''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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आ जाओ अब कान्हा मेरे...

>> Friday, August 19, 2022

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है यह गीत, जिसमें मैंने श्री कृष्ण भगवान से गौ-रक्षा के लिए अवतरित होने की अपील की है : 
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पता नहीं किस नंदनवन में, 
भ्रमण कर रहे आज कन्हैया। 
इसीलिए तो लोग दुखी हैं,   
मरती जाती उनकी गैया।। 

बढ़ते जाते असुर यहाँ पर, 
देवों का हो गया पलायन।  
'गीता' को सब भूल गए हैं,
स्वारथ का इकतरफा गायन।
कंस रूप धर कर के नाना,
करता मानो ता-ता-थैया।।

कान्हा की मुरली की धुन में,
गऊ माता जब इठलाती थी।
चारा चरती थी जंगल में, 
और सुखी तब हो जाती थी। 
आज कहाँ चारा-सानी अब,
कचरा किस्मत में है भैया। 

आ जाओ अब तो ओ कान्हा,
असुरों का संहार करो तुम।  
नकली गौ - भक्तों को देखो, 
गायों का उद्धार करो तुम। 
गाय बचे तो देश बचेगा, 
कहती है यह तुझसे मैया। 

@ गिरीश पंकज

5 टिप्पणियाँ:

Onkar August 20, 2022 at 5:33 PM  

सुंदर प्रस्तुति.

संगीता स्वरुप ( गीत ) August 20, 2022 at 10:05 PM  

बहुत सुंदर गीत । आज की विद्रूपता को समेट लिया इस गीत में ।

अनीता सैनी August 21, 2022 at 9:32 AM  


जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२२-०८ -२०२२ ) को 'साँझ ढलती कह रही है'(चर्चा अंक-१५२९) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Bharti Das August 21, 2022 at 10:03 AM  

बहुत सुंदर रचना

रंजू भाटिया August 22, 2022 at 1:00 AM  

सुंदर रचना

सुनिए गिरीश पंकज को

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