गीत / ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर आदि, हैं सुन्दर उपहार....
>> Friday, October 28, 2011
इंटरनेट के ज़रिये हम सब वैश्विक हो गए हैं. दुनिया के लोगों से हमारा रिश्ता-सा बनता जा रहा है. एक नईदुनिया में हम सांस ले रहे है. नेट के माध्यम से जो हमें अनेक अभिव्यक्ति-मंच मिले हैं, उनका इस्तेमाल कर के लोग अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे है. इन सबको ले कर मन में एक गीत उमड़ा, उसे आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ. इसे मैं 'फेसबुक' की ''वाल' पर भी 'पोस्ट' किया है.
बढ़ता जाए प्रतिपल अपना,सकल विश्व-परिवार,
ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर आदि, हैं सुन्दर उपहार....
जब तक ज़िंदा हैं दुनिया में, बाँटें सबको प्यार.
सबकी 'वाल' सजाएँ हम सब, खींचें ना 'दीवार'.
'इंटरनेट' बना है अपनी अभिव्यक्ति का साधन,
मित्रभाव से जुड़ते सारे, काम बड़ा मनभावन.
जाति, धर्म औ पंथ से ऊपर, उठ कर हो व्यवहार...
अपने मन की बातें सबसे, बाँट रहे हैं लोग.
बिछुड़े साथी भी मिल जाते, बन जाता संयोग.
घर बैठे हम जीत रहे हैं, यह सुन्दर संसार...
सब जन यहाँ बराबर दिखते, प्रेमभाव से रहते.
एक राह के हम सब राही, अपने सुख-दुख कहते.
यही मनुजता है समरसता, दुनिया को उपहार....
बात न कोई गलत कहें हम, दिल न कभी दुखाएं.
बात न बिगड़े भूले से भी, बिगड़ी बात बनाएं.
'विश्वग्राम' के हम रहवासी, व्यापक बने विचार....
बढ़ता जाए प्रतिपल अपना,सकल विश्व-परिवार,
ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर आदि, हैं सुन्दर उपहार....
दुखी मन से दो गीत / अपनी असफलता पर हाय, लोकतंत्र शर्मिन्दा है.....
>> Friday, August 12, 2011
जनता का दुःख-दर्द न समझे, बस गोली से बात करे.
राजघाट पे बैठा गाँधी, रोजाना ही रोता है.
भारत माता भी रो-रो कर,
नेताओं से अब तो हारी...
बंद करो यह गोलीबारी..
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हक़ जो मांगे उनको डंडे या फिर जेल दिखाते है.
क्यों जनता के लोग यहाँ, इतने निर्मम हो जाते है.
जनता राजा थी लेकिन अब, हो गई है बिलकुल बेचारी.
बंद करो यह गोलीबारी ..........
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सच कहना अब पाप हो गया, चुप्पी का अभिनन्दन है,
छद्मश्री को पद्मश्री है, सच के हिस्से क्रंदन है.
कुरसी क्यों हो गई हत्यारी.
(2)
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं .
वो था जनरल डायर जिसने, नंगा नाच दिखाया था
जलियांवालाबाग़ में जालिम ने तब लहू बहाया था..
लेकिन अब उस डायर के काले वंशज मंडराते है.
लोकतंत्र की छाती को ये उफ़ छलनी कर जाते हैं
भारत माता के वसनो को कदम-कदम ये हरते हैं.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं .
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जनहित में हर उठा हाथ अब, यहाँ झुकाया जाता है
हिंसा के बलबूते पर ही तंत्र चलाया जाता है.
कहने को आज़ाद हो गए, मगर सत्य यह ज़िंदा है
अपनी असफलता पर हाय, लोकतंत्र शर्मिन्दा है.
सुविधाओं के लिये लोग अब, सच कहने से बचते है
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं
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गाँधी, क्या ये देश तुम्हारा, फिर गुलाम हो जाएगा?.
लोकतंत्र का सुंदर चेहरा, दूर कहीं खो जाएगा.
असफल सरकारों के हाथों, देश लुटा अब जाता है.
किसको हम चुन लेते है ये, देख लोक पछताता है.
अपने ही हाथो हारे हम, खुद ही आहें भरते हैं.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं .
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शहरों को बर्बाद कर दिया, नष्ट कर रहे छांवों को
वो धरती अब छिनती जाती, जिसमे अन्न उगाते हैं
गोली से मरते किसान अब, हाय-हाय चिल्लाते है,
सीधे-सादे लोग मरे नित, कैसा भारत गढ़ते है.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं
पहले से बदतर भारत को देख लोग अब डरते है.....
'वेलेंटाइन डे' की पूर्व-संध्या पर गीत / मिलन का पल आया है...
>> Sunday, February 13, 2011
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जल्दी मत जाना.
और सितारों तुम भी देखो,
थोड़ा छिप जाना....
मिलन का पल आया है...
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युग बीते हैं तब जा कर यह, मंगल-पल आया
रोम-रोम पुलकित है प्रिय ने, ऐसा कुछ गाया.
ओ समीर निःशब्द सुनो तुम, प्रियवर का गाना...
आज प्यार की रात चन्द्रमा,जल्दी मत जाना...
मिलन का पल आया है...
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कभी-कभी आती है बेला, पंकज-मन खिलता.
वरना इस रफ़्तार-सदी में, समय कहाँ मिलता.
साध हमारी रही अहर्निश, बस उनको पाना..
आज प्यार की रात चन्द्रमा,जल्दी मत जाना...
मिलन का पल आया है...
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वासंती यह निशा सुवासित, सम्मोहित परिवेश.
मौन है वीणा अंतर्मन की,गुंजित राग विशेष.
काल अभी तुम रुक जाओ बस, प्रातकाल आना...
आज प्यार की रात चन्द्रमा, जल्दी मत जाना..
मिलन का पल आया है...
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आज प्यार की रात चन्द्रमा,
जल्दी मत जाना.
और सितारों तुम भी देखो,
थोड़ा छिप जाना....
मिलन का पल आया है...
गीत/ भगतसिंह बनने की धुन में, इक दिन मारे जाओगे.
>> Saturday, August 14, 2010
आजादी एक महान शब्द है. गुलामी से मुक्ति की चाहत तो मूक पशुओं में भी होती है. फिर हम तो मनुष्य है. बलिदानों के बाद यह देश आज़ाद हुआ.लेकिन आज अपनी हालात क्या है, यह किसी से छिपी नहीं है. आज भी सरकार विरोधी प्रदर्शन करने पर लोग मारे जाते है. निर्मम पिटाई होती हैं लोगों की. अभिव्यक्ति पर अंकुश-सा लगता है. दहेज़ प्रथा पर लिखो चलेगा. 'लिवइन रिलेशनशिप' पर या समलैंगिक संबंधों पर भी लिखो. कंडोम-फंडोम का प्रचार करो, सब चलेगा, मगर सरकार अगर कुछ अन्याय कर रही है तो उसके खिलाफ लिखने पर मुसीबत आ सकती है. सडको पर उतर गए तो डंडे खाओगे. जबरन आगे बढ़े तो गोलियों से भी भूने जा सकते हो. तो ऐसा है अपने देश कलोक्तंत्र. क्या यही है आजादी? नहीं. आजादी है मन की बात कहने की. सरकार अन्याय कर रही है तो उसे आइना दिखाने का नाम है आजादी. लेकिन हमारे देश में इसकी कमी है. इसलिए जब आजादी के जश्न की बात आती है, तो मेरे जैसा आदमी दुखी मन से बधाई स्वीकार करता है. आपको आजादी की बधाई लेकिन हम सोचें कि जो बातें मैंने कहीं है, क्या वे काल्पनिक हैं? एक महान लोकतांत्रिक देश हमें अभी बनाना है. यह काम बाकी है. गांधी-विनोबा जैसे महान लोग नहीं रहे. उनका नाम ले कर रोटियाँ सेंक रहे लोगो पाखंडी है. भविष्य में जब गाँधी-लोहिया और विनोबा को अपने जीवन में उतारने वाले लोग आयेंगे, तभी सच्ची आज़ादी आयेगी. हम इन्तिज़ार करेंगे. तब तक जैसी भी है, इस आजादी का हम स्वागत ही करेंगे और इसका जश्न भी मनाएंगे. क्योंकि अपनाही देश है. अपने ही लोग है.. भले ही शातिर है. बहरहाल, एक गीत देखें...