''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

आज वे बंदे हमें ही आँख दिखलाने लगे.....

>> Sunday, June 25, 2023


 चार दिन सीखे नहीं के सबको सिखलाने लगे

चंद ऐसे लोग ही हर सिम्त मंडराने लगे


हमने जिनको राह दिखलाई के तुम ऐसे चलो

आज वे बंदे हमें ही आँख दिखलाने लगे


दृष्टि लोगों की अजब धुंधली हुई इस दौर की

इसलिए सिक्के जो खोटे थे वही छाने लगे


राग दरबारी सुना कर के सियासी मंच से

कुछ बड़े चालाक भत्ते और पद पाने लगे


बेच कर के आत्मा को पा गए सम्मान तो

चंद बौने और हलकट भाव अब खाने लगे


क्या पता पिछले जनम में किस तरह के जीव थे

आज वे चमचे बने दरबार में गाने लगे


जो नहीं समझे कभी भी ज़िंदगी का फलसफा

फेसबुक में वे सभी को आज समझाने लगे


@ गिरीश पंकज


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ग़ज़ल/ सरकार के हाथ तलवार

>> Thursday, June 22, 2023

 हाथ में जिसके यहाँ सरकार देखेंगे

जान लो के हाथ में तलवार देखेंगे


बात करते हैं मसीहा लोकतन्त्तर की

और पीछे खड्ग में कुछ धार देखेंगे


सह नहीं सकते कभी निंदा स्वयं  की वे

ये सियासी हैं महज जयकार देखेंगे


उस बार धोखे में तुम्हारे आ गए थे हम

क्या हमें करना है अब इस बार देखेंगे


याचकों जैसे कभी जो लोग आते थे

बाद में अकसर उन्हें मक्कार देखेंगे


हर तरफ धोखाधड़ी दिखती सियासत में

जाने कब सज्जन यहाँ दो-चार देखेंगे


कुछ अंधेरा देखकर पंकज करेंगे शोर

हम जलाएँ दीप जब अंधियार देखेंगे


@ गिरीश पंकज


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गीता प्रेस का अपमान नीचता से कम नहीं

>> Tuesday, June 20, 2023

 गीता प्रेस और गांधी शांति पुरस्कार


गिरीश पंकज


भारतीय समाज के नव निर्माण में गीता प्रेस, गोरखपुर योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता. उनकी श्रेष्ठ धार्मिक,नैतिक पुस्तकें घर-घर में पढ़ी जाती रही हैं. शायद ही कोई अभागा हिंदू परिवार हो, जहां गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित कोई ग्रंथ विद्यमान न होगा. रामायण, रामचरितमानस, श्रीमद भगवदगीता अथवा हनुमान चालीसा हर घर में मिल जाएगी. आज से सौ साल पहले हनुमानप्रसाद पोद्दार जी ने गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की थी. बाद में "कल्याण" नामक पत्रिका भी 1926 से प्रकाशित होने लगी, जो आज भी नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है. गीता प्रेस ने केवल धार्मिक साहित्य प्रकाशित नहीं किया, वरन नैतिकता के बीज रोपने के लिए अनेक प्रेरक  पुस्तकें प्रकाशित भी बहुत कम कीमत में प्रकाशित की. ऐसे गीता प्रेस को अभी हाल ही में जब एक करोड़ रुपये की राशि वाला अंतरराष्ट्रीय महात्मा गांधी  शांति पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसमें एक करोड़ की राशि प्रदान की जाती है। आश्चर्य हुआ यह देख कर कि   कांग्रेस के एक नेता ने पता नहीं किस झोंक में आकर यह कह दिया कि "गीता प्रेस को सम्मानित करना वीर सावरकर या गोडसे को सम्मानित करने जैसा है".शर्म आती है ऐसे लोगों पर जिन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर के अवदान को इस तरह से खारिज करने की कोशिश की। विपक्ष में होने का यह मतलबतो  नहीं कि सरकार के अच्छे निर्णयों की भी आलोचना की जाए? गीता प्रेस की महानता देखिए कि उसमें सम्मान तो स्वीकार किया लेकिन राशि नहीं ली, और यह कहा कि यह राशि किसी दूसरे काम में खर्च की जाए. जबकि गीता प्रेस  खुद संकट में रहा. बीच में तो इसके बंद होने की अफवाह भी उड़ी. लेकिन गनीमत है ऐसा नहीं हुआ . मैंने बचपन से ही गीता प्रेस की  पुस्तकें पढ़ कर थोड़े_बहुत संस्कार ग्रहण किए .कल्याण का तो आज भी नियमित पाठक हूं. जब मैंने अपना उपन्यास "एक गाय की आत्मकथा" लिखी, तब कल्याण के "गौ अंक" से मुझे काफी सामग्री मिली. कल्याण का हर साल निकलने वाला विशेषांक पठनीय होता है, संग्रहणी भी. हर पुस्तक में नैतिक संदेश मुख्य होता है . अगर आज गीता प्रेस गोरखपुर नहीं होता तो हमारा सनातन समाज नि:संदेह दिशाहीनता का शिकार हो सकता था . गीता प्रेस  के महान योगदान की मुक्त कंठ से सराहना की जानी चाहिए लेकिन पता नहीं कैसे एक घटिया नेता ने गीता प्रेस को सम्मानित किये जाने की तुलना गोडसे से कर दी ! लगता है इसने दुर्भाग्यवश कभी गीता प्रेस का कोई साहित्य पढ़ा ही नहीं. अगर पढ़ा होता तो उनका अनर्गल बयान सामने नही आता. अगर कांग्रेस के इस नेता के बयान की निंदा नहीं करती,  इस से अपने आपको अलग नहीं करती, तो इस देश की जनता को कांग्रेस के चरित्र के बारे में भी सोचना चाहिए. आज गीता प्रेस को विश्वस्तर पर सम्मान मिला है .इसी बहाने एक बार फिर गीताप्रेस की चर्चा हो रही है. फेसबुक के अपने उन परम मित्रों से आग्रह करूंगा जिन्होंने कभी गीता प्रेस का कोई साहित्य नहीं पढ़ा है. उन से अनुरोध है कि एक बार भी गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ें. संभव हो तो कल्याण पत्रिका को भी नियमित रूप से पढ़ें. कल्याण में सिर्फ धार्मिक बातें नहीं होती, मनुष्यता से जुड़ी अनेक कथाएं भी होती हैं. गीताप्रेस को अंतरराष्ट्रीय स्तर का सम्मान दिए जाने की जितनी भी तारीफ की जाए, कम है.


सरकारी विज्ञप्ति में गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार 2021  देते हुए बहुत सही कहा गया है कि "मानवता के सामूहिक उत्थान में योगदान देने में गीता प्रेस के महत्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान को मान्यता देता,है जो सच्चे अर्थों में गांधीवादी जीवन का प्रतीक है ।" यह  पुरस्कार सन 1995 से शुरू हुआ, तब  महात्मा गांधी की 125 वीं जयंती  मनाई जा रही थी। 6ह कितनी बड़ी बात है कि गीता प्रेस ने 14 भाषाओं में 41.7 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित की । यह बहुत बड़ा कीर्तिमान है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 29 अप्रैल 1923 में जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने गीता प्रेस और कल्याण पत्रिका की स्थापना की थी। यह एक बड़ा कीर्तिमान है कि गीताप्रेस ने  श्रीमद्भागवत गीता की 16.21 करोड़ प्रतियां  प्रकाशित की। रामचरित मानस और रामायण की बीबी करोड़ों प्रतियां अब तक छप चुकी हैं ।  कल्याण भी देश भक्त के लाखों पाठकों के सहारे निकल रही है। इसमें किसी भी किस्म का विज्ञापन नहीं छापा जाता। यह उल्लेखनीय पक्ष है। 


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>> Wednesday, January 11, 2023

कविता/ पहाड़ ने कहा 

पहाड़ को अगर तुम छेड़ोगे
तो पहाड़ तुम्हें नहीं छोड़ेगा 
खंड-खंड कर देगा एक दिन तुम सब को
जैसे सीता की पुकार पर 
फट गई थी धरती 
उसी तरह प्रकृति की चीत्कार से 
फट पड़ेगा पहाड़ 
समा जाएँगे उसमें 
न जाने कितने जोशीमठ 
इसलिए सावधान ! 
पहाड़ को पहाड़ रहने दो 
उसे नोट छापने की मशीन मत बनाओ 
मत चलाओ पहाड़ की छाती पर कुदाल 
वरना एक दिन बुरा होगा हाल
 अभी तो सिर्फ घरों में आई है दरारें
कल को न जाने कितने घर 
भरभरा कर गिर जाएँगे 
ताश के पत्तों की तरह
तथाकथित विकास और 
अधिकाधिक धन की लालसा में 
ये जो तुम बना रहे हो  न
नए-नए बांध और गगनचुंबी इमारतें 
एक दिन ले डूबोगे खुद को 
और दूसरों को भी 
रह-रहकर चेताता रहता है पहाड़
सावधान करता है तुमको
विनाश की छिटपुट वारदातों के साथ
 मगर अरे ओ मनुष्य!
 अकसर ही तुम
कहाँ समझ पाते हो  कोई बात। 
समझते तो हो मगर तब तक
बहुत देर हो जाती है
भगवान जाने तुम्हारी चेतना 
किस मठ में जा कर सो जाती है?

@ गिरीश पंकज

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नये वर्ष का संकल्प-गीत

>> Saturday, December 31, 2022

नये वर्ष का संकल्प-गीत


आओ मिल कर साथ चलें..

गिरीश पंकज


आओ, मिल कर साथ चलें ।

कोई मानव रहे न पीछे,
सबका हो सम्मान।
सबके जीवन में हो खुशियाँ,
सबका हो कल्यान।
घोर तिमिर को चलो मिटाएँ,
दीपक बन कर आज जलें।।
आओ, मिल कर साथ चलें ।

भेदभाव से ऊपर उठ कर,
रक्खें सोच-विचार।
क्या गरीब क्या धनी सभी से,
इक जैसा व्यवहार।
हम ऐसी ही सोच लिए बस,
इस ढाँचे में नित्य ढलें।।
आओ, मिल कर साथ चलें ।

कहीं रहे न भूखा कोई,
सबको रोटी दाल मिले।
सभी निरोगी रहें हमेशा,
हर जीवन खुशहाल मिले।
भले ठगे जाएँ हम लेकिन,
नहीं किसी को कभी छलें।।
आओ मिलकर साथ चलें।।

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अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर :

>> Tuesday, October 11, 2022


सुंदर कोमल कली बेटियाँ
होतीं अकसर भली बेटियाँ

कितना मीठा मन रखती हैं
ज्यों मिश्री की डली बेटियाँ

मत बांधो पैरों में बंधन
अंतरिक्ष को चली बेटियाँ

बेटे जब नाकारा निकले
माँ-बाप को भली बेटियाँ

गिरी हुई दुनिया दिखलातीं
ससुरालों में जली बेटियाँ

सुंदर कोमल कली बेटियाँ...

@ गिरीश पंकज

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शरद पूर्णिमा पर एक गीत/ पूरा-पूरा चाँद

>> Sunday, October 9, 2022


आज खिला मेरे आँगन में,
एकदम पूरा-पूरा चाँद।।

कहीं छिपा बैठा था यह तो,
हुए अभी दीदार ।
देख के इसकी सुंदरता को,
मन में जागा प्यार।
अरसे बाद गगन पर मैंने,
देखा ऐसा प्यारा चाँद।।

मन को शीतल करती आभा,
अद्भुत नेह जगाती।
खत्म विकारों को करती यह,
केवल प्रीत बढ़ाती।
हर मन में बस जाए आ कर
ऐसा न्यारा-न्यारा चाँद।।

रात शरद की बात कह रही,
जीवन हो मधुरम।
सुख की हो भरमार यहाँ बस,
दुख हों थोड़े कम।
ऐसा ही होगा, कहता है,
हमसे-तुमसे अच्छा चाँद।।

आज खिला मेरे आँगन में
एकदम पूरा-पूरा चाँद।।

@ गिरीश पंकज

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शरद पूर्णिमा पर एक गीत/ पूरा-पूरा चाँद


आज खिला मेरे आँगन में,
एकदम पूरा-पूरा चाँद।।

कहीं छिपा बैठा था यह तो,
हुए अभी दीदार ।
देख के इसकी सुंदरता को,
मन में जागा प्यार।
अरसे बाद गगन पर मैंने,
देखा ऐसा प्यारा चाँद।।

मन को शीतल करती आभा,
अद्भुत नेह जगाती।
खत्म विकारों को करती यह,
केवल प्रीत बढ़ाती।
हर मन में बस जाए आ कर
ऐसा न्यारा-न्यारा चाँद।।

रात शरद की बात कह रही,
जीवन हो मधुरम।
सुख की हो भरमार यहाँ बस,
दुख हों थोड़े कम।
ऐसा ही होगा, कहता है,
हमसे-तुमसे अच्छा चाँद।।

आज खिला मेरे आँगन में
एकदम पूरा-पूरा चाँद।।

@ गिरीश पंकज

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मुस्कान दिवस पर विशेष

>> Friday, October 7, 2022


शैतानों की बस्ती में इनसान बचा कर रखना है
अपने भीतर अपना इक भगवान बचा कर रखना है

चारों और रुलाने वाली हालत है फिर भी हमको
अपने अधरों पर थोड़ी मुस्कान बचा कर रखना है।

आकर हमलावरों ने अपना लूट लिया सारा वैभव 
सावधान रहना है सारा ज्ञान बचा कर रखना है

कुछ पाने की खातिर नीचे गिर जाएं यह ठीक नहीं
जैसे भी हम हैं खुद का सम्मान बचा कर रखना है

खुद्दारी के साथ क़लम औ' दो सूखी रोटी पंकज 
जीने का बस यह थोड़ा सामान बचा कर रखना है

@ गिरीश पंकज

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ग़ज़ल

>> Thursday, September 29, 2022

भ्रम से हमें निकलना होगा
अभी दूर तक चलना होगा

आगे होंगी बाधाएँ भी
लेकिन हमें संभलना होगा

कौन यहाँ रहता है हरदम
हमको भी तो ढलना होगा

आज मिला है किस्मत से जो
मौका शायद कल ना होगा

हाथ-पे-हाथ धरे मत बैठो
मुद्दा ऐसे हल ना होगा

दूर अंधेरा करना है तो
दीपक बन के जलना होगा

देश हमारा इसकी खातिर
जीना ही क्या मरना होगा

@ गिरीश पंकज

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नवगीत/ आज नये दु:शासन

>> Wednesday, September 7, 2022

कल एक वीडियो देखा, जिसमें एक पेड़ को उखाड़ कर गिराया जा रहा  और असंख्य पंछी घबरा कर इधर-उधर उड़ रहे हैं। कुछ पक्षी वृक्ष से ही दबकर मर गए। यह है हमारा तथाकथित विकास, जो न तो पर्यावरण के बारे में सोच रहा है और न पेड़ों में बसने वाले पक्षियों के बारे में। इस वीडियो को देखकर बना एक गीत :
--
हरा पेड़ क्या उखड़ा सारे,
पंछी भये उदास ।
कुछ रो कर के उड़े वहाँ से,
और हुए कुछ लाश।।

हरियाली के वस्त्र हर रहे,
आज नये दुःशासन।
देखो हम तो प्रगति कर रहे,
केवल नकली भासन।
नाम प्रगति का मगर हो रहा,
प्रतिपल सत्यानाश।।

कैसा अरे विकास जो करता,
वृक्षों की हत्याएँ।
चाहे मिट जाए हरियाली,
या आए विपदाएँ।
क्या होती है पेड़ की कीमत,
करो तनिक अहसास।। 

कभी सड़क चौड़ी करनी है,
कभी बनाना घर।
बिन इसके क्या काम न चले,
कैसी अंध डगर।
धरती को वीरान मत करो,
ओ धरती के दास।।

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ग़ज़ल

>> Monday, August 29, 2022

आदमी वैसा नहीं हूँ
भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ

ये ज़माना भूल जाए
ऐसा भी किस्सा नहीं हूँ

बोलता हूँ सच हमेशा
इसलिए अच्छा नहीं हूँ

हाँ-में-हाँ कैसे मिलाऊँ
बिक चुका बंदा नहीं हूँ

प्रेम की हूँ इक नदी मैं
आग का दरिया नहीं हूँ

मत खड़े हो जाओ मुझ पे
मैं तिरा कंधा नहीं हूँ

दूध की मक्खी निगल लूँ
मैं कोई अंधा नहीं हूँ

@ गिरीश पंकज

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आ जाओ अब कान्हा मेरे...

>> Friday, August 19, 2022

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है यह गीत, जिसमें मैंने श्री कृष्ण भगवान से गौ-रक्षा के लिए अवतरित होने की अपील की है : 
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पता नहीं किस नंदनवन में, 
भ्रमण कर रहे आज कन्हैया। 
इसीलिए तो लोग दुखी हैं,   
मरती जाती उनकी गैया।। 

बढ़ते जाते असुर यहाँ पर, 
देवों का हो गया पलायन।  
'गीता' को सब भूल गए हैं,
स्वारथ का इकतरफा गायन।
कंस रूप धर कर के नाना,
करता मानो ता-ता-थैया।।

कान्हा की मुरली की धुन में,
गऊ माता जब इठलाती थी।
चारा चरती थी जंगल में, 
और सुखी तब हो जाती थी। 
आज कहाँ चारा-सानी अब,
कचरा किस्मत में है भैया। 

आ जाओ अब तो ओ कान्हा,
असुरों का संहार करो तुम।  
नकली गौ - भक्तों को देखो, 
गायों का उद्धार करो तुम। 
गाय बचे तो देश बचेगा, 
कहती है यह तुझसे मैया। 

@ गिरीश पंकज

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नवगीत/घिर गए....

>> Tuesday, July 26, 2022


यश की लिप्सा में
कुछ घिर गए..

कदम-कदम पर समझौते थे,
और आत्मा भी रोई।
देख के अपने पाप बिचारी-
सुबह-शाम उसको धोई।
मिल जाए कुछ लाभ सोच कर,
लोग बहुत नीचे तक गिर गए।
यश की लिप्सा में कुछ घिर गए।

जो थे लंपट वही भा गए।
 नैतिकता को बेच खा गए ।
पुण्य कमाने निकले थे पर
लोग पाप नगरी में आ गए।
जहां हुआ अपमान वहीं कुछ
यश पाने की खातिर फिर गए।।
यश की लिप्सा में कुछ घिर गए।

साथ बुरे लोगों का लेकिन 
मन में थोड़ी-सी दुविधा थी।
 लम्पट ही कुछ दिलवाएंगे,
वहाँ यही तो इक सुविधा थी।
हुआ पाप पर पुण्य कमाने ,
दौड़ भाग करके मंदिर गए।
यश की लिप्सा में कुछ घिर गए।

@ गिरीश पंकज

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ग़ज़ल / बदले कहाँ दलाल....

>> Monday, July 11, 2022


सत्ता बदल गई हो लेकिन बदले नहीं दलाल
पहले भी खुशहाल वही थे अब भी हैं ख़ुशहाल

कुछ लोगों ने जीने का फन सीख लिया कब से
नाच रहे वे हर कुरसी संग दे-दे कर के ताल

खुशहाली के सारे वादे निकल गए फ़र्ज़ी
जनता नित कंगाल मगर कुछ चमचे मालामाल

बहुत भरोसा करके जिसने सौंपी थी कुरसी
आज वही जनता रूठी है करे नित्य हड़ताल

बहुत भरोसा था जनता को लेकिन वह टूटा
कहाँ सोचती हैं सत्ताएँ करे न कुछ पड़ताल

लोकतंत्र के नाम पे केवल दिखते तानाशाह
जो सच बोले नुच जाती है, उस बंदे की खाल

जो सोचे मैं नहीं मरूँगा कर लूँ अत्याचार
उसको भी इक दिन आकर के ले जाता है काल

मछली हो नादान अगर तो फँस ही जाती है
इसीलिए आये मछुआरे लेकर अपने जाल

नकली लोकतंत्र में सबसे अच्छी है अब 'चूप'
क्रांतिकारी पंकजजी हरदम रखना इसका ख्याल

गिरीश पंकज

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ग़ज़ल / पाँच सितारा होटल में....

>> Friday, July 8, 2022

भूख-गरीबी पर चर्चा है पाँच सितारा होटल में
यह मज़ाक कितना अच्छा है पाँच सितारा होटल में

गांधी की चर्चा करते हैं मुर्गमुसल्लम खाकर वे
गांधी फिर रोता बैठा है पाँच सितारा होटल में

भूखे लोगों की हालत पर शोक मनाने आए हैं
हर नेता-अफसर रोता है पाँच सितारा होटल में

चेहरा कुछ मासूम बनाकर लोगों को भरमाते हैं
खलनायक मन में हँसता है पाँच सितारा होटल में

मिलजुल के सब ठगते रहते भोली-भाली जनता को
इसी खुशी में फिर जलसा है पाँच सितारा होटल में

पहले भी कुछ लूट रहे थे अब हैं नये-नये चेहरे
सभी लुटेरों का अड्डा है पाँच सितारा होटल में

लोकतंत्र की बात करो पर लोगों से रक्खो दूरी!
तभी तो वह नेता बैठा है पाँच सितारा होटल में

रोज़ उसे उदघाटन-भाषण करने की बीमारी है
मंत्री फिर आ कर मरता है पाँच सितारा होटल में

अफसर, मंत्री को फुसलाकर मुट्ठी में कर लेता है
इनका गठबंधन फलता है पाँच सितारा होटल में

@ गिरीश पंकज

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गीत/ मछली भूखी फँसी जाल में ...

>> Thursday, June 16, 2022


मछली भूखी फँसी जाल में...

पानी उसका रहा ठिकाना।
मगर चाहती थी वह दाना ।
तभी जाल के संग मछेरा,
ले आया थोड़ा-सा खाना ।
दौड़ पड़ी पाने को फिर वह,
बिन सोचे बस हर हाल में ।
मछली भूखी फँसी जाल में।।

दाने के लालच में कट गई।
बाकी की फिर छाती फट गई ।
समझदार थी नन्हीं मछली, 
वह जाल से फौरन हट गई ।
नीचे तिरती रही ताल में ।
भूखी मछली फँसी जाल में।।

मछली हम को सबक सिखाए।
लालच में ना कोई आए।
बुरी बला है यह तो सचमुच,
जो फँसता है वह पछताए ।
समझदार क्यों फँसे कहीं भी,
 रहता है वह इसी ख्याल में।

भूखी मछली फँसी जाल में।।

गिरीश पंकज

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>> Thursday, June 9, 2022

जागरण और नई दुनिया के सभी संस्करणों में 6 जून को प्रकाशित गीत।


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ग़ज़ल

दौर यह कैसा चलाया जा रहा
झूठ को सुंदर बताया जा रहा

सज्जनों को मंच अब मिलता नहीं
दुर्जनों को सिर चढ़ाया जा रहा

सत्य को स्वीकार करना चाहिए
पर उसी से मुँह फिराया जा रहा

जो नहीं हैं लोग बस चेहरा वही
आजकल सब को दिखाया जा रहा

अब अंधेरा कुछ नहीं कर पाएगा
क्योंके इक दीपक जलाया जा रहा

@ गिरीश पंकज

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ग़ज़ल

>> Thursday, May 26, 2022

राजनीति बस छल देती है
कहाँ कोई वो हल देती है

क्रूर सियासत हर सपने को
फूलों जैसा मल देती है

आँगन में तुलसी रहने दो
अम्मा इसको जल देती है

रहे हमेशा भीतर जिंदा
वही चेतना बल देती है

हमको अपनी खुशियां पंकज
हरियाली प्रतिपल देती है

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सुनिए गिरीश पंकज को

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