''सद्भावना दर्पण'

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लोकतंत्र का गीत....

>> Friday, November 19, 2021


लोकतंत्र है आखिर तुम को,
झुकना होगा।
जनता जो चाहे वैसा ही,
करना होगा।।

जन-गण के मन को हम समझें,यही न्याय है।
जनता की पीड़ा का मतलब बड़ी हाय है।
जो न समझे, उसको इक दिन मिटना होगा।।
लोकतंत्र है आखिर, तुम को झुकना होगा।

अकड़ नहीं, बस विनम्र-भाव की जय होती है।
तभी किसी की मंज़िल आखिर तय होती है।
आगे बढ़ना है तो, किंचित रुकना होगा।।
लोकतंत्र है आखिर तुम को झुकना होगा।।

आंसू, आहें और कराहें, आने मत दो।
लोकतंत्र में काली बदली छाने मत दो।
वरना कुरसी के सूरज को ढलना होगा।
लोकतंत्र है आखिर, तुम को झुकना होगा।।

लोकतंत्र में झुकना यानी जनगण का सम्मान।
नहीं सहेगा अकड़ कोई भी यह कुरसी ले जान।
जन मानस के साथ सभी को चलना होगा।
लोकतंत्र है आखिर, तुम को झुकना होगा।।

देश के मन को जो भी समझे, वह सच्ची सरकार।
जो न समझे निबट गयी वो, देखा है हर बार।
जनता राजा जैसा चाहे, ढलना होगा।।

लोकतंत्र है आखिर तुम को,
झुकना होगा।
जनता जो चाहे वैसा ही,
करना होगा।।

गिरीश पंकज

5 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी November 19, 2021 at 8:12 AM  

लाजवाब

yashoda Agrawal November 19, 2021 at 8:44 PM  

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 21 नवम्बर 2021 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

जिज्ञासा सिंह November 20, 2021 at 7:32 PM  

समसामयिक और यथार्थपर गहन दृष्टिकोण । सार्थक अभिव्यक्ति ।

Manisha Goswami November 20, 2021 at 9:34 PM  

आंसू, आहें और कराहें, आने मत दो।
लोकतंत्र में काली बदली छाने मत दो।
वरना कुरसी के सूरज को ढलना होगा।
लोकतंत्र है आखिर, तुम को झुकना होगा।।
बिल्कुल सही कहा आपने!
बहुत ही उम्दा रचना!

संगीता स्वरुप ( गीत ) November 21, 2021 at 1:59 AM  

लोकतंत्र की सभी विशेषताओं को कहती सुन्दर रचना .

सुनिए गिरीश पंकज को

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