''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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मैं अपने दर्द का आखिर कहाँ इज़हार कर आऊँ

>> Thursday, November 6, 2014

मैं अपने दर्द का आखिर कहाँ इज़हार कर आऊँ
कोई तो एक हो सच्चा कि उसको प्यार कर आऊँ

यहाँ तो हर कोई पीछे पड़ा है टूट जाऊं मैं
कोई ऐसा नहीं जिसको मैं सब कुछ हार कर आऊँ

वो इक गुमनाम इंसां है मगर जैसे फरिश्ता है
जिए जो सबकी खातिर उसको जीवन वार कर आऊँ

मुझे कमजोर मत समझो बड़ी हिम्मत है मुझमे भी
कहो तो आग के दरिया को जा के पार कर आऊँ

बहुत ही बावरा है मन हजारो ही तमन्नाएँ
ज़रा समझाऊँ नादाँ को तमाचा मार कर आऊँ

1 टिप्पणियाँ:

Kailash Sharma November 6, 2014 at 6:51 AM  

बहुत ख़ूबसूरत और सार्थक ग़ज़ल...

सुनिए गिरीश पंकज को

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