''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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पृथ्वी...गीत, कविता, ग़ज़ल...

>> Thursday, April 22, 2010

आज पृथ्वी दिवस है. इस वक़्त पृथ्वी ही हमारी चिंता के केंद्र में होनी चाहिए, वरना हम सबकी हालत चिंतनीय हो जायेगी. हम लोग तो पृथ्वी को बर्बाद करके चले जायेंगे, मगर सोचिये, आने वाली पीढी को कितना कुछ झेलना पडेगा. हम लोगों ने तो अभी से झेलना शुरू कर दिया है. अभी तो ये ''अंगडाई'' है. आगे और तबाही है. अखबारों या ब्लागों में भी तरह-तरह के आंकड़ों से अटे-पड़े पृथ्वीविषयक लेख आप सब पढ़ ही चुके होंगे. डर भी लगा होगा. बहरहाल, मै अपने मन की बातें कविताओं के माध्यम से रख रहा हूँ. मन नहीं माना, सो एक गीतांश, एक नयी कविता और चंद शेर समर्पित हैं इस ''पृथ्वी-दिवस'' को. इसी भावना के साथ,कि मुझे अपनी बात कहनी है, सुने न सुने कोई मेरी पुकार-

/गीत
हरी-भरी इस धरती को हम,
और न बंटने देंगे.
धरती माँ है, पेड़ पुत्र हैं,
इन्हें न कटने देंगे..

अगर न होते पेड़ न होती,
ये सुन्दर हरियाली.
सूरज हमको झुलसा देता,
किस्मत होती काली.
धरा-पुत्र को माँ-सेवा से
कभी ना हटने देंगे..

हरी-भरी इस धरती को.....
/ कविता 
धरती और स्त्री दोनों के लिए हमारे पास 
एक ही शब्द है.. करुणा
दोनों के प्रति व्यवहार के लिए 
हमारे पास एक ही शब्द है...हिंसा 
कट रहे हैं हरे-भरे पेड़
जैसे मिटाई जा रही हैं औरतें...
कभी भ्रूण में, तो
कभी समूची देह
जिस दिन करुणा को 
रूपांतरित कर देंगे स्त्री के लिए
पृथ्वी अपने आप बचती जायेगी.
हमारी खुदगर्जी का आलम यह है कि
पेड़ हमें बिलकुल कीड़े-मकोड़े-से लगते हैं
जो लोग दौलत के लिए स्वजन को बेच देते है,
वे लोग  उतनी ही फुर्ती के साथ 
काट देते है पेड़ या
बेच देते है गाय. 
पेड़ों के हत्यारे 
समझ नहीं पाते अपना पाप 
और मूक धरती देखती रह जाती है चुपचाप 
बोल नहीं पाती 
लेकिन जैसे अब औरत चीख-चीख कर 
प्रतिकार कर रही है
पृथ्वी...तुम भी उठो...
चीखो न..
कभी सुनामी 
कभी ज्वालामुखी 
कभी भूकंप..
वैसे चीखती तो हो
प्रतिकार भी करती हो..
लेकिन आदमी तो आदमी है न
बहुत देर हो जाने के बाद चीज़ों को समझता है.
और तब तक 
उसके महाप्रयाण की बेला आ जाती है..
३/ ग़ज़ल...   
सचमुच सबकी माता धरती
अपनी भाग्यविधाता धरती

लूट रहा है किसकी अस्मत
मानव समझ न पाता धरती

काश कहीं तुम मिल जाती तो
अपना दर्द सुनाता धरती

तुझ में ही तो खो जाना है
तुझसे ऐसा नाता धरती

तुम हो माँ से बढ़ कर सबकी
रिश्ता यही सुहाता धरती

नदी, हवा के संग ये पर्वत
गीत तुम्हारे गाता धरती

उजड़ रहा हरियाला-आँचल
लालच ही उकसाता धरती

माँ के बाद नाम जुबाँ पे 
बार-बार बस आता...धरती      

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देखते ही देखते नया वर्ष भी आ गया....

>> Thursday, December 31, 2009

लो.....देखते ही देखते नया वर्ष भी आ गया. 
पुराना जैसा भी था, 
अपना ही था, मगर नया तो कुछ ज्यादा ही भा गया.
क्योकि दस में  दम है , और 'काफिये' का रस है 
इसमे 'यश' है...
'हस' है ..
'यस' (हाँ ) भी है ...
'बस' भी है लेकिन उपलब्धियों के मामले में 'बस'  न रहे.
कोई भी भला आदमी बेबस न रहे

अब यह साल नया है तो हमारे सपने भी नए होंगे 
पुरानों के संग में  कुछ अपने भी नए होंगे 
नए साथी मिले अच्छा लगा.
हम फूल-सा खिले अच्छा लगा. 
नए  साल में हर कोई खुशहाल रहे, 
दुनिया में कहीं अशांति न हो. हर शख्स मालामाल रहे..
'अंतरजाल' ने तो सबको जोड़ दिया है. 
देशों की  बाधाओं (वीसा) को तोड़ दिया है. 
गाँव में बैठा इनसान भी शहर से जुड़ गया है. 
हर रास्ता विकास की ओर मुड़ गया है. 
एक-दूसरे से रू-ब-रू मिले नहीं, मगर बात हो रही है.
ऐसा लग रहा है कि मुलाकात हो रही है
सिलसिला जारी रहे, सद्भावों की ''उड़नतश्तरी''  
इधर से उधर मंडराती रहे..
प्रेमका सन्देश फैलती रहे...
जो जहाँ है, अच्छा काम करे
अपना, (अपनी जाति या धर्म का नहीं) अपने देश का नाम करे.
कोई संकुचित न रहे,विशाल बने..
लोग कहें देखो इसको..ऐसी कोई अच्छी मिसाल बने. 
दूसरों के दर्द की हम एक दवा हो जाएँ
काम ऐसे ही करें और फना हो जाएँ.
अपने लिए तो मै बस इतना ही कहूँगा,
कि अपनी कृतियों के माध्यम से आपके सब के दिलो में रहूँगा.
आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं...
सारे ब्लोगर भाइयों को, ब्लॉग देखने या पढ़ने वालों को
पढ़ कर अपनी टिप्पणियाँ देने वालों को...
सबके लिए यह वर्ष मंगल हो
हर्ष से भरा उत्कर्ष मंगल हो...

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एक नई कविता/बाल-सखा तितलियों की तरह आते है जीवन में

>> Monday, December 7, 2009

बाल-सखा तितलियों की तरह आते है जीवन में
बहुत दिनों के बाद
जब किसी बाल-सखा से मिलो
तो ऐसा लगता है कि
वक्त के बैंक ने हमें
अचानक बहुत-सारा डिविडेंड भेज दिया है
हम फ्लेशबैक वाली सिनेमाई रील में तब्दील हो गए है.
सहसा हम हो जाते है बच्चे
शरारत करते है.आँखों-आँखों में
और मटरगश्ती 
बाल-सखा मिल जाए तो पता नहीं
कहाँ से पानी चला आता है
आँखों के भीतर
और बहता रहता है.
कभी बाहर तो कभी भीतर
कभी हंसते है
तो कभी रो पड़ते है 
बाल-सखा तितलियों की तरह आते है जीवन में
और सहसा फिर उड़ जाते है बहुत दूर....
परियों के देश/ या फिर न जाने कहाँ
उस दिन जब नरसिंह वैश्य मिला तो मै
बहुत खुश हुआ
उसके जाने के बाद बहुत देर तक
आखों से बहती रही अश्रुधार
लेकिन उसे भी अपनी ज़िंदगी में लौटना था
और वह चला गया
सहसा उदासी के रेगिस्तान में छोड़ कर
कभी-कभी सोचता हूँ कि बचपन के दिन
इतनी जल्दी क्यों बीत जाते है
क्यों नहीं होता बचपन का एक दिन
एक साल की तरह?
बहुत दिनों के बाद जब किसी बाल सखा से मिलो तो
तो सोचना हम पौधों में तब्दील हो गए है
और बड़े हो रहे हैं धीरे-धीरे
वक्त के सिपाही को अंगूठा दिखाते
बाल सखा के हाथों को
अपने हाथो में ले कर खड़े रहना कुछ देर
फिर देखना
उसकी हथेलियों का ताप
कैसे तुम्हे यकायक फिर जवान कर देता है.
बहुत दिनों के बाद
जब किसी बाल-सखा से मिलो
तो खुद को बड़ा समझने की नादानी मत करना.
प्लीज़ ....

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सुनिए गिरीश पंकज को

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