''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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महावीर वचनामृत -12

>> Sunday, March 14, 2010


बहुत दिनों के बाद फिर हाज़िर हूँ. महावीर वचनामृत के साथ. कही लोग बोर तो नहीं हो रहे...? लेकिन ऐसा लगता नहीं. सुधी लेखक-पाठक टिप्पणियाँ कर रहे है.बहुत जल्द कुछ् और नयी रचनाएँ पेश करूंगा.

(109)
धर्म-प्राण जन से रखें, जीवन में अनुराग।
प्रियभाषी सम्यक वही, भव्य परम है भाग।।

(110)
निर्मल मन प्रवचन करे, तपी, कवि जो होय।
वे ही सच्चे धारमिक, सबका अंतस धोय।।

(111)
चरित्र-शून्य जो हो गया, शास्त्र-ज्ञान बेकार।
लाखों दीप न दे सकें, अंधे को उजियार।।

(112)
अल्पज्ञान भी है बहुत, हो चरित्र गर पास।
चरित्रहीन ज्ञानी बहुत, लेकिन वह बकवास।।

(113)
राग-द्वेष व्यापे नहीं, सुख-दु:ख में समभाव।
ऐसे भिक्षु से सदा, रक्खे गाँव लगाव।।

(114)
जो मानव हित सोचते, करते अल्पाहार।
उन्हें वैद्य की फिर कभी, पड़ती ना दरकार।।

(115)
ज्यादा रस सेवन करो, तो बढ़ता उन्माद।
मीठे फल हो पेड़ पर, करे पक्षी बर्बाद।।

(116)
कटूवचन, चोरी-जुआ, नशा-नारि का संग।
व्यसन रहे ये तो सभी, नित करते बदरंग।।

(117)
माँस खाय, मदिरा पिये, फिर द्यूत का साथ।
एक बुराई से मनुज, सब दोषों का नाथ।।

(118)
माँस खाये जो विप्र तो, पतित हुआ घनघोर।
मद्यपान भी जो करे, लाय दु:खों का दौर।।

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महावीर वचनामृत-11

>> Tuesday, March 2, 2010


होली तो हो ली. कब तक उसके रंग में रहे. यह संभव भी नहीं. जीवन को दिशा देने वाले पडावों से गुजर कर ही हम नेकराह पर चल सकते है. गंतव्य भी यह है. नेकराह पर चलना, नेक मनुष्य बने रहना. तमाम तरह की मुसीबतों के बावजूद. महावीर भगवान् के सन्देश यही बताते है. ज्ञान की बाते तो अनेक बार कही गयी है .पर लोग कितना अमल में लाते है? फिर भी यह मान कर चला जाये कि कुछ न कुछ् तो असर होता ही है. बहरहाल, एक बार फिर पेश है महावीर-वचनामृत.... केवल सुधीपाठको के लिए,क्योंकि कुछ् ऐसे लोग भी है, जिनको ये सब पागलपन-पिछ्डापन ही लगता है, खैर...)

(98) 
क्षमा, सत्य, संयम तथा, त्याग और तप-कर्म,
ब्रह्मचर्य व शौच भी, ये सब उत्तम धर्म।।

(99)
क्षमा करें हम जीव को, महावीर की सीख।
बैर-भाव ना पालना, मित्र सभी का दीख।।

(100)
जो सच्चा माँ की तरह, गुरु जैसा ही वंद।
अपनों जैसा प्रिय रहे, सब रखते संबंध।।

(101)
समता औ संतोष से, लोभ स्वयं के धोय।
भोगों की लिप्सा नहीं, विमल हृदय वो होय।।

(102)
त्यागी वह जो भोग से, पीठ सदा ले फेर।
परिग्रहों से दूर हो, तप में करे न देर।।

(103)
शीलवान नारी सदा, बनती है यशवान।
देव तलक वंदन करें, वह ऐसी भगवान।।

(104)
एक दीप से जल उठे, देखो कितने दीप।
करे प्रकाशित गुरू सदा, बनकर एक सुदीप।।

(104)
जितने जन भी श्रेष्ठ हैं, उनको सम्यक-ज्ञान।
वे सच्चे जीतेंद्र हैं, जाय जगत पहचान।।

(105)
सम्यक-दृष्टि मिल गई, भय पास नही आय।
शंकाओं से मुक्त वह, विश्वजीत बन जाय।।

(106)
स्व-पूजा से जो परे, तारीफों से दूर।
भिक्षु-तपस्वी है वही, दुनिया में मशहूर।।

(107)
चाहें गर परलोक तो, ख्याति, लाभ, सत्कार।
ये सब चीजें व्यर्थ हैं, इसमें सुख, ना सार।।

(108)
तप, मुक्ति, दर्शन, चरित, क्षमा और प्रज्ञान।
इन सब को लेकर चलो, होय तभी उत्थान।
..............................................
इसबार महावीर-वचनामृत में एक दोहा माँ पर भी आया है.यह संयोग है,कि मेरे अनुज संजीव तिवारी ने अपने ब्लॉग आरम्भ में आज ही माँ पर केन्द्रित मेरा एक संस्मरण  प्रकाशित किया है.आप उसे भी देख सके तो कृपा होगी.  

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महावीर वचनामृत-१०

>> Monday, February 22, 2010

(87)
केवल मैं ही श्रेष्ठ हूँ, मेरे उच्च विचार।
यह बोध सम्यक नहीं, मिथ्या यह आचार।।

(88)
जन्म, बुढ़ापा, रोग अरु, मरन दुःखों की खान।
दुःख ही दुःख चारों तरफ, केवल ज्ञान निदान।।

(89)
संगति सही न मिल सकी, भटका मैं चिरकाल।
मूढ़मति बन कर रहा, जग-जंगल विकराल।।

(90)
शत्रु से ज्यादा करे, राग-द्वेष नुकसान।
दूर रहे इनसे वही, जो है प्रज्ञावान।

(91)
जाना गर तू चाहता, भवसागर से पार।
तप-संयम की नाव में, हो जा तुरत सवार।।

(92)
जीव भला क्या देव भी, दुःखी रहे यह सत्य।
काम-वासना ग्रस्त जो, उसकी हो यह गत्य ।।

(93)
जब विराग उत्पन्न हो, सब कुछ है निस्सार।
आसक्तों को ही करे, आकर्षित संसार।।

(94)
राग-द्वेष जब मिट गए, हो समता उत्पन्न।
तृष्ना से ऊपर उठे, रहता मनुज प्रसन्न ।।

(95)
भाव-विरक्त हो कर मनुज, शोक-मुक्त हो जात।
जैसे जल में भी रहे, मुक्त कमल के पात।।

(97)
जो सत्कर्मों में उन्हें, करते देव प्रनाम।
संयम-तप ही धर्म है, ये मोक्ष के धाम।।

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दस फागुनी दोहे

होली पास आ रही है. बहुतो पर तो रंग अभी से ही चढ़ रहा है. पता नहीं, होली के दिन उनकी गत क्या होगी..? होली एक नशे की तरह आती है और लोग शरीर और मन दोनों के कपडे उतारने में लग जाते है. गालिया देना, कीचड उछालना, किसी की निंदा करना...बस यही रह गया है होली का अर्थ? सकल-कर्म कर लो और अंत में कह दो-''बुरा न मानो होली है''. गोया होली इज्ज़त उतारने का बहाना है. होली के दिन आदमी के असली चेहरे को भी पढ़ा जा सकता है. साल भर बेचारा वर्जनाओ में रहता है. नकलीपन को ओढ़े रहता है. होली में वह अपनी औकात पर आता है. है तरह से नंगा हो जाता है. तो ऐसा कुछ बन गया है यह त्यौहार. मै रचनाकार हूँ, इसलिए वैसा कुछ नहीं कर सकता. मुझे लगता है, कि रचनाकार समाज को दिशा देने का करता है, वही जब कपडे उतारने लगेगा तो कपडे पहनाने का काम कौन करेगा...? कोई तो बचा रहे. खैर...''थोथी तारीफ'' के 'निकृष्ट-कर्म' से मुक्त हो कर अब होली का सात्विक-मूड बनाया जाये, सो, प्रस्तुत है दस दोहे. होली के रंग में रंगे. होली की एडवांस में बधाई, रंग-गुलाल, (अरे-अरे....) भांग और मिठाइयाँ भी...
दस फागुनी दोहे
(१)
रंग मिले आकाश से, पूरी हो गई आस,
कहा पवन ने अब लगा, सफल हुआ मधुमास.
(२)
इन्द्रधनुष-सा खिंच गया, चित्र बना अभिराम,
धरती नाची इस तरह, राधा संग घनश्याम.
(३)
फाग दिवस है प्रेम का, भूलो सारे राग,
कलुष सभी डालो यहाँ, इसीलिये है आग..
(४)
रंग चढ़ा कुछ इस तरह, गाल हो गए लाल,
राधा बोली हे सखी, छूटे न इस साल.
(५)
पिचकारी के रंग में, भरा प्रेम का नीर,
बूँद-बूँद हरने लगी, इस धरती की पीर.
(६)
फागुन आया है सखी, 'वो' भी आयें पास,
बिन उनके तो रंग का, होत न कुछ अहसास.
(७)
होली का मतलब मिलन, रंग-अर्थ है प्यार.
मिले सभी आ कर तभी, सतरंगी संसार.
(८)
रंग चढ़ा ऐसा यहाँ, रही नहीं पहचान.
कहाँ रहा कोई इधर, अब गरीब-धनवान.
(९)
भंग-मिठाई संग हो, तो फागुन का रंग,
बिन इसके दुनिया लगे, हो जैसे बदरंग.
(१०)
रहे साल भर यूं बने, फागुन के दिन चार,
रोज रंग के संग हो, यह सुन्दर संसार...

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महावीर वचनामृत-९

>> Sunday, February 21, 2010


बहुत दिनों के बाद फिर हाज़िर हूँ. आपका स्वागत है.... कुछ् तकनीकी दिक्कतों के कारण मेरे प्रियजन अपनी टिप्पणियाँ नहीं दे पा रहे थे. उम्मीद है, अब समस्या का समाधान हो गया हो.
(77)
नर-नारी में भेद क्या, सब हैं जीव समान।
साथ-साथ चलते रहें, होगा नव निर्मान।।

(78)
नारी रहे समूह में, ब्रह्मचर्य बच जाय।
साधु अकेला ना रहे, दो हों तो सुखदाय।।

(79)
जो जीता वह जैन है, हिंसा से जो दूर।
मारे से मरना भला, जो सोचे वह शूर।।
(80)
अधर्म और अन्याय का, मत करना आहार।
नपा-तुला भोजन रहे, सस्नेह स्वीकार।।

(81)
सत्यग्राही जीवन बने, परिग्रहों से मुक्त।
मंगल ही मंगल रहे, जीवन सुख से युक्त।।

(82)
अर्हत, सिद्धों औ गुरू, साधू को परनाम।
पाप विनाशक ये सभी, हैं सच्चे सुख-धाम।।

(83)
वीतराग हे जगत गुरू, दे मुझको आशीष।
विरक्त रहूँ इस जगत से, पाऊँ तब जगदीश।।

(84)
कामजनित दुःख भी लगे, जैसे सुख की खान।
खुजली पाछे दुःख मिले, छोड़े ना इनसान।।

(85)
झूठा हरदम हो दुःखी, भयग्रस्त दिन-रात।
व्याकुल रहता हर घड़ी, खुल ना जाए बात।।

(86)
कुटिल वचन जो ना कहे, करे न कड़वे काज।
वही धार्मिक है सही, पूजे उसे समाज।।

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महावीर वचनामृत-८

>> Sunday, February 14, 2010

(66)
यह तन इक नौका लघु, नाविक इसका जीव।
पार करे जीवन-जलधि, खारा पानी पीव।।

(67)
वीर मरे, कायर मरे, अंत सभी का होय।
लेकिन जो हँसकर मरे, वीर जानिए सोय।।

(68)
ध्यान करे जो ध्यान से, चित्त होय अनुकूल।
जन्म-मरण के  बंध को, प्राणी जाए भूल।।

(69)
चले आत्मा मोक्ष-पथ, करो उसी का ध्यान।
कर विहार ध्यानस्थ हो, तभी आत्म-कल्यान।।

(70)
कटु वचन जो बोलते, उन्हें क्षमा का दान।
मधुर-वचन बोलें सदा, यह सद्गुण की खान।।

(71)
सेनापति मर जाय तो, सेना का हो हा्रस।
मोह नष्ट हो जाय तो, दुष्कर्मों का नाश।।

(72)
दु:ख-सुख-पीड़ा से परे, जिसने किया प्रयाण।
क्षुधा गई, तृष्णा मिटी, वही सत्य निर्वाण।।

(73)
ज्ञान-शरण जो भी गया, तप-संयम के साथ।
मुक्ति उसे मिल जायगी, महावीर हैं नाथ।।

(74)
संत-वचन सुन लीजिए, हो जीवन की जय।
चले सुपथ पर जीव तब, नहीं मृत्यु का भय।।

(75)
जीवों की रक्षा करे, वही जैन है नेक।

जो ऐसा ना कर सके, विकसित नहीं विवेक।।
..........................
लेकिन मित्रो, इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है, कि मुंबई के देवनार में एशिया का सबसे बड़ा कसाईखाना एक जैन महाशय ही चला रहे है. जहाँ रोज हजारो बेबस पशु कटते है. और हमारी गौ माताएं...? उनकी संख्या तो पूछिए मत.. पता नहीं कब उनके मन में महावीर भगवान् की करुणा का उदय होगा? हम सब को मिलजुल कर इस अ-जैन के विरुद्ध एक वातावरण बनाने की कोशिश की जानी चाहिए.

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महावीर वचनामृत-७

>> Sunday, February 7, 2010

(56)
धर्म, दया से शून्य जो, झगड़ालू औ दुष्ट।
मंदबुद्धि वह जानिए, कभी न हो संतुष्ट।।

(57)
जो मन से है शुद्ध वह, जीते यह संसार।
पवन सहारे नाव ज्यों, लग जाती है पार।।

(58)
कर्म अकेला भोगता, अंत काल इनसान।
कौन यहाँ अपना अरे, जो समझे नादान।।

(59)
माँस-अस्थि, मल-मूत्र से, तुच्छ बनी यह देह।
इसमें सुख ना खोजिए, ये क्षणभंगुर गेह।।
(गेह-घर)

(60)
गई आत्मा तो करे, अज्ञानी ही शोक।
और स्वयं की आत्मा, को पाए ना रोक।।

(61)
जन्म हुआ तो मृत्यु भी, तय है सबका वक्त।
इस $फानी संसार पर, क्यों इतना आसक्त।।
(62)
ध्यान-मग्न जो मनुज है, कुछ भी रखे न याद।
हर्ष-ईर्षा-मुक्त को, कैसाशोक-विषाद।।

(63)
धर्म-श्रवण बेकार है, गर श्रद्धा ना होय।
मोक्ष भला कैसे मिले, जब ना अंतस धोय।।

(64)
राग-द्वेष से दूर हो, करें सभी से प्यार।
समदर्शी जो बन गया, उसका बेड़ा पार।।

(65)
मोह-मैल से मुक्त हो, स्वच्छ भया उर-नीर।
वीतराग जीवन बना, सुंदर-पावन वीर ।।

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दस वासंती दोहे

>> Thursday, February 4, 2010

(१)

अधरों पर मुस्कान लख,
हुआ दुखों का अंत,
लगा पास फिर आ गया,
भटका हुआ वसंत.
(२)
मन में थी दुःख की लहर,
मौसम दिखा उदास,
खुशियाँ जन्मी तो लगा,
चौतरफा मधुमास.
(३)
तुमने जब-जब भी छुआ,
भागा हर संताप,
मौसम भी हँसता प्रिये,
दूर खडा चुपचाप.
(४)
रंग भरे हर पल यहाँ,
देख तुम्हारा रूप,
रूमानी लगने लगी,
पल में तीखी धूप.
(५)
गीत मगन हो गा रहा,
मन ये सुबहोशाम,
संग तेरा मिल जाये,
दुःख लागे सुखधाम..
(६)
जब तक अंतस है युवा,
प्रतिदिन रहा वसंत.
जिस दिन हारे हम हुआ,
हर वसंत का अंत..
(७)
पतझर भी हमको दिखे,
खिला-खिला मधुमास.
जीवन जीवन है तभी,
जब सुन्दर अहसास.
(८)
फूल कहें सीखो ज़रा,
तुम जीवन की रीत.
काँटों में भी हम खिलें,
बिखरा दें नव-प्रीत.
(९)
तन मिलना आसान है,
मन मिलना है दूर.
मन मिल जाये तब लगे,
प्रेम हुआ भरपूर..
(१०)
मौसम लिखता प्रेमपत्र,
बांच रहा आकाश.
बोल पड़े खगवृन्द तब,
कुहू-कुहू मधुमास.

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महावीर वचनामृत-६

>> Tuesday, February 2, 2010

(46)

हो जैसा अभ्यास तो, वैसा बनता भाव।
नेक जनों का संग हो,तो कैसा पछताव।।

(47)
जिसे मृत्यु का भय नहीं, वह दुर्लभ इनसान।
भोगी ही भयगस्त है, करते संत बखान।।

(48)
ज्ञान-शरण जो भी गया, उसका बढ़ा विवेक।
नैतिक, तप, संयम सभी, पा लाखों में एक।।

(49)
मेरा मत केवल सही, बाकी सब बेकार।
वे निंदा के पात्र हैं, जिनके तुच्छ विचार।।

(50)
सबकी अपनी सोच है, सबके अपने कौल।
नीर-झीर करते रहो, तुम बातों को तौल।।

(51)
तरह-तरह के पंथ हैं, सबके अपने कथ्य।
उसने ही नव-पथ गढ़ा, जिसने पाया सत्य।।

(52)
अगर अधर्मी जीव है, कभी नहीं सुख पाय।
बिन पानी के कुंड की, कैसे प्यास बुझाय।।

(53)
तनिक रहे अभिमान तो, नहीं मिलेगा बोध।
विनय जगे तो उस घड़ी, नष्ट काम अरु क्रोध।।

(54)
इक दिन सबका अंत है, ज्ञानी, राजा, रंक।
जो मानव हित में मरे, मिले मोक्ष नि:शंक।।

(55)
सबकी जो निंदा करे, सदा रुष्ट,भयभीत।
वह मनुष्य कमजोर है, कौन करेगा प्रीत।।

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महांवीर वचनामृत-५

>> Monday, February 1, 2010

(३६)
दान-धर्म, पूजा अगर, स्वारथ में जो होय।
उसे पुण्य न मिल सके, उल्टे वैभव खोय।।

(37)
बिन चरित्र जो ज्ञान है, तप जो संयमहीन।
व्यर्थ इसे बस जानिए, मनुज बड़ा वह दीन।।

(38)
जीवन में जो पा गया, इक दिन सम्यक-ज्ञान।
मोक्ष उसे ही मिल सका, कहते साधु-सुजान।।

(39)
मौन रहे ज्ञानी सदा, मूरख अति वाचाल।
योगी स्वर्ग सिधारता, भोगी हो बदहाल।।

(40)
सुई धागे में हो अगर, कभी नहीं खो पाय।
ज्ञानयुक्त हर जीव भी, भवसागर तर जाय।।

(41)
दूध और जल की तरह, सब धर्मों का साथ।
नहीं अलग कोई यहाँ, ज्ञानी समझें बात।।

(42)
वाह-वाह खुद की करे, दे सुजनों का दोष।
गाँठ बाँध ले बैर की, पाय कभी ना तोष।।

(४३)

हरदम मीठे बोल हों, और क्षमा का भाव।
जिनमें ये गुण देखिए, उनसे करें लगाव।
(44)
जो सुख-दु:ख निरपेक्ष हैं, हित-अनहित से दूर।
वही श्रमण सच्चा सुनो, जीव सही में शूर।।

(45)
मोक्ष-मार्ग पर चल पथिक, रहे उसी का ध्यान।
कर विहार मन से जरा, होय तेरा कल्यान।।

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महावीर वचनामृत-४

>> Friday, January 29, 2010


महावीर जी के वचनों को दोहे कि शक्ल में रूपान्तरित करने का प्रयास, लगता है, सुधीजन को उतना रास नहीं आ रहा है. इसीलिये वैसी प्रतिक्रिया भी नहीं हो रही, जैसी होनी चाहिए. खैर मै इससे विचलित नहीं हूँ. मेरा काम है लिखना. पहले भी विचलित नहीं हुआ, अब क्या होऊंगा. मेरे ये वचनामृत प्रिंट में भी आयेंगे. पुस्तक रूप में. तब सामान्य जन तकभी  पहुंचेंगे. ब्लॉग तक अभी आम जन पहुंचे ही कहाँ है. बहरहाल कुछ लोग तो पढ़ ही रहे है. बात निकली है, तो फिर दूर तलक जायेगी ही. प्रस्तुत है चौथी कड़ी-
(२६)
शीलवान गंभीर जो, रहे क्रोध से दूर।
सत्यशील ज्ञानी वही, प्रियजन से भरपूर।।

(27)
उत्तमजन हैं फूल-से, जिनमें सदा सुवास।
दुर्गुण के पतझार में, ये लगते मधुमास।।

(28)
हो स्वर्ण या लौह की, है तो वह जंजीर।
पड़ो न इनके फेर में, हरो जगत की पीर।।

(29)
भले विचारों से बने, मानव की तकदीर।
नेक राह जो भी चले, वह पंडित, वह पीर।।

(30)
समता औ संतोष से, लालच को जो धोय।
वही हृदय निर्मल बने, प्रतिदिन उज्ज्वल होय।।

(31)
पंच इंद्रियों को करे, जो बस में दिन-रात।
वह जिनेंद्र हो कर बने, पृथ्वी की सौगात।।

(32)
वध करता जो जीव का, वह हिंसक  इनसान।
लाख इबादत भी करे, जीवन नरक समान।।

(33)
नारी से जो दूर है, जिसमें नेक विचार।
समझो होता है वही, भवसागर के पार।।

(34)
निर्भय औ निर्वैर हो, तब जीवन का सार।
हिंसा से जो दूर है, करे उसे जग प्यार।।

(35)
तन-मन दोनों मैं नहीं, यह तो कोई और।
मूरख इतराए मगर, ज्ञानी करते गौर।

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महावीर वचनामृत-३

>> Wednesday, January 27, 2010


तीसरी कड़ी...
(21)
चोरी, हिंसा, झूठ सब, 
परिग्रहों के पाप।
जो इनमें रमता रहा,

अंत मिले संताप।।

(22)
ज्ञानी हिंसक ना बने,

करे सभी से प्रीत।
धर्मप्राण का पथ यही,

महावीर की रीत।।

(23)
धर्मप्राण जन जागते,

अधम सोय दिन-रात।
जागो, आलस छोड़ दो,

मात करे प्रतिघात।।

(24)
क्रोधी, रोगी, आलसी, 

मूढ़, घमंडी पाँच।
रहें ज्ञान से दूर ये,

नहीं साँच को आँच।।

(25)
गुरू अपना ज्यों दीप है, 

करे तिमिर का नाश।
जीवन भर जलता रहे, 

करता रहे प्रकाश।।
सुधी पाठकों से अनुरोध है, कि वे मेरे नए चिंतन पर (व्यंग्य दर्पण)भी एक नज़र मार लिया करे...

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महावीर वचनामृत-२

>> Saturday, January 23, 2010

गतांक से आगे .......
(11)
परिग्रहों से मुक्त जो, मिला उसे ही ज्ञान।
सुख में डूबी ज़िंदगी, करे लोक कल्यान।।

(12)
कीचड़ में भी कमल-सा, जिसका अंतस होय।
वही एक पंडित सही, और न दूजा कोय।।

(13)
लख नारी के अंग को, जागे नहीं विकार।
ब्रह्मचर्य सच्चा वही, मानव करे विचार।।

(14)
तृष्णा से हर तरुण का, होता है नुकसान।
कामातुर जो भी हुआ, गया काम से जान।।

(15)
दुनिया से तुम मत लड़ो, करो स्वयं से युद्ध।
सुख सच्चा पा कर बनो, महावीर परबुद्ध।।

(15)
बीत गई जो रात थी, सम्मुख दिखे प्रभात।
जागे से बनती रही, हरदम बिगड़ी बात।।

(16)
जैसा खुद से चाहते, हो सबसे व्यवहार।
महावीर कहते यही, सच्चा लोकाचार।।
(17)
राग-द्वेष दो पाप हैं, इनसे रह कर दूर।
बन जाएँ हम जगत के, बस चमकीले नूर।।

(18)

क़र्ज़, घाव अरु आग को, तू मन छोटा जान।
धीरे-धीरे ये बढ़ें, रहते सजग सुजान।।

(19)
क्रोध प्रीत को, विनय को नष्ट करे अभिमान।
लोभ नाश सबका करे, रे मानव पहचान।।

(20)
क्षमा जीतती क्रोध को, लोभन को संतोष।
पाप अगर अगर हो जाय तो, करना तुम अफसोस।।

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महावीर वचनामृत-1

>> Wednesday, January 20, 2010

पिछले दिनों मै विनोबाजी का साहित्य पढ़ रहा था. संत विनोबा  महान क्रांतिकारी थे. सामाजिक जागरण की दिशा में उन्होंने गाँधी जी के काम को आगे बढ़ाने की कोशिश की. भूदान आन्दोलन, दस्यु-समर्पण जैसे अभिनव काम उन्होंने किये. गो हत्या पर रोक लगाने की मांग लेकर वे आमरण अनशन पर बैठ गए थे. (उनका अनशन चालाकी के साथ तुडवा दिया गया, लेकिन कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी.) विनोबा भावे ने सामाजिक काम ही नहीं किये, समाज को नैतिक बनाने वाले महान चिंतन भी दिया. उनका बीस खंडो में प्रकाशित साहित्य पढ़ कर पता चलता है कि विनोबा जी ने बौद्धिक चेतना जगाने के लिए इतना श्रेष्ठ लेखन-चिंतन किया, जो उन्हें एक बड़ा साहित्यकार भी बनाता है. उन्होंने भगवान् महावीर और भगवान् बुद्ध के विचारों का अनुवाद किया. जिसे पढ़ते हुए मुझे लगा कि इनको दोहा-छंद में भी रूपांतरित किया जा सकता है. बस, माँ सरस्वती का नाम लेकर भिड गया. और कुछ ही दिनों में दोहे तैयार हो गए. भगवान महावीर के वचनों के 155 दोहे और भगवान बुद्ध के विचारों पर केन्द्रित 150 दोहे. ये दोहे अब ब्लॉग में देने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. प्रथम कड़ी के रूप में पेश हैं  दस  दोहे-
 महावीर वचनामृत-1

(1)
जग जीते तो वह मनुज, वीर सदा कहलाय।
मगर स्वयं को जीत कर, महावीर बन जाय।।

(2)
भोग रोग है शोक भी, इक दिन सब को होय।
मुक्त हृदय जो भी हुआ, सुख की निंदिया सोय।।

(3)
गाँठ मोह की जो पड़ी, छूट न पाई हाय।
अज्ञानी हर जीव ही, रहे सदा असहाय।।

(4)
कदम-कदम पे दु:ख मगर, ज्ञानी कर ले पार।
मुसकाते रहते सदा, जीत मिले या हार।।

(5)
भला सोचिए तो भला, नहीं बुरे में सार।
राग-द्वेष से मुक्त जो, मानव वही उदार।।

(6)
ऊँच-नीच कोई नहीं, मानव सभी समान।
फेर गोत्र का छोड़ दे, ओ मानुस नादान।।

(7)
बुरा न सोचे न करे, कुछ भी नहीं छिपाय।
कटु वचन जो ना कहे, वही देव बन जाय।।

(8)
लाभ बढ़ाए लोभ को, इसकी गति है तेज।
जो जाने संतोष को, सोए सुख की सेज।।
(9)
जो सच्चा माँ की तरह, उस पर करो यकीन।
गुरू जैसा ही पूज्य वह, रहे कभी न दीन।।

(10)
सोने का पर्वत मिले, तो भी लोभ अनंत।
वीतराग जिस दिन जगा, हुआ मनुज श्रीमंत।।

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सुनिए गिरीश पंकज को

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