

जो सही थे हम नहीं पहचान पाए
मर गये तो हाथ केवल मल रहे है,..

वाह...बहुत सुंदर अभिव्यक्ति // बेहतरीन रचना //

MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

MY RECENT POST .....फुहार....: प्रिया तुम चली आना.....

Anupama Tripathi May 5, 2012 at 8:15 AM  

चन्द्रमा-सूरज नहीं बन पाएँगे
हम तो केवल दीप बन कर जल रहे हैं
अच्छा लिखा है ...!!
शुभकामनायें ...!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) May 5, 2012 at 11:27 AM  

लोग मेरे साथ क्यों कर चल रहे हैं
बस इसे ही देख कर वे जल रहे हैं

लोग खुद तो कुछ नहीं करते यहाँ
हम अगरचे कर रहे तो खल रहे हैं

बहुत खूब .... खूबसूरत गजल

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) May 5, 2012 at 6:59 PM  

आज 06/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) May 5, 2012 at 7:25 PM  

भूल सुधार ---
कल 07/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

shikha varshney May 6, 2012 at 2:33 AM  

चन्द्रमा-सूरज नहीं बन पाएँगे
हम तो केवल दीप बन कर जल रहे हैं
ये दीपक भी कम रौशनी नहीं देता.
और कल काम टालिए मत :) आज कर ही डालिए:)

udaya veer singh May 6, 2012 at 8:11 PM  

बहुत सुन्दर शब्द रचना बहुत २ बधाई |

Pallavi May 8, 2012 at 1:40 AM  

सुंदर भाव संयोजन से सुसजित सार्थक प्रस्तुतिसमय मिले आपको तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" May 15, 2012 at 7:20 AM  

लोग मेरे साथ क्यों कर चल रहे हैं
बस इसे ही देख कर वे जल रहे हैं

लोग खुद तो कुछ नहीं करते यहाँ
हम अगरचे कर रहे तो खल रहे हैं ..seedhi see baat na mirch masala..dil ka haal kahe dilwala...bahut hee umda prastuti..sadar badhayee..meri ghazal bhee aapke margdarshan ka intezaar kar rahi hai...samay mile to aayiyega

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') May 17, 2012 at 8:22 AM  

सुन्दर ग़ज़ल भईया...
सादर प्रणाम.

girish pankaj May 22, 2012 at 6:04 AM  

sabhi mitro ka dil se aabhar.....

सुनिए गिरीश पंकज को

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