''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नई ग़ज़ल / मन का दीप जले तो हर इक अंधकार मिट जाता है ...

>> Sunday, October 23, 2011

दीपत्सव की शुरुआत हो चुकी है. आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं. प्रस्तुत है कुछ पंक्तियाँ, देखे, शायद सुधी पाठकों को पसंद आ जाएँ

अंधकार आता है आए, उससे कब घबराता है
इक नन्हा-सा दीप सामने आ कर सबक सिखाता है

अंधकार की फितरत है अपने पंजे फैलाएगा
लेकिन अदना-सा दीपक उससे जाकर भिड जाता है

'बहुत अँधेरा, बहुत अँधेरा' यह रोना कब तक रोएँ?
यह ज़ालिम तो इक दीपक से अक्सर मुँह की खाता है

अंधकार होता है कायर फिर भी इतराना देखो
दीपक जलते ही घमंड सब मिट्टी में मिल जाता है

किसम-किसम के यहाँ अँधेरे मिल जायेंगे बस्ती में
मन का दीप जले तो हर इक अंधकार मिट जाता है

अरे अँधेरे मत इतरा तू मौत तेरी अब निश्चित है
हर इक तानाशाह मरा है यह इतिहास बताता है 

धनवाले अपने ही घर को रौशन करते रहते है
दिलवाला इंसान अँधेरे दर पर दीप जलाता है

आखिर सच्ची दीवाली का पंकज ने देखा सपना
हर दरवाजा हँसता है और हर आँगन मुस्काता है

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ग़ज़ल / हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ........

>> Tuesday, September 20, 2011

यह रचना फेसबुक पर भी दी है, मगर लगा, अपने प्रिय पाठकों-मित्रों के लिए ब्लॉग में भी देनी चाहिए. इसलिए...बताएं, कैसा प्रयास है? 
 
ज़िंदगी का जो हक है अदा मैं करूँ
हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ
 
ये अन्धेरा मिटाने दिया मैं बनूँ
काम अक्सर ही ऐसे खुदा मैं करूँ
 
काम हो जाये मकसद हमारा यही
तू अगर कर न पाए बता मैं करूँ
 
भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ
 
उसकी फितरत मुझे अब पता चल गई
वो करे है ज़फ़ा तो वफ़ा मैं करूँ
 
जो यहाँ गिर पड़े मैं उठाऊँ उन्हें
आदमी हूँ अगर यह सदा मैं करूँ
 
प्यार करना हमेशा लगे है सज़ा
किन्तु पंकज यही फिर खता मैं करूँ

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महंगाई की डायन खाए, कुर्सी ये मक्कार मिली है

>> Friday, September 16, 2011

पीड़ा ही हर बार मिली है 
ये कैसी सरकार मिली है

महंगाई की डायन खाए,
कुर्सी ये मक्कार मिली है

ये कैसी कायर दिल्ली है
बेबस और लाचार मिली है

दर्द न समझे ये जनता का
कुर्सी बड़ी ''छिनार'' मिली है

बदलेंगे अब बहुत हो गया
बड़ी खटारा कार मिली है   
 
जीयें कैसे बोलो आखिर ?
कदम-कदम पर हार मिली है  

बहते हैं अब खून के आंसू
बेगैरत सरकार मिली है 

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ग़ज़ल / अपने जब ठुकराते हैं ...आँसू साथ निभाते हैं

>> Saturday, March 12, 2011

अपने जब ठुकराते हैं
आँसू साथ निभाते हैं

अपनों से धोखे खा कर
हम केवल पछताते हैं

दिल ही दिल में रोते हम
बाहर से मुस्काते हैं

यादें आतीं सहलाने
जब सारे बिसराते हैं

प्यार खजाना है अपना
जी भर इसे लुटते हैं

अब जा कर ये समझे हैं
सुख-दुःख आते-जाते हैं

प्यार-वफाओं के किस्से
सुनकर बस मुस्काते हैं

कविता मत समझो इसको
दिल का दर्द सुनाते हैं

अपने तो खुदगर्ज़ हुए
बेगाने अपनाते हैं

अब तो आओ निर्मोही
कब से तुम्हें बुलाते हैं

सुविधाओं की जूठन है
कितने कष्ट उठाते हैं

खुद्दारी का क्या सुख है
आओ, हम बतलाते हैं

उल्टा है यह दौर शिष्य अब 
गुरुओं को समझाते हैं

तन्हाई में पंकज जी
हम खुद से बतियाते हैं

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सुनिए गिरीश पंकज को

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