''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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मै जन्म नहीं ले पाई लेकिन, कल दोबारा आऊँगी......

>> Tuesday, January 24, 2012

 'विश्व कन्या दिवस' पर एक गीत पेश है. कन्या भ्रूण हत्या पर लिखा है. देखें शायद आपको पसंद आ जाये. 

मै जन्म नहीं ले पाई लेकिन, कल दोबारा आऊँगी,
कितना कुछ कर सकती थी ये दुनिया को बतलाऊंगी..

मैं दुर्गा, काली, लक्ष्मी हूँ और गंगा जैसी निर्मल हूँ.
ज्ञान की देवी कहलाती मैं नवल-धवल-सी उज्ज्वल हूँ.
मैं वीर-प्रसूता नारी हूँ, प्रतिपल इतिहास बनाऊँगी...

मत समझो मुझको तुम निर्बल, मैं सृष्टि की उन्नायक हूँ.
करना मुझ पर थोड़ा यकीन मैं सचमुच भाग्यविधायक हूँ.
मैं अंतरिक्ष तक जा पहुँची, अब बार-बार ही जाऊँगी...

है मेरा जिक्र पुराणों में, इतिहास के पन्ने पढ़ लेना.
जो मुझको मार रहे पागल, तुम उन लोगों से लड़ लेना.
मैं सर्जक हूँ, धारित्री हूँ, क्या मैं गुमनाम कहाऊँगी...

यूं पेट में मुझको मत मारो, बहार तो आखिर आने दो,
मैं भी 'आशा' और एक 'लता' हूँ, मुझको भी तुम गाने दो.
मैं वक़्त पडा तो 'झाँसी की रानी' बन कर दिखलाऊँगी....

है नवरस मेरे अंतस में, भावों का सर्जन करती हूँ.
बच्चों की खातिर जीती हूँ, मैं घर की खातिर मरती हूँ.
मैं शान बढ़ाती गृहलक्ष्मी, मैं हर पल मान बढ़ाऊंगी...
मै जन्म नहीं ले पाई लेकिन, कल दोबारा आऊँगी,
कितना कुछ कर सकती थी ये दुनिया को बतलाऊंगी..


 
 

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गीत / ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर आदि, हैं सुन्दर उपहार....

>> Friday, October 28, 2011

इंटरनेट के ज़रिये हम सब वैश्विक हो गए हैं. दुनिया के लोगों से हमारा रिश्ता-सा बनता जा रहा है. एक नईदुनिया में हम सांस ले रहे है. नेट के माध्यम से जो हमें अनेक अभिव्यक्ति-मंच मिले हैं, उनका इस्तेमाल कर के लोग अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे है. इन सबको ले कर मन में एक गीत उमड़ा, उसे आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ. इसे मैं 'फेसबुक' की ''वाल' पर भी 'पोस्ट' किया है.
 
बढ़ता जाए प्रतिपल अपना,सकल विश्व-परिवार,

ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर आदि, हैं सुन्दर उपहार....  
जब तक ज़िंदा हैं दुनिया में, बाँटें सबको प्यार.
सबकी 'वाल' सजाएँ हम सब, खींचें ना 'दीवार'.
 
'इंटरनेट' बना है अपनी अभिव्यक्ति का साधन,
मित्रभाव से जुड़ते सारे, काम बड़ा मनभावन.
जाति, धर्म औ पंथ से ऊपर, उठ कर हो व्यवहार...
 
अपने मन की बातें सबसे, बाँट रहे हैं लोग.
बिछुड़े साथी भी मिल जाते, बन जाता संयोग.
घर बैठे हम जीत रहे हैं, यह सुन्दर संसार...
 
सब जन यहाँ बराबर दिखते, प्रेमभाव से रहते.
एक राह के हम सब राही, अपने सुख-दुख कहते.
यही मनुजता है समरसता, दुनिया को उपहार....
 
बात न कोई गलत कहें हम, दिल न कभी दुखाएं.
बात न बिगड़े भूले से भी, बिगड़ी बात बनाएं.
'विश्वग्राम' के हम रहवासी, व्यापक बने विचार....
 
बढ़ता जाए प्रतिपल अपना,सकल विश्व-परिवार,

ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर आदि, हैं सुन्दर उपहार....  

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दुखी मन से दो गीत / अपनी असफलता पर हाय, लोकतंत्र शर्मिन्दा है.....

>> Friday, August 12, 2011

पुणे में हत्यारी पुलिस तीन लोगों की जान ले लेती है. इसी तरह के मंज़र कहीं भी देखे जा सकते हैं. मन विचलित हो जाता है यह सब देख कर. हम १५ अगस्त को अपनी आज़ादी की वर्षगाँठ मनाएंगे, लेकिन क्या सचमुच आज़ाद हो गए है? नंगे घूमने के लिए आजाद हैं, घोटाले लिए करने के आज़ाद हैं,  लेकिन सत्ता अगर गलत कर रही है, तो उसका विरोध नहीं कर सकते. और कहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा हैं. अन्ना हजारे धरना देना चाहते हैं तो पूरी दिल्ली में धरा १४४ लगा दी जाती है. क्या यह है लोकतंत्र? यह शोक्तंत्र है. बहरहाल,दो गीत
 (१)

बंद करो यह गोलीबारी 
कुरसी क्यों हो गई हत्यारी.

जनता का दुःख-दर्द न समझे, बस गोली से बात करे.
लोकतंत्र का जो है चाकर, वही लोक पर घात करे? 
कहने को गाँधी के चेले,हत्यारे हैं खद्दरधारी...

क्या सोचा था कैसा है ये देश, हमें दुःख होता है
राजघाट पे बैठा गाँधी, रोजाना ही रोता है.
भारत माता भी रो-रो कर,
नेताओं से अब तो हारी...
बंद करो यह गोलीबारी..
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हक़ जो मांगे उनको डंडे या फिर जेल दिखाते है.
क्यों जनता के लोग यहाँ, इतने निर्मम हो जाते है.
जनता राजा थी लेकिन अब, हो गई है बिलकुल बेचारी.
बंद करो यह गोलीबारी ..........
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सच कहना अब पाप हो गया, चुप्पी का अभिनन्दन है,
छद्मश्री  को  पद्मश्री है, सच के हिस्से  क्रंदन है.
किसको दोष यहाँ दे बोलो, अपनी ही गलती है सारी.
बंद करो यह गोलीबारी
कुरसी क्यों हो गई हत्यारी.

(2)

कैसा है ये लोकतंत्र, हम  गोली खा कर मरते हैं .
पहले से बदतर भारत को देख लोग अब डरते है.

वो था जनरल डायर जिसने, नंगा नाच दिखाया था
जलियांवालाबाग़ में जालिम ने तब लहू बहाया था..
लेकिन अब उस डायर के काले वंशज मंडराते है.
लोकतंत्र की छाती को ये उफ़ छलनी कर जाते हैं
भारत माता के वसनो को कदम-कदम ये हरते हैं.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम  गोली खा कर मरते हैं .
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जनहित में हर उठा हाथ अब, यहाँ झुकाया जाता है
हिंसा के बलबूते पर ही  तंत्र चलाया जाता है.
कहने को आज़ाद हो गए, मगर सत्य यह ज़िंदा है
अपनी असफलता पर हाय, लोकतंत्र शर्मिन्दा है.
सुविधाओं के लिये लोग अब, सच कहने से बचते है
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं
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गाँधी, क्या ये देश तुम्हारा, फिर गुलाम हो जाएगा?.
लोकतंत्र का सुंदर चेहरा, दूर कहीं खो जाएगा.
असफल सरकारों के हाथों, देश लुटा अब जाता है.
किसको हम चुन लेते है ये, देख लोक पछताता है.
अपने ही हाथो हारे हम, खुद ही आहें भरते हैं.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं .
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ये विकास का दानव अब तो निगल रहा है गांवों को
शहरों को बर्बाद कर दिया, नष्ट कर रहे छांवों को
वो धरती अब छिनती जाती, जिसमे अन्न उगाते हैं
गोली से मरते किसान अब, हाय-हाय चिल्लाते है,
सीधे-सादे लोग मरे नित, कैसा भारत गढ़ते है.

कैसा है ये लोकतंत्र, हम  गोली खा कर मरते हैं
पहले से बदतर भारत को देख लोग अब डरते है.
....

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'वेलेंटाइन डे' की पूर्व-संध्या पर गीत / मिलन का पल आया है...

>> Sunday, February 13, 2011

वसंतोत्सव जारी है. न चाहते हुए भी मेरा मन बैरागी भी प्रेम-राग गाने पर विवश हो रहा है. उस पर ये मुआँ ''वेलेंटाइन डे'' ....? ये भी आ टपका. मन कैसे प्रियजन को याद न करे. (अब कोई प्रिय हो न हो, कल्पना करने में क्या बुराई है) मन में कुछ-कुछ ..... उमड़ रहा है.  यह बहुतों के दिल की बात भी हो सकती है. ऐसा कौन अभागा होगा जिसके मन में प्रेम राग न गूंजता हो. ज़रूर गूँजता होगा या कभी गूँजा होगा. ऐसे लोगों के मन को फिर से प्रेमरस में डुबोने की कोशिश अगर मेरा यह गीत कर सके तो ठीक है. वरना कोई बात नहीं. चलिए, प्रेम-दिवस की बधाई तो ले ही लीजिये.....
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आज प्यार की रात चन्द्रमा, 
जल्दी मत जाना.
और सितारों तुम भी देखो,

थोड़ा छिप जाना....
मिलन का पल आया है...
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युग बीते हैं तब जा कर यह, मंगल-पल आया
रोम-रोम पुलकित है प्रिय ने, ऐसा कुछ गाया.
ओ समीर निःशब्द सुनो तुम, प्रियवर का गाना...
 

आज प्यार की रात चन्द्रमा,जल्दी मत जाना...
मिलन का पल आया है...
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कभी-कभी आती है बेला, पंकज-मन खिलता.
वरना इस रफ़्तार-सदी में, समय कहाँ मिलता.
साध हमारी रही अहर्निश, बस उनको पाना..
 

आज प्यार की रात चन्द्रमा,जल्दी मत जाना... 
मिलन का पल आया है...
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वासंती यह निशा सुवासित, सम्मोहित परिवेश.
मौन है वीणा अंतर्मन की,गुंजित राग विशेष.
काल अभी तुम रुक जाओ बस, प्रातकाल आना...
 

आज प्यार की रात चन्द्रमा, जल्दी मत जाना..
मिलन का पल आया है...
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आज प्यार की रात चन्द्रमा,
जल्दी मत जाना.
और सितारों तुम भी देखो, 
थोड़ा छिप जाना....
मिलन का पल आया है...

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गीत/ भगतसिंह बनने की धुन में, इक दिन मारे जाओगे.

>> Saturday, August 14, 2010

आजादी एक महान शब्द है. गुलामी से मुक्ति की चाहत तो मूक पशुओं में भी होती है. फिर हम तो मनुष्य है. बलिदानों के बाद यह देश आज़ाद हुआ.लेकिन आज अपनी हालात क्या है, यह किसी से छिपी नहीं है. आज भी सरकार विरोधी प्रदर्शन करने पर लोग मारे जाते है. निर्मम पिटाई होती हैं लोगों की. अभिव्यक्ति पर अंकुश-सा लगता है. दहेज़ प्रथा पर लिखो चलेगा. 'लिवइन रिलेशनशिप' पर या समलैंगिक संबंधों पर भी लिखो. कंडोम-फंडोम का प्रचार करो, सब चलेगा, मगर सरकार अगर कुछ अन्याय कर रही है तो उसके खिलाफ लिखने पर मुसीबत आ सकती है. सडको पर उतर गए तो डंडे खाओगे. जबरन आगे बढ़े तो गोलियों से भी भूने जा सकते हो. तो ऐसा है अपने देश कलोक्तंत्र. क्या यही है आजादी? नहीं. आजादी है मन की बात कहने की. सरकार अन्याय कर रही है तो उसे आइना दिखाने का नाम है आजादी. लेकिन हमारे देश में इसकी कमी है. इसलिए जब आजादी के जश्न की बात आती है, तो मेरे जैसा आदमी दुखी मन से बधाई स्वीकार करता है. आपको आजादी की बधाई लेकिन हम सोचें कि जो बातें मैंने कहीं है, क्या वे काल्पनिक हैं? एक महान लोकतांत्रिक देश हमें अभी बनाना है. यह काम बाकी है. गांधी-विनोबा जैसे महान लोग नहीं रहे. उनका नाम ले कर रोटियाँ सेंक रहे लोगो पाखंडी है. भविष्य में जब गाँधी-लोहिया और विनोबा को अपने जीवन में उतारने वाले लोग आयेंगे, तभी सच्ची आज़ादी आयेगी. हम इन्तिज़ार करेंगे. तब तक जैसी भी है, इस आजादी का हम स्वागत ही करेंगे और इसका जश्न भी मनाएंगे. क्योंकि अपनाही देश है. अपने ही लोग है.. भले ही शातिर है. बहरहाल, एक गीत देखें... 

यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है,
सच कहने पर मिली सजाएँ, दिल्ली तो बदनाम है. 

गोरे हट गए काले आ गए, यह कैसा परिवर्तन है?
कदम-कदम पर देख रहे है, सत्ता का ही नर्तन है.
सत्ता का प्रतिरोध करो तो, लाठी-गोली खाओगे.
भगतसिंह बनने की धुन में, इक दिन मारे जाओगे.
अजब मुल्क की गज़ब कथा यह, अकसर कत्लेआम है...
यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है....

भाषा भी है अंगरेज़ों की, संविधान भी उतरन है.
कैसा है यह देश कि जिसका आयातित-सा चिंतन है. 
लोकतंत्र में राजतंत्र के कीटाणु-से दिखते है,
नेता-अफसर मिलकर दोनों मूँग यहाँ पर दलते है.
आम आदमी दर्द बताने में अब तक नाकाम है.
यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है...

आजादी का जश्न मनाने नेता-अफसर आगे है,
हम केवल दर्शक है टुच्चे, कितने बड़े अभागे हैं.
भ्रष्ट यहाँ पर भाषण देते, शोषित पीट रहे ताली,
अगर कभी कुछ बात रखी तो तन जाती है 'दोनाली'.
लगता है इस देश का रक्षक केवल अल्ला-राम है..
यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है...

आजादी को है सलाम पर अब तक लगे अधूरी है.
अभी यहाँ कुर्सी-जनता में, दिखती लम्बी दूरी है.
लोगों का दुःख-दर्द यहाँ पर, सत्ता समझ न पाती है,
मंहगाई, अन्याय देखकर, जनता बस चिल्लाती है.
लोकतंत्र को लूट रहे कुछ, दृश्य बड़ा यह आम है.
यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है... 

पता नहीं कब देश में फिर से, गांधी बाबा आएंगे.
देश चलाया कैसे जाता, गुंडों को समझायेंगे.
गायें कटती रोजाना और लोग भी मारे जाते हैं,
बेशर्मी से लोग यहाँ बस, हम पर हुकुम चलाते हैं.
नेताओं की खातिर अपने देश का ट्रेफिक जाम है. 
यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है...

सच कहने पर मिली सजाएँ, दिल्ली तो बदनाम है. 
यह आजादी कुछ लोगों की, बाकी मुल्क गुलाम है.... 

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गीत/ पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

>> Thursday, June 3, 2010

कल रात नाली में गिरकर एक गर्भवती गाय की जान चली गयी. मै अपने आँसूं नहीं दिखा सकता लेकिन इस घटना ने मुझे कितना दुःख दिया, वह मेरी आहत-भावना को देख कर समझ सकते है. अब तक उबर नहीं पाया हूँ इससे. कल बेटे साहित्य ने आकर बताया कि घुप्प अँधेरे के कारण एक गाय नाली में गिर गयी.बेटे और कुछ लोगों ने मिलकर गाय को किसी तरह बाहर निकाला.गाय की टांग टूट गयी थी.वह वही बैठ गयी. आगे बढ़ ही नहीं सकती थी. नाली में गिरने के कारण पेट में पलने वाला उसका बछडा भी शायद मर गया हो. बाद में बेचारी गाय भी चल बसी. पता नहीं किस कसाई गो-पालक की गाय थी. क्या रायपुर, क्या कोई दूसरा शहर, हर जगह गाय को लोग लावारिस-सा छोड़ देते है. दुःख होता है यह सोच कर कि, गाय का दूध तो लोग शान से पीते है, दूध बेचकर कमाई भी करते है मगर गैया को पर्याप्त चारा-पानी नहीं देते. अजीब लोग है. गाय से अमृत प्राप्त करते है, और उसे जहर खाने के लिए इधर-उधर भेज देते है. गाय की दुर्दशा पर एक उपन्यास लिख रहा हूँ, अब इसमे गर्भवती गाय की मृत्यु का दुःख अध्याय भी जुड़ जाएगा. कई बार सोचता हूँ, कि अगर मेरे पास कुछ न्यायिक अधिकार होता तो गाय की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सजा देता. और सज़ा मिलनी ही चाहिए. बहुत-से गो-सेवक हिन्दू है, ये नकली लोग है, पाखंडी नंबर वन. वक्त आने पर अपनी बीमार गाय कसाई को बेच देते है. कितना कुछ लिखू, दुर्दशा पर 220 पृष्ठों का उपन्यास लिख लिया है. इसमे मैनें गाय की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार खलनायको की खबर ली है, लेकिन इससे होगा क्या. गायें तो कटती रहेंगी. सडकों पर घूम-घूम कर दुर्घटनाओं का शिकार भी होती रहेंगे. कल अकाल मौत मरने वाली गाय को याद करते हुए एक गीत लिखा जो आपके सामने प्रस्तुत है. 

पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.
चाहे लाख करे वो पूजा, नरक मिले उसको हर हाल..

नीच कहेंगे उसको जिसने, गौ को लावारिस कर डाला,
दूध निकाला माँ का अपनी, मगर नहीं दे सका निवाला.
गौ सेवक पाखंडी जितने, मरेंगे इक दिन वो बदहाल.
पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

काहे की गौ माता वह तो, नोट कमाने का सामान,
दोहन कर लो चाहे जितना, मूक बेचारी है अनजान.
जीते-जी वह सुख देती है, मर कर भी दे जाती खाल..
पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

तुम हो घटिया-से पशुपालक, गाय नहीं माता-वाता,
बहुत हो गया पाप बंद हो, तेरा क्या गऊ से नाता?
गाय रखी है घर में तुझको, होना है बस मालामाल.
वह गौपालक तो है पापी, जिसकी गैया हुई हलाल.

सडकों पर मरती-कटती है, खून के आँसू पीती है,
कैसा है यह देश हमारा, गैया मर-मर जीती है.
मरता हुआ समाज हमारा, निर्मम कितना है कंगाल. 
पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

उठो-उठो ओ हिन्दुस्तानी, अपने बल को याद करो,
गाय हमारी असली माता, इसका कुछ तो ध्यान धरो.
पहले लायक तो बन जाना, फिर बेशक गैया तू पाल.
पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

चाहे लाख करे वो पूजा, नरक मिले उसको हर हाल.
पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल..  

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सुनिए गिरीश पंकज को

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