जी हाँ, मेरे द्वारा कही गयी अब तक की सबसे लम्बी ग़ज़ल.. इससे भी लम्बी ग़ज़ल किसी न किसी ने ज़रूर कही होगी. उसकी मुझे जानकारी नहीं है.न में कोई कीर्तमान ही रचने का दावा कर रहा हूँ. मैं तो केवल अपना एक सुख आप तक पहुँचना चाहता हूँ. .कभी-कभी कोई सुखद संयोग बन जाता है.पिछले महीने किसी एक ब्लॉग में मैंने एक ग़ज़ल पढ़ी-''कौन चला वनवास रे जोगी'' अचानक मन में आया कि इस ज़मीन पर शायद कुछ शेर कहे जा सकते है. बस, लिखने बैठ गया. शेर बनते गए...बनते गए. रुका तो देखा कि चमत्कार-सा हो गया. ''छत्तीसगढ़''' में रहने वाले इस कवि के ''छत्तीस'' शेर बन गए. अपने जीवन की सबसे लम्बी ग़ज़ल कह दी मैंने. इस हेतु आभारी हूँ उस ब्लॉग का जिसमे मैंने वो ग़ज़ल पढ़ी थी
.(दुर्भाग्यवश उस ब्लॉग का अभी नाम ही याद नहीं आ रह है. उस ब्लॉग का जिक्र मै ज़रूर करूंगा. उस ब्लोगर बन्धु को मैंने संभवतः ११-१२ अप्रैल को पत्र भी लिखा था) ग़ज़ल लिख लेने के बाद 'ब्लॉग-पत्रिका' ''आज की ग़ज़ल'' देखी तो वहा ''कौन चला...' का तरही मिसरा दिया था. मैंने अपनी ग़ज़ल के कुछ शेर
'आज की ग़ज़ल' को भी भेज दिए.(संयोग है कि इस ब्लॉग में ग़ज़ल आज ही छपी.सुधी पाठक इस ब्लॉग को भी ज़रूर देखें) कुछ शुद्धतावादी ''स'' और ''श'' एक साथ उपस्थिति को ग़लत मानते है, (जैसे ''नाश'' के साथ ''आस'', 'पास'' आदि) लेकिन मेरा अपना अनुभव है कि ऐसा होने पर भी ग़ज़ल के वज्न में कोई अंतर नहीं पड़ता. मेरी ग़ज़ल में ''श'' वाले कुछ शेर भी है, लेकिन इन्हें मै अलग से दे रहा हूँ. उम्मीद करता हूँ,कि ''मेरे'' सुधी पाठक इस तरही ग़ज़ल को भी प्यार देंगे. चूंकि ३६ शेर है, इसलिये एक-एक शेर को एक-एक पंक्ति में ही दे रहा हूँ ताकि ग़ज़ल बहुत लम्बी न लगे और ज्यादा जगह भी न घेरे. तो हाज़िर है....
किनसे रक्खे आस रे जोगी / टूटा हर विश्वास रे जोगी पतझर से डरता है काहे / आयेगा मधुमास रे जोगी
जीत ले सबका दिल बढ़कर के / बन जा खासमख़ास रे जोगी
रोती है ये सारी नगरी / ''कौन चला बनवास रे जोगी''
है कमजोर बड़ा वो इंसां / जो है सुख का दास रे जोगी
कहाँ-कहां भटकेगा पगले / कर ले मन में वास रे जोगी
अच्छे लोग भी हैं बहुतेरे / देख तो अपने पास रे जोगी
यह दुनिया तो मेरी अपनी / है सुन्दर अहसास रे जोगी
सुख-दुःख दोनों एक सरीखे / कर इनका उपहास रे जोगी
तोते को सोने का पिंजरा / आता है क्यों रास रे जोगी
अरे मौत को बांच ले मनवा / करवाती आभास रे जोगी
प्यार से मिट जाती है दूरी /आये बैरी पास रे जोगी
प्यार करो बस प्यार करो तुम / थम जाये कब साँस रे जोगी
ज्ञान रहा है योगोंयुगों तक / दौलत हुई खलास रे जोगी
अच्छे इंसां क्या हैं ये तो / सबके लिए सुवास रे जोगी
स्वाभिमान का सुख है बढ़ कर / धन-दौलत बकवास रे जोगी
मत रोना होता आया है / सच का तो उपहास रे जोगी
सुख पाकर पगला जाता हूँ / दुःख ही आये रास रे जोगी
धीरे-धीरे इसे निकालो / पीड़ा देगी फाँस रे जोगी
अंधियारे को पी जा बढ़कर/ हरदम बाँट उजास रे जोगी
काम भले कुछ ऐसे कर दे / बन स्वर्णिम इतिहास रे जोगी
अब तो छोडो मजनूंगीरी / हो गयी उमर पचास रे जोगी
धरती की ही गोद मिलेगी / किसे मिला आकाश रे जोगी
बाद हमारे तुमको होगा / मेरा कुछ अहसास रे जोगी
मंजिल तो आयेगी इक दिन / करते रहो प्रयास रे जोगी.
गलत ख्वाहिशे मत पालो तुम / मिलता केवल त्रास रे जोगी
कल आने का बोल गए थे / हो गए बारह मास रे जोगी
खुद्दारी ही अपना मकसद / खा लेंगे हम घास रे जोगी
ये तो प्रेम-पियाला पंकज / बची रहे कुछ प्यास रे जोगी
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भले आदमी गूंगे हो गए / चीख रहे बदमाश रे जोगीचिंतन है तो चमकेगा ही / इसको और तराश रे जोगी
घर की रखवारी चोरों को / तब तो सत्यानाश रे जोगी
फेंट रहा है कोई ''जुआरी'' / हम तो हैं बस ताश रे जोगी
अगर आदमी खुद पे मोहित / होगा महाविनाश रे जोगी
खोजा उसको नहीं मिल सका / दिल में तनिक तलाश रे जोगी
जो दूजे के काम न आया / वो तो ज़िंदा लाश रे जोगी
दूर गया वो दिल ले कर के / आ जाता फिर काश रे जोगी
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