''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

इक दिन ये विस्फोट करेगी / टूटे अगर करोडो चुप्पी

>> Monday, April 15, 2013


बहुत हो गया तोड़ो चुप्पी
 जिंदा हो तो छोडो चुप्पी

अगर नहीं हो कायर तो फिर
 बेमतलब क्यों ओढ़ो चुप्पी

वक़्त बगावत का आया है
 अरे, अभी मत जोड़ो चुप्पी

देखो निकलेगा अंगारा
 हिम्मत करो निचोड़ो चुप्पी

कूच करो अब रुक मत जाना
घडा पाप का फोड़ो ...चुप्पी

देखो दुश्मन बढ़ आया है 
आओ, निबटो, दौड़ो चुप्पी

मंजिल मिल पायेगी कैसे
 अपना रस्ता मोड़ो चुप्पी

इक दिन ये विस्फोट करेगी
 टूटे अगर करोडो चुप्पी

'पंकज' मत घबरा मरने से
 खुद को तनिक झिन्झोड़ो चुप्पी

4 टिप्पणियाँ:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन April 15, 2013 at 6:58 AM  

@टूटे अगर करोडो चुप्पी ...

ये "अगर" बहुत खास है और "चुप्पी" मजबूत, इतनी आसानी से नहीं टूटता है।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया April 15, 2013 at 9:09 AM  

कुछ करना है तो चुप्पी तोड़ना होगा,,,
बहुत उम्दा गजल ,आभार पंकज जी,,,
बहुत दिनों से आपका मेरी पोस्ट पर आना नही हुआ,,,,आइये आपका स्वागत है,,,
Recent Post : अमन के लिए.

shikha varshney April 15, 2013 at 10:27 AM  

चुप्पी ही टूटे तो बात ही क्या .

Majaal April 16, 2013 at 4:14 AM  

ओझ मयी ग़ज़ल!
लिखते रहिये

सुनिए गिरीश पंकज को

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