''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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नीर भरी रहती थी नदिया.....

>> Saturday, April 30, 2016

भयंकर गर्मी और जल संकट. यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है. आज नहीं चेते तो भविष्य प्यासा मरने के विवश होगा. वर्तमान समय की जल-त्रासदी पर एक गीत।

नीर भरी रहती थी नदिया,
लेकिन अब खुद प्यासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।


हरी-भरी धरती को हमने, लूट लिया बन कर ज्ञानी।
सूरज ने गुस्से में आकर, सोख लिया सारा पानी।
अब तो जल के चलचित्र हैं और दुनिया आभासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है। .


पेड़ बचे, नदियां बच जाएँ, गऊ का चारा-सानी भी।
तब विकास सोहेगा हमको, सुंदर हो जिनगानी भी।
ये धरती वरदान धरा को, मत समझो यह दासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

अभी भी थोड़ा जल बाकी है, इसको अगर बचा लेंगे।
आने वाले कल को हम सब, पानीदार बना लेंगे।
वरना अब तो बंजर धरती, और गले की फाँसी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

अब विकास का अर्थ हो गया, पत्थर, पत्थर औ पत्थर।
ताल-तलैया और बावली, पाट दिए सारे बढ़ कर.
माना तुमने प्रगति बड़ी की, पर ये सत्यानाशी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

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नए साल का गीत/ एक -एक होते हैं ग्यारह....

>> Thursday, December 30, 2010

नया साल बस दो कदम की दूरी पर है. अरे, २०१० कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. यही हमारी नियति है. हम अक्सर जीतने का दंभ पाले रहते हैं, पर समय हर बार पटकनी देते रहता है. हम समय से नहीं जीत सकते. उसे नहीं रोक पाते. जवान चेहरे कब झुर्रियोंकी कथाये रचने लगते है, समझ में ही नहीं आता. अपना ही चेहरा अनजाना-सा लगता है. यह कटुसत्य है. इसीलिए जो बीत गया, उसकी चिंता न करते हुए आने वाले पल का स्वागत किया जाना चाहिये. हमें अपने सद्कर्मों से इतिहास रचना है. समय बीत जाएगा, लेकिन हमारा किया हुआ श्रेष्ठ काम ये जाती हुई तारीखे मिटा नहीं पाएंगी.सर्जक अमर रहता है.  इस बार अद्भुर सन आ रा है. -१-११ २०११. एक-एक दो होते है तो एक-एक ग्यारह भी हो सकते है. हम एक-एक ग्यारह वाले सन्देश को ग्रहण करें यही शुभकामना है. नए साल का अग्रिम स्वागत करते हुए एक गीत आप सब चाहने वालों के लिये .अब मिलूंगा दो जनवरी को..तब तक के लिये हार्दिक शुभकामनाये.हर ब्लॉगर जीवन में सफल हो, सुखी रहे. आगे बढ़े.यही सद्भावना है....

  एक-एक होते हैं ग्यारह

भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा.
नवकिरणों के साथ हमारे जीवन को चमकाएगा.
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हरपल हरदम बढ़ते जाना, ये ही सच्चा जीवन है 
जो दूजे के काम आ गया, वो इंसां तो चंदन है.
सत्कर्मों से भरा रहे तो, वैसा जीवन पायेगा...
 

भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा.
---------------
एक -एक होते हैं ग्यारह, यह जीवन का लक्ष्य रहे,
चाहे जो मजबूरी हो पर, साथ हमारे सत्य रहे.
श्रमवीरों का ही तो ईश्वर, हरदम भाग्य बनाएगा..
 

भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा.
--------------------- 
मान लिया हम तनिक गिरे थे, पर उठने की ठानी थी.
टूट नहीं पाए हम क्योकि हर पीड़ा बेमानी थी.
आँसू को जो पी जाएगा, वह जीवन को गायेगा..
भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा...
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यहाँ-वहाँ हर ओर नयापन, बगरी है अब गंध नई.
एक नए जीवन की खातिर, हम खाएं सौगंध नई.

अपना सच्चा मन अपने, इस जीवन को महकाएगा 
भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा.
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छूट गए जो लोग यहाँ पर, साथ उन्हें भी लेना है
यही तकाजा नए दौर का, प्यार सभी को देना है.
हम गैरों को अपनाएंगे, जग हमको अपनाएगा..
भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा.
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सपने अक्सर टूटा करते, फिर-फिर नूतन गढ़ते हैं,
कितना भी हो पर्वत ऊँचा, हिम्मत से हम चढ़ते हैं.
अगर हौसला छोड़ दिया तो, कौन हमें दुलराएगा.
 

भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा. 
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उठो-उठो अब आगे देखो, पीछे बीता साल रहे,
ऐसे जतन करो कि पूरा जीवन ही खुशहाल रहे.
दुःख आयेगा लेकिन अपने, सम्मुख ठहर ना पायेगा.
भूल जाएँ हम बात पुरानी, नया सवेरा आयेगा.-
-----------------------
भूल गए हम बात पुरानी, नयासवेरा आयेगा.
नवकिरणों के साथ हमारे जीवन को चमकाएगा. .

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गीतालेख : तेरा वैभव अमर रहे माँ...मगर कचरे में ?

>> Wednesday, December 29, 2010

गाय के सवाल पर मैं निरंतर कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ. यह बता दूं कि मैं धार्मिक नहीं हूँ. पूजा-वगैरह में कोई यकीन नहीकरता. मंदिर भी नहीं जाता. भगवान् के सामने हाथ जोड़ने की ज़रुरत ही नहीं पडी, क्योंकि मेरा मानना है, कि ''जिसका मन निर्मल होता है/जीवन गंगाजल होता है'' मैं केवल भले कर्म करने कि विनम्र कोशिशें करता रहता हूँ, लेकिन गाय के मामले में कुछ भावुक हो जाता हूँ. एक हिन्दू होने के नाते नहीं, एक मनुष्य होने के नाते. गाय को वेद-पुरानों में माँ कह कर बुलाया जाता है. कहते हैं कि गाय के शरीर में अनेक देवता विराजते है. मगर यह माँ रोज़ कितनी दुर्दशा भोगती है, यह हम सब जानते है. इस आलेख के साथ जो दो चित्र आप देख रहे है, ये चित्र केवल रायपुर के नहीं हैं, देश के किसी भी चहेते बड़े शहर में नज़र आ जायेंगे. इस चित्र की खासियत यह है, कि दो गाय कचरे के ढेर पर खड़ी है, और दीवाल पर के नारा लिखा है- ''गौ माता तेरा वैभव अमर रहे''. क्या यही है गाय का वैभव कि वह कचरे के ढेर में खाना तलाश रही है?रायपुर की एक सरकारी कालोनी से रोज़ गुज़रता हूँ मैं. रोज़ नारे पर नज़र पड़ती और उसी के ठीक सामने गायों को कचरे के भीषण नरक में पालीथिन चबाते या ज़हर पचाते हुए देखा करता था. आज मन नहीं माना. रुक कर एक तस्वीर उतर ली. तभी मैंने देखा कोई आया और उसने कचरे में आग लगा दी. उसने इस बात की परवाह नहीं की कि गाय जल सकती है. जाहिर है, मुझे दौड़ना पडा. वह तो आग लगा कर भाग खडा हुआ. तस्वीर उतार कर मैं फ़ौरन गाय को हटाने आगे बढ़ा. वैसे गाय आग की बढ़ती तपिश के कारण गाय खुद किनारे होने लगी थी.
ये हाल है हमारे इस समय का. दीवार देख कर किसी महानुभाव ने नारा लिख दिया, अपना नाम-पता भी लिख मारा लेकिन उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि गायें कचरे के ढेर में खड़ी न हों. गाय के साथ यही हो रहा है इस देश में. लोग नारे लगाते हैं, गाय-गाय चिल्लाते हैं, मगर गो सेवा के नाम पर चंदे खाने के सिवा कुछ भी नहीं करते. सबकी नज़र गो सेवा आयोग के फंड पर रहती है. सब यही चाहते है, कि उनकी गौशाला को चंदा मिले, अनाज मिले. और वे गौशाला के पैसे से मालामाल होते रहे. इस समाज में ऐसे लोग भी हैं,जो गाय को प्रणाम करेंगे और वक़्त आने पर लात भी मरेंगे. अजीब है लोग, गाय बीमार पड़ जाये, या बाँझ हो जाये तो उसे बेच कर नोट कमाने में पीछे नहीं रहेंगे. ऐसे भयंकर निर्मम समय में गाय होना खतरनाक है. गाय जब दीवारों पर लिखे नारे देखती है, कि ''तेरा वैभव अमर रहे माँ'', तो खूब हंसती है और कहती है-''अरे मनुष्य, तू बड़ा पाखंडी हो गया है रे. मैं तेरे छल-छंदर को प्रणाम करती हूँ. मनुष्य तू बड़ा महान है. तेरे चरण कहाँ है, मै तुझे नमन करती हूँ. ले..तू मेरा ये गीत सुन ले...-

गाय हूँ, मैं गाय हूँ, इक लुप्त-सा अध्याय हूँ।
लोग कहते माँ मुझे पर मैं बड़ी असहाय हूँ।। 

दूध मेरा पी रहे सब, और ताकत पा रहे।
पर हैं कुछ पापी यहाँ जो, माँस मेरा खा रहे।
देश कैसा है जहाँ, हर पल ही गैया कट रही।
रो रही धरती हमारी, उसकी छाती फट रही।
शर्म हमको अब नहीं है, गाय-वध के जश्न पर,
मुर्दनी छाई हुई है, गाय के इस प्रश्न पर।
मुझको बस जूठन खिला कर, पुन्य जोड़ा जा रहा,
जिं़दगी में झूठ का, परिधान ओढ़ा जा रहा।
कहने को हिंदू हैं लेकिन, गाय को नित मारते।
चंद पैसों के लिये, ईमान अपना हारते।
चाहिए सब को कमाई, बन गई दुनिया कसाई।
माँस मेरा बिक रहा मैं, डॉलरों की आय हूँ।। गाय हूँ.... 

मेरे तन में देवताओं का, सुना था वास है।
पर मुझे लगता है अब तो, बात यह बकवास है।
कैसे हैं वे देव जो, कटते यहाँ दिन-रात अब,
झूठ कहना बंद हो, पचती नहीं यह बात अब।
मर गई है चेतना, इस दौर को धिक्कार है।
आदमी को क्या हुआ, फितरत से शाकाहार है।
ओ कन्हैया आ भी जाओ, गाय तेरी रो रही।
कंस के वंशज बढ़े हैं, पाप उनके ढो रही।
जानवर घबरा रहे हैं, हर घड़ी इनसान से।
स्वाद के मारे हुए, पशुतुल्य हर नादान से।
खून मेरा मत बहाओ, दूध मेरा मत लजाओ।
बिन यशोदा माँ के अब तो, भोगती अन्याय हूँ।। गाय हूँ... 

मैं भटकती दर-ब-दर, चारा नहीं, कचरा मिले,
कामधेनु को यहाँ बस, जहर ही पसरा मिले।
जहर खा कर दूध देती, विश्वमाता हूँ तभी,
है यही इच्छा रहे, तंदरुस्त दुनिया में सभी।
पालते हैं लोग कुत्ते और बिल्ली चाव से,
रो रहा है मन मेरा, हर पल इसी अलगाव से।
डॉग से बदतर हुई है, गॉड की सूरत यहाँ,
सोच पश्चिम की बनी है इसलिए आफत यहाँ।
खो गया गोकुल हमारा, अब कहाँ वे ग्वाल हैं,
अब तो बस्ती में लुटेरे, पूतना के लाल हैं।
देश को अपने जगाएँ, गाँव को फौरन बचाएँ।
हो रही है नष्ट दुनिया, मैं धरा की हाय हूँ।। गाय हूँ...
..

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”गीतालेख”./ अबला गैया हाय तुम्हारी है यह दुखद कहानी..

>> Thursday, July 8, 2010


यह गीतालेख प्रवक्ता में भी प्रकाशित है. मुझे लगा, हो सकता है, कुछ पाठक वहां न पहुंचे हों, यही सोच कर अपने ब्लॉग में देने की गुस्ताखी कर रहा हूँ. ”गीतालेख”. यानी एक गीत मगर आलेख के साथ. गाय की व्यथा-कथा लिखना मुझ जैसे कुछ दीवाने किस्मके लेखकों का शगल भी कहा जासकता है, मैं यहाँ साफ़ कर देनाचाहता हूँ कि मैं कट्टर हिन्दू नहीं हूँ. एक नागरिक हूँ बस. संयोगवश हिन्दू हूँ. गाय का सवाल हिन्दुओं का सवाल नहीं है. मुझे लगता है, यह एक ज़रूरी काम है. यह किया जानाचाहिए. लेखक और कुछ करे, न करे, वातावरण बनाने का काम तो करता ही है. आज इस महादेश में रोज हजारों गायें कट रही है. उस देश में जहाँ गाय को माता कह कर पूजा जाता है..आज भी. कृष्ण-कन्हैया उर्फ़ गोपाल के नाम से पुकारे जाने वाले भगवान् गायों की सेवा करते हुए बड़े हुए थे. अनेक देवताओं से जुडी गो-कथाएं भी प्रचलित है. गाय को ले कर अनेक लोमहर्षक मिथक भी सुने जाते है. आश्चर्य की बात है,कि फिर भी हमारे देश का एक वर्ग गाय को लेकर निर्मम आचरण करता है. जो हिन्दू नहीं है, उनमे अब विवेक जाग रहा है. वे गो ह्त्या, या गो माँस से परहेज़ कर रहे हैं, वही बहुतेरे हिन्दू अपने आप को कुछ ज्यादा ही ”आधुनिक” समझ कर गाय की ह्त्या पर अपनी सहमति दर्शा देते है. जबकि मेरी नज़र में सही आधुनिक वह है, जो पूर्णतः अहिंसक है. मै तो किसी भी जीव की ह्त्या के विरुद्ध हूँ. गो वंश हो, चाहे अन्य कोई जानवर, या पक्षी,आदमी इतना भयंकर-माँस-चटोरा हो गया है, कि हिंसा इसके जीवन का सहज-हिस्सा बन गयी है. इसलिए उसको मुक्तकरना कठिन लगता है. फिर भी बात होनी चाहिए. हम तो आबाज़ लगायें. कभी तो कोई सुनेगा, राह पर आयेगा. दुःख तब होता है, जब कुछ हिन्दुओ का पाखण्ड देखता हूँ. ये नकली लोग गाय का दूध पीयेंगे. उसके गोबर और मूत्र से लाभ भी कमाएंगे, और एक दिन जब बेचारी गाय बाँझ हो जायेगी, बैल किसी काम के नहीं रहेंगे तो किसी कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करेंगे. पिछले दिनों पंढरपुर (महाराष्ट्र) के कुछ पुजारियों ने शर्मनाक हरकत की. जो गाय उन्हें दान में दी गयी थी, उन्हें कसाइयों को बेच दी. तो ये हाल है हमलोगों का.इस दोगले चरित्र पर कभी सुदीर्घ लेख भी लिखूंगा, बहरहाल, सुधी पाठक इस ”गीतालेख” को पढ़ें और प्रतिक्रया दें-

अबला गैया हाय तुम्हारी है यह दुखद कहानी,
माँ कह कर भी कुछ लोगों, ने कदर न तेरी जानी..

कोई तुझको डंडा मारे, कोई बस दुत्कारे,
भूखी-प्यासी भटक रही है, तू तो द्वारे-द्वारे.
देख दुर्दशा तेरी मैया, बहे नैन से पानी.
अबला गैया हाय तुम्हारी है यह दुखद कहानी.

पीकर तेरा दूध यहाँ पर, जिसने ताकत पाई,
वही एक दिन पैसे खातिर, निकला निपट कसाई.
स्वारथ में अंधी दुनिया ने, बात कहाँ-कब मानी.
अबला गैया हाय तुम्हारी, है यह दुखद कहानी.

गो-सेवा का अर्थ यहाँ अब, केवल रूपया-पैसा,
इसीलिए कटवा देते सब, क्या गैया, क्या भैसा.
हिंसा से है लालधरा उफ़… धर्मग्रन्थ बेमानी.
अबला गैया हाय तुम्हारी है यह दुखद कहानी.

ऋषि-मुनियों ने कही कथाएं, गौ में देव समाए,
मगर ये अनपढ़ दुनिया इसका, मर्म समझ ना पाए.
कदम-कदम पर हैवानों की, शर्मनाक मनमानी..
अबला गैया हाय तुम्हारी है यह दुखद कहानी.

किसी जीव की हो ना हत्या, कैसी जीभ चटोरी,
खून बहा कर पूजा करते, उस पर है मुंहजोरी.
वाह रे हिन्दू पाखंडी तू, मूरख औ अभिमानी..
अबला गैया हाय तुम्हारी, है यह दुखद कहानी.

बहुत हो गया दिल्ली जागे, यह कानून बनाए,
धर्म-जात की आड़ में अब, गोवंश न काटने पाए.
करें न गौ से दूध-हरामी, काम करें कल्यानी..
अबला गैया हाय तुम्हारी है यह दुखद कहानी..

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गीत./नून, तेल, लकड़ी के पीछे....

>> Monday, May 24, 2010

अपनी सबसे लम्बी ग़ज़ल के बाद अब मै गीत विधा की ओर लौट रहा हूँ. गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहे, नई कविता, बाल कविता, व्यंग्य, कहानी, लघुकथा, लेख ....जब जैसा मन हो जाये लिखना चाहिए.सृजन अपना आकार खुद-ब-खुद ले लेता है. मन अपनी विधा खुद चुन लेता है. अब एक गीत...सुधी पाठको के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. 

गीत

नून, तेल, लकड़ी के पीछे
एक उम्र बेकार हो गयी.
कैसे करता पार इसे मैं,
स्वारथ की दीवार हो गयी.

मैं, मेरा औ मेरे अपने,
इनके बाहर निकल न पाया.
दूजे के पतझर पर ही क्यों,
अपने उपवन को हरियाया.
ये दिमाग तो जीत गया पर,
मेरे मन की हार हो गयी....नून-तेल, लकड़ी.....

सोने का इक हिरन मिला तो,
उसके पीछे दौड़ लगाई.
थककर चूर हुआ तो देखा,
वह थी केवल इक परछाई.
नैतिकता की श्वेत चुनरिया,
तार-तार, बस तार हो गयी....नून-तेल, लकड़ी.....

रामायण थी पूजा घर में,
राम कभी न काम आ सके.
कंठ मिला था कोयल जैसा,
गीत मधुर पर नहीं गा सके.
बन जाती वरदान ज़िन्दगी,
लेकिन यह तो भार हो गयी.

कब तक सपनों की गठरी संग,
बंजारे को चलना होगा.
इस तपती राहों में आखिर,
पैरों को यूं जलना होगा.
टूट गए या हार गए तो,
जिनगी यह निस्सार हो गयी. 

नून, तेल, लकड़ी के पीछे 
एक उम्र बेकार हो गयी.
(लकड़ी की जगह आजकल गैस का चलन है इसलिए गैस भी पढ़ा जा सकता है)

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अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,

>> Wednesday, May 5, 2010

बस्तर अशांत है, हिंसा का खेल खेलने वाले नक्सलियों के कारण. नक्सली विकास की बात करते है और हमेशा विनाश के दृश्य उपस्थित करते है. अरुंधती राय जैसी लेखिकाएं और कुछ छद्म बुद्धिजीवी नक्सलियों को महिमामंडित करते रहते है, जबकि नक्सलियों की हरकतें केवल निंदनीय है. आज देश भर से आये बुद्धिजीवियों ने रायपुर में एक शान्ति सभा ली. जिसमे कुछ समय के लिए शान्ति फ़ैल गयी. (देखे सद्भावना दर्पण)कल वे बस्तर जायेंगे. सभा में नक्सली हिंसासमर्थक नकली बुद्धिजीवी नहीं थे. सब गांधीवादी सोच से संपृक्त. सभा से लौटा तो लगा मन में कुछ उमड़ रहा है, सो एक गीत बन गया, उसे पेश कर रह हूँ.  
 

गीत...

अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,
तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है..

ये जीवन है बड़ा सुन्दर करें दुखियों की सेवा हम,
न पालें द्वेष आपस में, करें न प्यार अपना कम.
ये साँसें चल रही कब तक अरे इसमे भी छलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है....

ये हिंसा क्यों हमें इतना लुभाने लग गयी भाई
कभी हिंसा से ही बदलाव की आंधी कहाँ आई.
जो खूनी मन है लोगों का उसे पहले बदलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.

चले हम राह ऐसी जिसपे चलते हो सभी साथी.
नहीं ऊंचा कोई नीचा, रहे दीया के संग बाती.
चलेंगे हम गिरेंगे भी मगर हमको संभालना है
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.

तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है.
अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है.....

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जय-जय, जय हे पंथ खालसा....

>> Tuesday, April 13, 2010

तेरह अप्रैल १९१९. हम भारतीय कभी भी भूल नहीं सकते इस मनहूस तारीख को, जब अमृतसर के जलियावालाबाग में क्रूर जनरल डायर ने सैकड़ों भारतीयों को गोलियों से भून दिया था. उस पर लिखना शुरू करूंगा तो लंबा इतिहास हो जायेगा. इस डायर को ब्रिटिश मीडिया ने, वहां के लोगों ने हीरो बना दिया था. आश्चर्य होता है कि कैसे एक समाज दूसरे समाज की ह्त्या का जश्न भी मना लेता है? जलियावाला बाग़ काण्ड के बारे में सरकारी आंकड़ा कहता है की वहां केवल ३७८ लोग मरे और २००१ लोग घायल हुए, जबकि २-३००० शहीद हुए होंगे. १३ अप्रैल को बीस हजार लोग बैसाखी पर्व की खुशी मनाने एकत्र हुए थे. डायर को लगा कि सरकार के खिलाफ कोई साजिश की जा रही है. बस वह पागल हो गया और उसने सामूहिक नरसंहार का काला इतिहास डाला. आज उस घटना को याद करते है तो हम दुखी होते है, हमारा खून भी खौलता है. आज स्थानीय कांग्रेस भवन में मुझे एक वक्ता के रूप में बुलाया गया था. न मै कांग्रेसी हूँ, न भाजपाई या कोई और. मै एक छोटा-सा समाजवादी किस्म का लेखक और मीडियाकर्मी भर हूँ. इसलिए चला गया. बोलते-बोलते अचानक मेरे मन में यह बात आयी कि आखिर ये गोलियां चलती क्यों है? डायर ने चलाई, और उसके बाद भी खूब चलीं. आजादी के बाद से तो अब तक लाठी-गोलियां ही चल रही है. गोली चाहे आतंकवादी चलाये, नक्सली चलाये, या फिर अपनी मांगों को लेकर सडकों पर प्रदर्शन करने वाले अपने ही लोगों पर अपनी सरकारें चलाये. यह शर्मनाक सिलसिला बंद होना चाहिए. जब-जब गोलियां चलाती है, तो मुझे लगता है कि डायर फिर पैदा हो गया है. हर बार वह भेष बदल-बदल कर आता है. जैसे अभी कुछ दिन पहले वह बस्तर आया और अपने ही लोगो सामूहिक संहार करके जंगल में कहीं गायब हो गया. यह डायरपन बड़ी खतरनाक चीज़ है. विचारधारा के नशे में, सत्ता के नशें में लोग खूनी क्यों हो जाते हैं..? खून बहाए बगैर भी तो बात बन सकती है. लेकिन व्यवस्था को लगता है कि निहत्थी जनता को तितर-बितर करने के लिए लाठी-गोली ही ही एकमात्र रास्ता है. इसलिए आज जलियावाला बाग़-काण्ड को याद करते हुए मुझे बस्तर के नक्सली भी याद आ रहे है तो हर वे तमाम सरकारें भी याद आ रही है जो अपने ही लोगों पर लाठियां अथवा गोलियां बरसाती है. बंद हो गोलियां. और चलें प्यार की बोलिया, संवाद से रास्ता निकले. डायर को कोसने से कुछ नहीं होगा. हम सबको अपने-अपने भीतर बैठे डायर को भी मारना होगा.
....और अब बैसाखी की बात. जलियाँवाला बाग़ में सिख बन्धु बैसाखी की खुशियाँ मनाने एकत्र हुए थे, क्योंकि १४ अप्रैल १६९९ को ही सिखों के दसवें गुरू गोबिंदसिंघ जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. गुरू गोबिंदसिंघ जी सामाजिक समरसता के महान नायक थे. उन्होंने अपने पंथ में वंचितों को भी ससम्मान जोड़ा. ब्राह्मण, शूद्र, वैश्य एवं छत्रिय सभी को जोड़ा. मै उन्हें शूद्रों के पहले उद्धारक के रूप में देखता हूँ, वे कहते थे- ''मानुस की जात सबै एकै पहचानबो'' खैर, गुरू गोबिंदसिंघ जी ऐसी विभूति है, जिन पर मैंने '' चालीसा '' भी लिखी है. उसे फिर कभी दूंगा. फिलहाल एक गीत दे रहा हूँ, खालसा पंथ को समर्पित. देखे-
गीत..
जय-जय, जय हे पंथ खालसा इसकी अनुपम शान,
इसके कारण ही बच पाया भारत का सम्मान 
पंथ वही जो हमें पढ़ाए, मानवता का पाठ, 
क्या नीचा, क्या ऊंचा सबकी, हो इक जैसी ठाठ.
सब हैं आनंदपुर के वासी, एक वर्ण इंसान.
शुभ कर्मों से नहीं टरै जो, वह सच्चा बलवान.
जिसने दूर किया मानव के सदियों का अज्ञान.
जय-जय, जय हे पंथ खालसा इसकी अनुपम शान...

पंथ अनोखा लेकर आये थे गोविन्द विशाल,
बोले, शुद्ध ह्रदय वाले ही, गुरु के सच्चे लाल.
निर्भय औ निर्वैर बनें सब, दिया हमें यह मन्त्र,
रहें प्रेम से मिल कर सारे, करें नहीं षड़यंत्र.
निर्मल मन रखने वाले ही जीयें सीना तान.
जय-जय, जय हे पंथ खालसा इसकी अनुपम शान.

मानव की बस एक जात है, था पावन सन्देश,
निर्धन और गुलाम रहे क्यों, व्यक्ति हो या देश.
लड़े दीन के हेत वही है, समझो सच्चा वीर.
पुरजा-पुरजा कट जाए पर हरे सभी की पीर.
स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते, गुरु गोविन्द महान.
जय-जय, जय हे पंथ खालसा इसकी अनुपम शान...

मानवता पर बढ़ा अचानक, जिस दम अत्याचार,
गुरू अर्जन हैं धन्य जिन्होंने किया तुरत प्रतिकार.
हरगोबिन्द अरु तेगबहादुर ने भी किया बलिदान,
धन्य-धन्य गुरु गोबिंद जिनकी थी शहीद संतान.
इसके कारण ही बच पाया भारत का सम्मान.
जय-जय, जय हे पंथ खालसा इसकी अनुपम शान...

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सुनिए गिरीश पंकज को

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