नई ग़ज़ल / मन का दीप जले तो हर इक अंधकार मिट जाता है ...
>> Sunday, October 23, 2011
दीपत्सव की शुरुआत हो चुकी है. आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं. प्रस्तुत है कुछ पंक्तियाँ, देखे, शायद सुधी पाठकों को पसंद आ जाएँ
अंधकार आता है आए, उससे कब घबराता है
इक नन्हा-सा दीप सामने आ कर सबक सिखाता है
अंधकार की फितरत है अपने पंजे फैलाएगा
लेकिन अदना-सा दीपक उससे जाकर भिड जाता है
'बहुत अँधेरा, बहुत अँधेरा' यह रोना कब तक रोएँ?
यह ज़ालिम तो इक दीपक से अक्सर मुँह की खाता है
अंधकार होता है कायर फिर भी इतराना देखो
दीपक जलते ही घमंड सब मिट्टी में मिल जाता है
किसम-किसम के यहाँ अँधेरे मिल जायेंगे बस्ती में
मन का दीप जले तो हर इक अंधकार मिट जाता है
अरे अँधेरे मत इतरा तू मौत तेरी अब निश्चित है
हर इक तानाशाह मरा है यह इतिहास बताता है
धनवाले अपने ही घर को रौशन करते रहते है
दिलवाला इंसान अँधेरे दर पर दीप जलाता है
आखिर सच्ची दीवाली का पंकज ने देखा सपना
हर दरवाजा हँसता है और हर आँगन मुस्काता है