गिरीश पंकज
व्यंग्यकार की कविताई और व्यंग्यादि
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ग़ज़ल गिरीश पंकज
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ग़ज़ल गिरीश पंकज
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Sunday, October 23, 2011
नई ग़ज़ल / मन का दीप जले तो हर इक अंधकार मिट जाता है ...
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दीपत्सव की शुरुआत हो चुकी है. आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं. प्रस्तुत है कुछ पंक्तियाँ, देखे, शायद सुधी पाठकों को पसंद आ जाएँ अंधकार आता है आए...
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Tuesday, September 20, 2011
ग़ज़ल / हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ........
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यह रचना फेसबुक पर भी दी है, मगर लगा, अपने प्रिय पाठकों-मित्रों के लिए ब्लॉग में भी देनी चाहिए. इसलिए...बताएं, कैसा प्रयास है? ज़िंदगी का ज...
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Friday, September 16, 2011
महंगाई की डायन खाए, कुर्सी ये मक्कार मिली है
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पीड़ा ही हर बार मिली है ये कैसी सरकार मिली है महंगाई की डायन खाए, कुर्सी ये मक्कार मिली है ये कैसी कायर दिल्ली है बेबस और लाचार मिली है...
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Saturday, March 12, 2011
ग़ज़ल / अपने जब ठुकराते हैं ...आँसू साथ निभाते हैं
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अपने जब ठुकराते हैं आँसू साथ निभाते हैं अपनों से धोखे खा कर हम केवल पछताते हैं दिल ही दिल में रोते हम बाहर से मुस्काते हैं यादें आतीं सहल...
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