''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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बाहर के दुश्मन से लड़ लें या घर के गद्दारों से

>> Tuesday, February 23, 2016



बाहर के दुश्मन से लड़ लें या घर के गद्दारों से
हम तो घिरे हुए है अब तो कदम-कदम हत्यारों से

देशप्रेम की बाते मत कर लोग यहाँ पर हँसते हैं
रोज सामना होता है अब कुछ सनकी बीमारों से


कौन है असली, कौन है नकली देशभक्त क्या बोलें हम
पता लगाना मुश्किल है अब टीवी या अखबारों से

अगर देश को गाली देने वाले घूम रहे छुट्टे
तो फिर हमको नफरत होगी सत्ता के किरदारों से

सीमा पर दुश्मन से लड़ कर मरते है सैनिक अपने
और देश में घिरे हुए हम कुछ पाखंडी नारों से

जो भी देशविरोधी हैं अब उसको पहचानें थोड़ा
सावधान रहना ही होगा सब नकली फनकारों से

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ईश्वर-अल्ला शर्म से गड गए

>> Wednesday, December 10, 2014

ईश्वर-अल्ला शर्म से गड गए
आग लगाने वाले बढ़ गए

'मेरा धर्म ही सबसे ऊँचा'
बोल के इतना पागल लड़ गए

अंधेभक्तो के झगड़े पर
ख़ुदा -प्रभु हैरत में पड़ गए

मूरख हैं वे क्या सुधरेंगे
बात गलत थी लेकिन अड़ गए

कुछ होते चालाक बड़े ही
अपनी गलती सब पे मढ़ गए

कुर्सी पाकर मत इतराओ
हमें पता है कैसे चढ़ गए

ये बाज़ारू बेशरमी है
'नंबर' 'पाया, पीछे पड़ गए

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अंतहीन आकाश हमारा और पंख ही पास नहीं

>> Monday, November 10, 2014



अंतहीन आकाश हमारा और पंख ही पास नहीं
लक्ष्य काम का अच्छा है पर होगा कुछ भी खास नही

साथ हमारे आएं जिनको पथरीले-पथ प्यारे हैं
जिनको सुविधाये भाती हैं उनकी हमें तलाश नहीं

उसको कब मिल सकी सफलता 'किन्तु-लेकिन' में अटका
उस पर कैसे यकी करें जिसको खुद पे विशवास नहीं

आसमान से तारे ले कर आने वाले देख लिए
उनको अपनी ताकत का ही रत्ती भर अहसास नहीं

बहुत अधिक पाने की खातिर क्यों गिरना ईमान से
सच बोले तो अपने भीतर ऐसी कोई प्यास नहीं

जिसने वक्त गंवाया कोई ठोस काम न कर पाया
जीते हैं वे पशु सरीखे उनका कुछ इतिहास नहीं

वक्त बड़ी तेजी से 'पंकज' भाग रहा है देखो तो
बात करो कुछ ठोस चलेगी अब कोई बकवास नहीं

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ग़ज़ल, / करते अपनी औलादों पर अक्सर ही अफसोस पिता....

>> Sunday, January 15, 2012

पहले बहुत मुखर रहते थे, भर देते थे जोश पिता
अब तो बस खोए-खोए-से,
रहते हैं खामोश पिता

जिनको पाला-पोसा वे सब, निकले नमकहराम बड़े
ऐसी औलादों पे अक्सर, करते हैं अफसोस पिता

काश हमेशा बच्चे रहते, बने यहाँ हम डैडी क्यों
अपने में ही मस्त-मस्त हैं, दूर हुए कई कोस पिता

इनका भी इक दौर था सबसे कितना ये बतियाते थे
अब तो है केवल तन्हाई, किसको दे फिर दोष
पिता

बचपन में जब गिर जाता था, कितना रोया करता था,
चुप होता था उसी घड़ी जब, लेते थे आगोश पिता

दुनिया अपने ढर्रे पर है, कल कितना अच्छा था वो
रिश्तों में बढ़ती खुदगर्जी, रहे बैठ कर कोस पिता

कभी नहीं फरमाइश करते, पढ़ सकते तो पढ़ लो मन
जितना भी मिल जाये उसमें, कर लेते संतोष पिता

अपने सुख को काटा-पीटा, माँ भी रही अभावों में
लेकिन बच्चों की खातिर तो हरदम अक्षय-कोष पिता

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ग़ज़ल / जीवन बेहतर होने का अभ्यास है......

>> Monday, January 9, 2012

आज कुछ हट कर श्रृंगार...मेरा नाम 'गिरीश' है, मगर इसमें 'पंकज' भी है..कोमलता का तत्व...
दूर बहुत है लेकिन यह अहसास है
वो पहले से ज्यादा मेरे पास है

प्यार अगर बिल्कुल रूहानी हो जाए
हर पल, हर क्षण प्रियतम का आभास है

दिल के भीतर बैठा रहता है अक्सर
मुझको लगता वह मेरा मधुमास है

देह से ऊपर उठ कर जब मैंने देखा
मन का निर्मल-सुंदर ये आकाश है

अंतहीन है इसको कौन बुझा पाया
दिल के भीतर बैठी पगली प्यास है

वो छल है सम्बन्ध नहीं कहलायेगा
जिसमे  केवल कुछ पाने की आस है

उसको चैन कभी कैसे मिल पाएगा
जो केवल इच्छाओं का ही दास है

अपना तो है लक्ष्य भला इनसान बनूँ
जीवन बेहतर होने का अभ्यास है


कौन यहाँ रहता है ज़िंदा सदियों तक
मरना ही तो सबका इक इतिहास है

 
ये दुनिया है मीठी चटनी-सी पंकज
खट्टी भी है लेकिन बड़ी मिठास है

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ग़ज़ल / दिल में हो गर प्यार तो कोई क्यों हमको अनजान लगे

>> Monday, May 16, 2011

पहली बार मिले हैं लेकिन बरसों की पहचान लगे
दिल में हो गर प्यार तो कोई क्यों हमको अनजान लगे

तुम आए तो इस जीवन में फिर बहार-सी आई है
उजड़ा-उजड़ा गुलशन मेरा हरा-भरा उदयान लगे

अगर प्यार-करुणा ना होगी केवल हो खुदगर्जी तो
कैसा भी हो ज्ञान मुझे वह ज्ञान नहीं अज्ञान लगे

रोजाना जो दुखीजनों की सेवा करता रहता है
सच बोलूँ तो शख्स मुझे वो धरती का भगवान् लगे

जहां न कोई आए-जाए पाबंदी हो, बंदिश हो
आलीशान भले हो कितना घर वो कब्रिस्तान लगे

जहां कद्र ना हो प्रतिभा की चापलूस दरबारी हों
वहाँ अदब के ''डान'' मिलेंगे और सभा शमशान लगे

अगर हौसला है भीतर तो चिंता काहे की पंकज 
हर मुश्किल हो चाहे जितनी हमको तो आसान लगे

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जब-जब सच कहना चाहा है अपनी जान पे बन आई है

>> Thursday, April 21, 2011

सच के हिस्से तन्हाई है
वक़्त बड़ा ये हरजाई है

मित्र समझ कर बात कही थी
अब दोनों में रुसवाई है

जब-जब सच कहना चाहा है
अपनी जान पे बन आई है

दौलत ने दो फाड़ कर दिया
कौन यहाँ किसका भाई है

किसने सच का साथ दिया है
झूठों की तो बन आई है. 

सुख को पकड़ रहा था मैं भी
पता चला वह परछाई है

हम न झुकेंगे रहेंगे भूखे
मरने की फितरत पाई है

पंकज रहना सुखी अकेले 
बस्ती में हाथापाई है

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नई ग़ज़ल / जो दगा देते हैं उनको प्यार क्यों करना

>> Wednesday, April 13, 2011

दस दिन बेहद परेशान रहा. सड़क खुदाई के कारण केबल कटा और नेट बंद. शिकायत की मगर सरकारी काम तो लखनवी अंदाज़ में ही होता है न. आराम के साथ हुआ. आज वह दिन आया और बेताबी के साथ अपने चाहने वालों के बीच फिर हाज़िर हूँ. मन की अभिव्यक्ति के इस मंच-ब्लॉग- के माध्यम से फिर एक ग़ज़ल पेश है- ('सुने न सुने कोई मेरी पुकार')

आँसुओं को व्यर्थ ही बेकार क्यों करना
जो दगा देते हैं उनको प्यार क्यों करना

दिल मेरा बिकता नहीं, ख्वाहिश नहीं कोई
खामखा इसको यहाँ बाज़ार क्यों करना

ज़िंदगी में जीत की संभावना है जब
हारने की बात को स्वीकार क्यों करना

पत्थरों के इस नगर में कौन सुनता है
दिल के अपने दर्द का इज़हार क्यों करना 

हम बुलाते ही रहे वे ही नहीं आए
इक यही है काम क्या हर बार क्यों करना 

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ग़ज़ल / प्यार में इनकार तो पहला कदम-सा है

>> Monday, April 4, 2011

प्यार की भाषा रहे मनुहार की भाषा
सच कहें तो है यही संसार की भाषा

नफरतों के वार से दुनिया नहीं बचनी
चाहिए हमको सदा इक प्यार की भाषा

जीतने का हौसला लेकर चले हैं हम
व्यर्थ क्यों बोलें हमेशा हार की भाषा

प्यार से जिनसे मिलो निकले सयाने वे 
हमसे ही कहने लगे व्यापार की भाषा

प्यार में इनकार तो पहला कदम-सा है
बाद में हो जाए वो इकरार की भाषा

जोड़ दे गर दो दिलों को है सही अलफ़ाज़
तोड़ दे रिश्ते तो है बेकार की भाषा

तोड़ कर के जो सभी सीमाएं बढ़ती हैं
दरअसल है प्यार ही व्यवहार की भाषा

ग्रन्थ कितने ही पढ़े हैं डिगरियां पाईं
ढाई आखर में छिपी थी 'सार' की भाषा

हमको आखिर क्यों मिले सम्मान सरकारी
बोलता पंकज कहाँ सरकार की भाषा

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ग़ज़ल / चेहरे से मुसकान नदारद क्यों उनसे बेकार मिले हैं

>> Thursday, March 31, 2011

हमको ऐसे यार मिले हैं 
जिनसे हरदम वार मिले हैं

दुश्मन भी शरमा जाएगा
कैसे रिश्तेदार मिले हैं

जिन हाथों ने प्यार दिया है
ऐसे भी दो-चार मिले हैं

लगता है पहचान पुरानी
जबकि पहली बार मिले हैं

जिसने संघर्षों को पूजा
उसको स्वागत-द्वार मिले हैं

चेहरे से मुसकान नदारद
क्यों उनसे बेकार मिले हैं

अब तक दिल से मिल न पाए 
मिलने को सौ बार मिले हैं

टुकडे-टुकडे बँटे हुए हैं
खुदगर्ज़ परिवार मिले हैं

लुटा दिया जनहित में सब कुछ
हाँ ऐसे दिलदार मिले हैं

मर गए लेकिन भीख न माँगी
कुछ महान खुद्दार मिले हैं

खाओ-पीयो मुँह मत खोलो
ये कैसे अधिकार मिले हैं

नंगापन ही बड़ी ख़बर है
हमको वे अख़बार मिले हैं

नफ़रत, साजिश और ये आँसू
उफ कितने उपहार मिले हैं

कथनी-करनी में है अंतर
ढोंगी रचनाकार मिले हैं

बिछ गए सत्ता की चौखट पर
नए-नए फनकार मिले हैं

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होली-ग़ज़ल / दिल हो लेकिन 'यंग' तो समझो होली है

>> Thursday, March 17, 2011

२-३ दिन बाद होली है. होली उमंगों का, मस्ती का, प्यार का त्यौहार है. पूरा देश धीरे-धीरे 'मूड' में आ रहा है-उत्सव के. लेकिन लेखक का भी मूड तो बने. लेकिन यह हर बार संभव नहीं होता. इस बार बहुत बेहतर कुछ सूझ नहीं रहा है.फिर भी होली खाली न जाये, इसलिए रचना को प्यारभरा गुलाल समझ कर लगा ले. सबकी होली शुभ हो, मंगलमय हो, इन्ही शुभकामनाओ के साथ.

मन में रहे उमंग तो समझो होली है
जीवन में हो रंग तो समझो होली है

तन्हाई का दर्द बड़ा ही जालिम है
प्रिय मेरा हो संग तो समझो होली है

स्वारथ की हर मैल चलो हम धो डालें
छिड़े अगर यह जंग तो समझो होली है

मीठा हो, ठंडाई भी हो साथ मगर
थोड़ी-सी हो भंग तो समझो होली है

निकले हैं बाहर लेकिन क्यों सूखे हैं
इन्द्रधनुष हो अंग तो समझो होली है

दिल न किसी का कोई यहाँ दुखाए बस
हो सुंदर ये ढंग तो समझो होली है

तन में रंग और भंग हो ज़ेहन में
पूरा घर हो तंग तो समझो होली है

दुश्मन को भी गले लगाना सीख ज़रा
जागे यही उमंग तो समझो होली है

रूखी-सूखी खा कर के भी मस्त रहो 
बाजे मन का चंग तो समझो होली है 

इक दिन सबको बुढऊ होना है पंकज
दिल हो लेकिन 'यंग' तो समझो होली है

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वो अंधियारे में बैठा है जो सचमुच में ज्ञानी है

>> Sunday, March 6, 2011

कभी-कभी लगता है मन में जीने का क्या मानी है
वही सफल दिखता है जिसका जीवन ही बे-पानी है

हम जीवन भर संघर्षों के पथ पर चलते रहते हैं
और वहीं शातिर लोगों का जीवन सफल कहानी है

मूरख के सर ताज दीखते जय-जयकार करें चमचे
वो अंधियारे में बैठा है जो सचमुच में ज्ञानी है

होगी उसके पास में दौलत, ज्ञान और सुविधाएँ भी
लेकिन वह इंसान नहीं है जो निर्मम-अभिमानी है

खतरों की परवाह नहीं है वैसे भी इस जीवन में 
मेरा घर है उस रस्ते पर जो रस्ता तूफानी है

जिनके दिल में दया नहीं है जो पत्थर की संतानें
उनसे करुणा की कुछ आशा करना ही बेमानी है

जाने कब वे मर जाएँगे है इत्ती-सी बात मगर
केवल नादां समझ न पाते बहुत बड़ी हैरानी है

बात अगर झकझोर सके ना लिखना भी क्या लिखना है
कविता तो वह पंकज सच्ची जैसे बहता पानी है

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ग़ज़ल/ बस चलना है...यानी लिखना

>> Sunday, August 29, 2010


ऐसी एक जवानी लिखना 
तुम आँखों में पानी लिखना 

दुहराती हैं जिसको सदियाँ 
ऐसी कोई कहानी लिखना

इंसां बन कर ही रहना है
खुद को तू मत ज्ञानी लिखना

देख ज़ुल्म को चीख जरा तू
या जीवन बेमानी लिखना

दूजे की गलती देखी है 
अपनी भी नादानी लिखना

वो घमंड में क्यों डूबा है 
ये जीवन है फानी लिखना 

राणा का विष अमृत होगा
मीरा इक दीवानी लिखना 

कविता को वो युग लौटेगा
तू कबिरा की बानी लिखना 

कलम हमारी है गर पूजा 
बातें ना बचकानी लिखना

अगर लिख रहा है तू पावस
टूटी छप्पर-छानी लिखना

लोकतंत्र गर ज़िंदा है तो 
न राजा, ना रानी लिखना

जब तक ज़िंदा है तू पंकज 
बस चलना है...यानी लिखना

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नई ग़ज़ल/ इक रोज कोई आपसा मिल जाएगा..

>> Wednesday, August 25, 2010

एक सप्ताह बाद फिर एक नई ग़ज़ल के साथ हाज़िर हूँ. देखें, शायद जमे सुधी पाठकों को.

और क्या मिलना था मुझको और क्या मिल जाएगा
तुम चले आओ तो मुझको हौसला मिल जाएगा

खोजता मैं फिर रहा था एक दिन भगवान् को 
क्या पता था नैन में तेरे पता मिल जाएगा

बिन तुम्हारे ज़िंदगी ये डगमगाती नाव है 
तुम हमारे साथ हो तो नाखुदा मिल जाएगा(नाखुदा: नाविक)

हो गया हूँ गुम मगर मैं जानता हूँ एक दिन
चलते-चलते फिर मेरा वह कारवां मिल जाएगा

ज़िंदगी वैसे तो हर पल है पहाड़ों का सफ़र 
साथ गर तेरा मिले तो बस मज़ा मिल जाएगा

प्यार अपनी है इबादत, प्यार है आराधना 
तयशुदा है एक दिन मुझको खुदा मिल जाएगा

हर घड़ी मुस्कान का दीपक जला कर तुम रखो
क्या पता किस मोड़ अंधा हादिसा मिल जाएगा

टूट कर बिखरा नहीं मैं जानता हूँ सत्य को
मिल गया कोई बुरा तो इक भला मिल जाएगा

मुझको अपनी खुशनसीबी पर भरोसा है बहुत 
फिर मुझे इक रोज कोई आपसा मिल जाएगा

है अनोखा देश इसकी खासियत की क्या कहें 
दूध मुश्किल है यहाँ पर मैक़दा मिल जाएगा

यह शहर है हादसों की बदनसीबी है यहाँ 
हर कोई पंकज यहाँ तो ग़मज़दा मिल जाएगा

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नई ग़ज़ल/ आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है

>> Thursday, May 20, 2010


आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है  
पर हकीकत में बहुत कंगाल लगता है 

अब यहाँ आलोचनाएँ कौन सुनता है
सच तनिक-सा बोलिए मुंह लाल लगता है
 
झूठ की बुनियाद पर हैं कुरसियों के घर 
सत्य बेचारा बड़ा बदहाल लगता है

प्यार से जो बोलता है वह बड़ा मूरख 
बम दिखाए वो ही मालामाल लगता है

कैसे आगे आये कोई रास्ता भी हो
हर तरफ कितना भयानक जाल लगता है 

रौशनी क्यों कर न आई अब तलक सोचो
तंत्र अपने लोक का जंजाल लगता है

देखिये अफसर को ये बर्बादी-ए-दौलत
कौन-सा घर से किसी के माल लगता है.

सब्र करना सीख ले पंकज सुखी होगा 
काम होने में तो सालोंसाल लगता है

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ग़ज़ल / जब भी आए गंदे लोग ....

>> Saturday, April 10, 2010

ग़ज़ल या शेर के पहले उसके बारे में कुछ लिखना औचित्यहीन होता है, क्योंकि ग़ज़ल का हर शेर अपना अर्थ खुद अभिव्यक्त कर देता है. फिर भी यह ब्लाग है, न इसलिए लगता है कि कुछ गुफ्तगू हो जाए. ललित शर्मा के मन को-पता नहीं किस बात से- ठेस लगी और उन्होंने भरी जवानी में संन्यास ले लिया, ब्लाग-लेखन से, तो मुझे लगा कि कुछ लिखनाचाहिये. उनके नाम एक अपील कर दी, कि लौट आओ...लौट आओ. मैंने ही नहीं अनेक ब्लागरों ने मेरा समर्थन किया और सबने यही कहा, कि ललित जल्द ही लौटेंगे. और मै जनता हूँ, कि लौटेंगे ही. बच के कहाँ जाओगे...ब्लाग से...ब्लागरों से...? ठीक है, कभी-कभी आराम कर लेना चाहिए, लेकिन यह लम्बा न रहे. आराम हराम होती है फ़ौजी के लिए. खैर, मै अपनी नयी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ. कहा जा सकता है, कि अधिकाँश शेर ललित-प्रकरण के कारण ही जन्मे है. ये शेर ललित पर नहीं हैं,लेकिन ऐसे हादसे झेलने वाले हर इनसान के लिए हैं. उम्मीद है,कि सुधी ब्लागर भाई इस शेरों को भी प्यार देंगे.

ग़ज़ल
जब-जब आए गंदे लोग
हुए किनारे अच्छे लोग
झूठो की साजिश पे अक्सर
छिपकर रोए सच्चे लोग
जीना भी अब बहुत कठिन है
जी लेते हैं कैसे लोग
दुनिया है इक बाग़ मिलेंगे 
फूल भी हैं तो कांटे लोग
अच्छे लोगो का टोटा है
ज़्यादा ऐसे-वैसे लोग
नहीं दुखाना दिल को यारो
करें पाप यह भद्दे लोग
खुद से डरना खुदा से डरना
मगर कहां अब डरते लोग
स्वार्थ का रथ हांक रहे हैं
कहने को हैं अपने लोग
हिम्मत करके चलते जाओ
बन जाते हैं रस्ते लोग
गलत काम करके भी अकसर
बेशर्मी से
हँसते लोग
वाह-वाह करते हैं खुद की
ऐसे होते टुच्चे लोग
हत्यारे पकडे जायेंगे
कहाँ जायेंगे बचके लोग
जिनका कुछ ईमान नहीं है
सबके दर पर झुकते लोग
भीतर-भीतर रो लेते हैं
बाहर-बाहर
हँसते लोग
छिपकर हमले करते रहते
कायर या फिर हिजड़े लोग 
काँटों को लज्जित कर देते 
फूलों का पथ बनते लोग
अपनी राह बना लेते हैं
इक दिन बढ़ते-बढ़ते लोग
अंतकाल जीते सच्चाई
सदियों से यह कहते लोग
बहकावे में आ गए अकसर 
होते हैं कुछ 'बच्चे' लोग
'मार्केट' से असली बाहर..
नकली हैं कुछ सिक्के लोग 
बेच खाए ईमान समूचा
कहाँ जायेंगे चल के लोग
महफ़िल उखड गयी घुस आये 
पंकज ऐरे-गैरे लोग
 
(छिप कर हमले करते रहते........ब्लाग जगत में कुछ इसी तरह के लोग है जो ''बेनामी'' बने रह कर दूसरों का दिल दुखानेवाली कटु टिप्पणियाँ करते रहते हैं. मेरे ब्लॉग पर भी ऐसे महानुभाव पधारते रहते है. यह शेर उन्हीं आत्माओं को समर्पित है)

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- ग़ज़ल/ यार जब कोई पुराना....

>> Friday, January 15, 2010

जीवन क्या है, हर्ष और विषाद का लेखा-जोखा ही तो है. कभी दुखा आता है दबे पाँव, तो कभी सुख दौड़ा चला आता है बाहें पसारे. दोनों का स्वागत करने वाला ही सच्चा मनुष्य है. जीवन का यही मर्म है, मानव जन्म को समझ सकने वाला ही पूर्ण मनुष्य बनता है. बाकी तो खैर जी ही लेते है. जीवन-दर्शन को समझाने के लिए अनेक महान कवियों ने अनेक रचनाएँ की है, जो हमें आज तक प्रेरणाएं देती रहती हैं. उन्हीं से प्रेरित हो कर नए कवि कुछ और बेहतर कहने की कोशिशे करते रहते है. सफल होते हैं, या नहीं, यह दूसरी बात है, लेकिन कुछ बेहतर सोचना और लिखना ही मनुष्य का धर्म है. मै अब कोई रचना करता हूँ, तो यह नहीं समझता कि कोई बड़ी रचना कर दी है. बस परम्परा का अनुस्मरण कर के सृजन करने की कोशिश ही की है. विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ, कि मेरी हर कृति एक प्रयोग है. सफलता की मोहर तो काल लगाएगा. हमें तो अपना काम करना है, बस... लेखक को इसकी चिंता भी नहीं करनी चाहिए. खैर, इस लघु-से चिंतननुमा वक्तव्य के बाद पेश है एक ग़ज़ल-

ग़ज़ल.....

यार जब कोई पुराना मिल गया

मुसकराने  का बहाना मिल गया

नेक बेटा देख कर बोला पिता
मुझको तो मेरा खज़ाना मिल गया


धूप अब कैसे  जलायेगी मुझे
पेड़ इक मुझको सयाना मिल गया
 

मुस्कराकर तुमने देखा जब मुझे
इस ज़माने को फ़साना मिल गया

देख कर तेरे नयन को लग रहा

एक बेघर को ठिकाना मिल गया

दोस्त सच्चा मिल गया पंकज अगर

मान लो उसको ज़माना मिल गया

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ग़ज़ल/ दर्द के पैबंद हैं...उसके चेहरे पर. दीखे मुस्कान..

>> Tuesday, January 12, 2010

अभी हाल ही में किताबघर , दिल्ली से एक पुस्तक आयी है- ''तीसरा ग़ज़ल शतक'. जाने-माने साहित्यकार डा. शेरजंग गर्ग के संपादन में २५ शायरों की पांच-पांच ग़ज़ले छापी गयी है. गर्ग जी बहुत बड़े शायर है. पुस्तक में अदम गोंडवी जैसे महान  शायर की  ग़ज़लें भी है. इस संग्रह में प्रकाशित  दो ग़ज़ले यहाँ प्रस्तुत करने का मोह संवरण नहीं कर  पा रहा हूँ. बाकी ग़ज़ले फिर कभी.देखें....

(१)


दर्द के पैबंद हैं मुस्कान के पीछे
हैं कई मजबूरियाँ इनसान के पीछे 

यह दिखावे का नगर है क्या पता तुमको 
क़र्ज़ की बुनियाद भी है शान के पीछे 

बात सच मैंने कही इस बात को लेकर
पड़ गए हैं लोग मेरी जान  के पीछे 

 कह दिया उसने भरोसा कर लिया तुमने 
आँख भी खोले रखो तुम कान के पीछे

मुझको उन हाथों से लेने में लगे है डर 
जाने कितनों का लहू है दान के पीछे 

भूल जाओ गर किसी ने कुछ कहा पंकज 
है लगीं नाकामियाँ अपमान के पीछे 

(२)



उसके चेहरे पर दीखे मुस्कान बहुत
दिल है शायद उसका लहूलुहान बहुत 

नफ़रत करने वालों से भी करता हूँ मै प्यार 
कह ले दुनिया कहती है नादान बहुत 

खोटे सिक्के, नकली फूलो के जलवे
असली की अब कहाँ रही पहचान बहुत 

कहते है जो लूटे दुनिया को जितना 
उतना ही करता है अकसर दान बहुत 

दिल में कोई एक उतरता है पंकज
वैसे तो मिलते रहते इनसान बहुत 

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ghazal /chhal ke bal par.....

>> Monday, January 11, 2010

एक ताज़ा ग़ज़ल पेश है. मुंबई में ही बनी. शहर केचरित्र को जैसा समझा, उसे शेरों में ढालने की कोशिश की है. लेकिन विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि यह ग़ज़ल मुम्बई को समर्पित नहीं है. वहां भी अच्छे लोग है. मुझे तो मिले ही. हर शेर उस प्रवृत्ति को समर्पित है, जो लोक व्यापी है. ऐसे लोग कहीं भी मिल जायेंगे. दिल्ली में, रायपुर, झुमरीतलैया में, तिम्बक्तूं में, भाटापारा में या कही भी.बहरहाल एक  कोशिश की है, शेर देखे-
ग़ज़ल...

छल के बल पर टिका रहे यह जीवन कब तक
समझेंगे सूखी लकड़ी को चंदन कब तक 


तेरी इस बस्ती में टोपीबाज़ मिले सब
आखिर हमको यहाँ मिलेंगे सज्जन अब तक


सबके सब तो यहाँ कर रहे धंधा-पानी
हमसे ही फ़ोकट में होगा सर्जन कब तक


बदले में तुम धन्यवाद तक बोल न पाए 
खाली-पीली हमीं करें अभिनन्दन कब तक 


वो तो अधिनायक बन कर के लूट रहे हैं
बेचारी जनता गायेगी जन-गण कब तक 


सुनो मेरी फ़रियाद सुनोगे निष्ठुर कब तक 
सुख से मेरी यहाँ रहेगी अन-बन कब तक 


आ जाओ तुम इतना भी अब मत शरमाओ
शर्मोहया के टूटेंगे ये बंधन कब तक


चालू होने का ठेका वो ले कर बैठे
और रहे 'पंकज' गोपाला ठनठन कब तक

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ग़ज़ल / जब तलक है ज़िंदगी विश्राम मत करना

>> Saturday, January 2, 2010

ब्लॉग की दुनिया से जुड़ने  के  बाद मेरा एक फायदा हुआ है कि निरंतर रचनाये हो रही है. पहले अपनी पुरानी ग़ज़ले  या कविताये, भी पोस्ट कीं, लेकिन अब देख रहा हूँ कि सीधे ब्लॉग पर भी रचनाये. हो रही है. इसका एक कारण यह भी है कि सृजन के लिए अनुकूल वातावरण चाहिए. जब हम ब्लॉग खोलते है तब हमारा दिमाग सृजन-लोक में पहुँच जाता है. कल्पना की उड़ान होने लगाती है. संवेदनाए, शब्दों को खोज कर आकर लेने लगाती है. सृजन का यह एक नया माध्यम हो गया है. संपर्क का तो खैर है ही. न जाने कितने ही नए मित्र मिले, और अच्छे लोग. जो खुद बेहतर सृजन कर रहे है. कुछ  साधना रत भी है. कुछ बेहतर लिखना चाहते है. जैसे मैं. कोशिश कर रहा हूँ. शायद कल और अच्छा लिख पाऊँ.अभी कलम पकड़ना सीख रहा हूँ..मेरा लिखा हुआ कुछ सुधी पाठक-ब्लोगर पसंद कर रहे है. इससे हौसला बढ़ा है. आज फिर एक ग़ज़ल पेश है. -
ग़ज़ल 
 जब तलक है ज़िंदगी विश्राम मत करना 
लोग तुमसे  दूर हों वह काम मत करना  


लाख चौरासी जनम के  बाद आए हो 
इस जनम को तुम कभी बदनाम मत करना 

जीत मिलती है कभी तो हार भी होगी 
मस्त रहना तुम दुखी यूं शाम मत करना 

ज़िंदगी का क्या भरोसा कब रुके धड़कन 
कुछ नया करते रहो आराम मत करना  

तुम दुखी हो जान कर होंगे सुखी कुछ लोग 
अपनी पीड़ा को कभी भी आम मत करना.

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सुनिए गिरीश पंकज को

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