''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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ब्राह्मण होने का गुरूर...?

>> Monday, December 27, 2010

कल रात एक धार्मिक चेनल पर नज़र चली गई. पिताजी देख रहे थे.तो मैं भी बैठ गया. कोलकाता में योग गुरू बाबा रामदेव का कोई कार्यक्रम था. उनके बगल में कोई प्रवचनकार बैठे थे. वे अपने उदगार व्यक्त कर रहे थे. उनके विचार मुझे ठीक लग रहे थे. लगा देखो, कितनी अच्छी बातें कर रहे हैं. लेकिन अंत आते-आते-आते प्रवचनकार ने अपना ''असली'' चेहरा दिखा ही दिया. बाबा रामदेव की तारीफ करते हुए अंत में प्रवचनकार ने कहा, ''एक ब्राह्मण होने के नाते मैं बाबा रामदेव को आशीर्वाद देता हूँ'' मुझे बड़ी हँसी आई. जिस प्रवचनकार को मैं ज्ञानी समझ रहा था, वह तो भयंकर अज्ञानी निकला. शायद उसे पता था, कि बाबा रामदेव की जाति क्या है. जबकि कबीर भी कहते है-''जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान/ मोल करो तलवार का/पडी रहन दो म्यान'' अरे भाई, जब आप संत हो गए है,लोगों को सही राह दिखाने का ठेका ले चुके है, तो फिर अपने को ब्राह्मन बताने की मानसिकता से ग्रस्त क्यों है? इस बात के लिये उस प्रवचनकार को खेद व्यक्त करना चाहिए कि उनसे गलती हो गई.साधु-संत को धर्म-जाति के संकुचित दायरे से ऊपर उठना चाहये. सामान्यजन इस टुच्चेपन से ग्रस्त रहे तो कोई बात नहीं.सबका विवेक जाग्रत नहीं हो सकता.लेकिन जो समाज को दिशा देने का काम करते है, उन्हें जाति-धर्म से ऊपर उठा कर आचरण करनाचाहिये. यह एक हल्कापन है, कि आप अपने आपको ब्राह्मन बता कर किसी को शुभकामना दें. इसका मतलब तो यही हुआ,कि आप अपने को कुछ ऊँचा समझने की भूल कर रहे है. अरे भाई, सभी मनुष्य बराबर है. क्या ब्राह्मन,क्या दलित क्या ''अजा'', क्या ''जजा'', क्या मुस्लिम लेकिन हम लोगों के दिमाग में टुच्चापन इतना भरा हुआ है,कि ज्ञान की बाते करते-करते अज्ञान की दलदल में उतर जाते है. नैतिकता कि खुराक देने वाला अचानक बीमार लगने लगता है, जब वह खुद को जैन मुनि-संत, या मुस्लिम संत, या ब्राह्मन संत समझ लेता है. मतलब साफ़ है,कि अभी वह सही मायने में ज्ञानी नहीं हो पाया है.अभी वह ''प्रशिक्षु'' है.अभी उसे कुछ और वक्त लगेगा. खैर, उस प्रवचनकार की ब्राह्मवादी मानसिकता को देख कर दो व्यंग्य-पद लिखने पर मज़बूर होना पडा..महीनों बाद तीन व्यंग्य-पद.... 

(१)
साधो, संत बड़ा अज्ञानी.
खुद को कहता फिरता बम्भन, मतलब है पक्का अभिमानी.
चोला बदललिया तो क्या है, मूरख करता है नादानी.
जातिवाद से चिपका है फिर कैसे कह दूं है वो ज्ञानी.
संत हो गए तो फिर फ़ौरन जाति-वाति हो गई बेमानी..
जात-धर्म से ऊपर उठ जा, तू केवल धरती का प्रानी
ज्ञान अगर है सच्चा तो फिर, ये दुनिया है केवल फानी.
साधो, संत बड़ा अज्ञानी.
(२)
वाह रे बामन तेरा प्रवचन..
जाति-धर्म का अँधा है तू, बाँट रहा है सबको अंजन.
दो कौड़ी का ज्ञान तुम्हारा, बस घमंड है तेरा बंधन 
अच्छा भाषण, सुंदर बातें, लेकिन नकली दिखता जीवन.
धर्म-कर्म भी धंधा है अब, धंधे में आये कुछ 'लुच्चन'
पढ़ी किताबें हो गए ज्ञानी, मगर है घटिया उनके लच्छन.
संत नहीं नक्काल भरे हैं नैतिकता का करते हैं भंजन...
हँसता हूँ मैं ह...ह...ह...ह...अंधे के हाथों में कंगन...
वाह रे बामन तेरा प्रवचन..
(३)
साधु-संत ये कैसे है?
कोई बामन, कोई जैनी, कोई मुस्लिम लगते हैं.
अपने धर्म-जात से चिपके, खुद को ज्ञानी कहते हैं.
दुनिया कहाँ-कहाँ तक पहुँची ये खूंटी पर लटके हैं.
शर्म आ रही देख के इनको, जाति-धर्म के पुतले हैं.
कोई होगा शायद सच्चा, ज्यादा ऐसे-वैसे हैं.
इंसां तो ये बन ना पाए,धार्मिक बन के लटके हैं..
ज्ञान-बीन को सुन न पाते, लगता है कि भैंसे हैं.
साधु-संत ये कैसे है?

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साधो यह हिजड़ों का गाँव-१९

>> Sunday, June 27, 2010


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साधो यह हिजड़ों का गाँव-१९

>> Sunday, December 13, 2009


साधो यह हिजड़ों का गाँव-१९ 
व्यंग्य-पद....
क्या कहूं.... ये पद ही मेरी भावनाओं का प्रकटीकरण है. समकालीन हालत पर और तीन पद देखें..-
(58)
ये पट्ठा सरकारी है।
इसका चम्मच, उसकी करछुल, बड़ी अजब बीमारी है।
बार-बार झुकता रहता है, यह पेटू-लाचारी है।
यहाँ झुका, फिर वहाँ झुकेगा, बड़ा बिज़ी अधिकारी है।
इस पर मत विश्वास करो तुम, ये खबर अखबारी है।
जो झुकता अब वही सफल है, ये फंडा बस जारी है।
कामचोर हो गये अब सारे, क्या नर औ क्या नारी है।
मर जाओ तो शान से जीयो, दुखी यहाँ ख़ुद्दारी है।

सच बोलेगा आखिर क्यों कर, अगला खद्दरधारी है.

क़त्ल हुए सच कहने वाले, अब पंकज की बारी है.
(59)
बस, चमचों का जलवा है।
स्वाभिमान को सूखी रोटी, चमचा खाता हलवा है।
उल्टी रीत चली है अब तो, घिसता जाता तलवा है।
सच कह दो तो इस बस्ती में, अकसर होता बलवा है।
नेता अफसर के है पीछे, क्योंकि नेता ठलवा है।
इक-दूजे की खुजलाओ तो, मिल जाता हर फलवा है।।
जाने का यह नाम न लेता, भ्रष्टाचार बेतलवा है। 

नैतिकता की गिरी इमारत, पड़ा हुआ बस मलवा है.
(60)
मिल जाए कुरसी इक बार।
तर जाएगी भावी पीढ़ी, मस्त चले अपना व्यापार।
बस सफेद कपड़े तुम पहरो, काला होगा कारोबार।
राजनीति अब चोखा धंधा, बैठो कहीं भी टाँग पसार।
जो नेता जितना है मीठा, मारे उतना बड़ा लबार।
कल तक जो पैदल दिखता था,  पास है उसके मोटर कार। 

झूठ, ठगी, व्यभिचार यही है, राजनीति का शिष्टाचार।
सेवा कम, मेवा है ज्यादा, जीतो चाहे, जाओ हार

जिस्म और ईमान बिक रहे, राजनीति अब है बाज़ार

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साधो यह हिजड़ों का गाँव-18

>> Friday, December 4, 2009


व्यंग्य-पद
(55)
साधो सब अपने ही दुश्मन?
बन सकते है महात्मा पर कौन करे त्याग का दर्शन.
मुस्का कर के बड़े बनो तुम, लेकिन कटुतामय है जीवन.
दुखा रहे दिल ये अपनों का, कट जाते है इनसे स्वजन.
धन पा कर ये इतराते है, बेचारे...कितने है निर्धन.
दुआ नहीं दे सकते सबको, लगे नहीं जिसमे कौड़ी-धन?
धोखा देकर ऐश करो बस, बतलाओ लकड़ी को चन्दन.
अपनी-अपनी हाँक रहे बस, बडबोले बन जाते दुर्जन.
प्रेम, दुआ, सद्भाव बाँट कर, बन सकता है सुन्दर ये मन.
दान करो धन नहीं घटेगा,पर न करे कोई ये अर्पन.
सुखी वही जो पक्का झूठा, छल करना है अब तो फैशन.
गुन अपनाओ करो नदी में, हर दुर्गुण का फ़ौरन तरपन.

कितना सरल बड़ा होना पर लोग न चाहे आज बड़प्पन .
 (56)
सबसे ऊँची रिश्वत यारो।
जो कहता मैं कभी न लेता, उसके सच पर जरा विचारो।
बिन रिश्वत के काम न बनता, आती लक्ष्मी कभी न टारो।
नया ज़माना है रिश्वत को, जो ना खाता उसको मारो।
अगर सफलता पानी है तो, रिश्वत खातिर बाँह पसारो।
रिश्वतखोरी पुण्य विधा है, मिल कर महिमा को उच्चारो।
अपने बापू को मत छोडो, यह सिद्धांत बना लो प्यारो।
(57)
साधो, स्वारथ नंबर वन।
जब तक सधा, तभी तक यारी, वरना सगे भये दुश्मन।
कलजुग की है रीत निराली, सब स्वारथ के भये रतन।
त्याग कहाँ अब लूटो सबको, जीवन भर है यही जतन।
पैसा है तो प्यार करेंगे, खाली हो तो फिरे नयन।
वोट दिया जिस जनता ने, उसकी छाती पर ही गन?
अपने चेहरे से घबरा कर, तोड़ दिया खुद का दरपन ।
बड़ी अनोखी दुनिया पंकज, जियो समझ कर इसको फन॥ क्रमशः

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साधो यह हिजड़ों का गाँव-१७


व्यंग्य-पद
दिल्ली और लखनऊ की व्यंग्य-यात्रा करने के बाद लौटा हूँ. सबसे पहले अपने कुछ व्यंग्य-पद पोस्ट कर रहा हूँ. कोशिश है कि सौ पद लिखो. पता नहीं यह काम हो पायेगा या नहीं, फिर भी लेखक को वैज्ञानिक की  तरह कोशिश करनी ही चाहिए. बहरहाल ३ नए पद...
(52)
मिठलबरे हैं नेता सारे।

माल खा गए मधु कौडा जी, जनता के हिस्से में नारे. 
हवा खा रहे आज जेल की, कल आयेंगे बाहर प्यारे.
बैठ गए हैं मंचों पर अब, कैसे कोई इनको टारे।
केवल घर भरने की चिंता, लोग फिर रहे मारे-मारे।
थोड़ा-सा चंदा बस दे दो, लूटो-नोचो कौन विचारे।
लोकतंत्र अब बाँझ सरीखा, यहाँ न होते चाँद-सितारे।
तन पर खादी पहन घूमते, गाँधी जी के ये हत्यारे।
(53)
साधो जोड़-तोड़ है भारी।
सबको सुविधाओं की चाहत, क्या है नर अरु क्या है नारी।
बिक जाए तन-मन भी चाहे, मिल जाए बस दौलत सारी।
प्रतिभा कम है तिकड़म ज्यादा, नए दौर की है बीमारी।
अच्छे तो ता घर पर बैठो, बाहर हैं केवल व्यापारी।
कैसे कोई पकड़ा जाए, चोर-पुलिस में जब हो यारी ।
(54)
आखिर यह कैसा भगवान।
जिसकी नज़रों के सम्मुख ही, पलते रोज बड़े शैतान।
कभी लुटे नारी की अस्मत और कभी मानव की शान।
नगर सेठ या नगर के पापी, करते पूजा-अर्चन-ध्यान।
शरम नहीं आती मिल जाते, जहाँ-तहाँ भूखे इंसान।
क्यों है ऐसा इस पर कहते, विधना का है यही विधान।
ठ्रस्टी सब परसाद खा गये, प्रभु हो गये अंतर्धान।
इनके सम्मुख सकल करम हो, मगर न होवे इनको ज्ञान?
हाय-हाय ये कैसी पूजा, भक्तों में न रहा ईमान।

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साधो यह हिजड़ों का गाँव-16

>> Sunday, November 22, 2009

व्यंग्य-पद/ क्रमश... 

साधो यह हिजड़ों का गाँव-16
(49)
माधव हम परिणाम निराशा.
जिसको हम समझे थे अपना, वही दे गया हमको झांसा.
शातिर लोगों ने ही अकसर, यहाँ सज्जनों को है फांसा.
राजनीति के अंगने में अब, कला नाचती बन रक्काशा.
शील-शर्म वाली नारी थी, अब दिखता सब खुला-खुला-सा.
खुद का खून भी धोखा दे तो, करे आदमी किनसे आशा.

वही पूज्य है जिसके हिस्से, दौलत या धन अच्छा-खासा.
पद  पाया, मुस्कान खो गयी? हिस्से आयी निर्मम भाषा.
ज्ञान और पूंजी है फिर भी, नहीं  बाँटते इन्हें जरा-सा.
माधव हम परिणाम निराशा. 
(50)
साधो अब सज्जन बेचारा.
अपना हक पाने की खातिर, फिरता है वो मारा-मारा.
शैतानी ताकत के आगे, हरदम सीधा-सादा हारा.
गुंडों का अब राज हो गया, उनकी ही दिखती पौ बारा.
सच बोलो तो मारे जाओ, कैसे जीयें जीवन सारा.
उन्हें आईना मत  दिखलाना, दुर्जन का चढ़ जाता  पारा.
नंगापन स्वीकार हो गया, बही आजकल कैसी धारा.

नैतिकता सम्मानित हो अब, गूंजे गली-गली यह नारा.
(51)
साधो अब या कैसी नारी?
जो जितनी बेशर्म आधुनिक, मर्यादावाली बेचारी?
कपड़ों से तन ढंक जाता था, बदन दिखाना अब लाचारी.
चूल्हा-चौका भाड़ में जाये, इस सोच की है बलिहारी.
घर है सच्चा स्वर्ग न समझे, नासमझी से दुनिया हारी.
देह कोई हथियार हो जैसे,  औरत अब तो बनी शिकारी.
ज्ञान बढाओ, आगे आओ, पर मर्यादा रक्खो सारी.
वैश्य बनो, वेश्या मत बनना, वरना मिलती है बस गारी.
माँ हो कर उसकी मुक्ति है, लेकिन बोले रहूँ कुंवारी.
कहाँ खो गयी सीता, दुर्गा, गायत्री जैसी सन्नारी?
साधो अब या कैसी नारी? 

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साधो यह हिजड़ों का गाँव-15

>> Thursday, November 19, 2009


व्यंग्य-पद
(45)
धरम-करम अब तो धंधा है।

इस धंधे के आगे भैया, हर धंधा लगता मंदा है.
मालामाल यहाँ पर दिखता, भगवे में जो भी बंदा है।
सारे पाप यहाँ पर होते, हर दूजा चेहरा गंदा है।
सच कह दो तो चिढ़ जाते हैं, गले में पड़ जाता फंदा है ।
वही सफल है इस दुनिया में, आँख है लेकिन जो अंधा है।
इनका लक्ष्य नहीं है ईश्वर, इनका तो मकसद चंदा है ।

इनकी मंजिल ऐश-वैश है, मूरख भक्तों का कन्धा है.
(46)
मिठलबरे हैं नेता सारे।

(मिठलबरा छत्तीसगढ़ी भाषा का शब्द है. इसका अर्थ है ऐसा आदमी जो मीठा-मीठा बोले लेकिन भीतर से बड़ा शातिर हो)
मिठलबरे हैं नेता सारे।
बैठ गए हैं मंचों पर अब, कैसे कोई इनको टारे।
केवल घर भरने की चिंता, लोग फिर रहे मारे-मारे।
थोड़ा-सा चंदा बस दे दो, लूटो-नोचो कौन विचारे।
लोकतंत्र अब बाँझ सरीखा, यहाँ न होते चाँद-सितारे।

इन्हीं के आँगन मटक रहे है, दिन-रात नैना कजरारे
तन पर खादी पहन घूमते, गाँधी जी के ये हत्यारे।

झांसे में आ जाती जनता, वोटर हो जाते बेचारे.
राजनीति इनकी रोजी है, बाकी काम तो ना रे-ना रे. 
दौलत की गंगा बह जाती, सज्जन नेता इनसे हारे.
(47)
साधो जोड़-तोड़ है भारी।

शातिर तो अब बड़े मज़े में, सज्जन के हिस्से लाचारी 
सबको सुविधाओं की चाहत, क्या है नर अरु क्या है नारी।
बिक जाए तन-मन भी चाहे, मिल जाए बस दौलत सारी।
प्रतिभा कम है तिकड़म ज्यादा, नए दौर की है बीमारी।
अच्छे हो तो घर पर बैठो, बाहर हैं केवल व्यापारी।
कैसे कोई पकड़ा जाए, चोर-पुलिस में जब हो यारी ।

जिसे चाहिए माल मुफ्त में, वो पट्ठा बनता दरबारी
गलत लोग ही आज सही है, नए दौर की है बलिहारी 
देखूं जब कुर्सी की पूजा, सीने पर चलाती है आरी.
झूठ ठहाके लगा रहा है, नैतिकता खामोश बेचारी. 
धक्का दे कर निकलो आगे, मची हुई है मारामारी । 

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साधो यह हिजडों का गाँव-12

>> Tuesday, November 10, 2009

 व्यंग्य-पद
 (३७)
 मत थूको भाई सूरज पर.
खुद का ही मुंह गन्दा होगा, लोग हँसेंगे देखो तुम पर.
कुछ न कर पाए चुप बैठो, सर्जक को पूजो जीवन भर.
आत्मग्लानि से भर जाओगे, रहेगा तुमको दुःख भी अकसर.
बौनों की है बात निराली, कद वालों को कोसें जम कर.
मरे हुए को भी गरियाते, पाप रखेंगे कितना सर पर..?
काम है केवल निंदा करना, कैसे जीते है ये ईश्वर..?
धन्य-धन्य नाकारी पीढी, जीती है जो निंदा कर कर.
निंदक को तुम हाथ जोड़ लो,  ध्यान न देना होगा बेहतर..
(३८)
निंदक-शैली बड़ी निराली.
सुबह -शाम करते है निंदा,  करतूते है जिनकी काली.
खुद तो काम नहीं कुछ करते, कर्मवीर को देते गाली.
गांधी हो या होय विनोबा, सब इनकी नज़रों में जाली.
खुद का जीवन दो कौडी का, गंधाती है जैसे नाली.
शूकर जैसा जीवन देखो, लेकिन समझे खुद को आली.
कुछ तो जीवन उत्तम कर लो, फिर देना दुनिया को गाली.
जीवन कट दिया बस यूं ही, मर गए इक दिन खाली-खाली.
जीवन मतलब कर्म हो ऊंचे, मगर यहाँ तो है बदहाली.
बेचारे हैं दुःख में काले, क्यों सबके होठों पर लाली.
(39)
काम है उनका....कान भरना.
खुद की तरफ तीन उंगली है, लेकिन सब को उंगली करना. 
यही एक धंधा है उनका, यानी बस रोजाना मरना.
बड़े भक्त होते है ऐसे, लेकिन ईश्वर से क्या डरना.
ऐसा है वो, ऐसा है ये,  तरह-तरह की खबरे गढ़ना.
खा-पी कर वो मर जायेंगे, जीवन है पशुओं-सा चरना. (क्रमशः)

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साधो यह हिजडों का गाँव-१०

>> Thursday, November 5, 2009


व्यंग्य-पद
(३१)
कोठे-से लगते अख़बार.
मालिक इनका करे दलाली, बढ़ता जाता कारोबार.
छाप रहे गंदे विज्ञापन, बड़े बेशरम ये किरदार.
इनके घर की बहू-बेटियाँ, लगता नहीं है पानीदार.
कैसे भी आये बस पैसे, इज्ज़त-फिज्ज़त है बेकार.

लिंग्वर्धक विज्ञापन से, कितना कर लेंगे व्यापार?
विज्ञापन अश्लील बहुत हैं,  मगर छप रहे बारम्बार.
बात करेंगे ऊंची-ऊंची, मगर नीच इनका व्यवहार.
पाठक भी सोये रहते है, जारी है नीला व्यापार.
वेश्या भी शरमा जाये पर इनकी महिमा अपरम्पार.

कोठे-से लगते अख़बार...
  (3२)
भ्रष्टाचार पे काहे रोना.
इसे मिल गयी है मंजूरी, अब क्या पाना, अब क्या खोना?
जहां देशद्रोही हो ज्यादा, वहां तो बस ऐसा ही होना.
देशप्रेम को देश निकला,  गद्दारों को अब है ढोना.
नैतिकता रोती बेचारी, उसकी खातिर है इक कोना.
आज करोडो में जीता है,  कल का नेता औना-पौना.
खादी के कपड़ो के भीतर, देखो नकली रोना-धोना.
मरने से अब इसे बचाओ, देश मेरा प्यारा मृग-छौना.
महंगाई आकाश छू रही,  अचरज फिर भी  जिंदा होना.
दिल्ली मस्त रहे अपने में, लोकतंत्र अब लगता बौना.
भ्रष्टाचार पे काहे रोना.
(33)
ऐसा लोकतंत्र बेकार..
जहां लोक पर डंडे बरसे, तंत्र करे बस अत्याचार..
अफसर्र, नेता भाग्यविधाता, इनके आगे सब लाचार ?
रोगी मरता भीड़ में फंस कर, नेता की जाती है कार.
लोग मर गए बिना दवा के, ऐसे नेता को धिक्कार .
लोकतंत्र यह लगता नकली, लगती अंग्रेजी सरकार.
कब नेता इन्सान बनेंगे,  देश कर रहा इन्तेज़ार..
बड़े-बड़े बंगलो में मंत्री, अफसर भी इनका सरदार.
दोनों जीम रहे है भारत, मचा हुआ है हाहाकार.
आ जाओ भगवान बचाओ, जनता की हो गयी है हार..
राजघाट पर गाँधी रोते, आंसू बहते धारोधार...
ऐसा लोकतंत्र बेकार..(क्रमशः)
गिरीश पंकज

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साधो यह हिजडों का गाँव -८

>> Tuesday, November 3, 2009

व्यंग्य-पद  
(क्रमशः )

(23)
बचपन में हो गए सयाने।
बात न सुनते मात-पिता की, काम करें बच्चे मनमाने।
बनना था पर बिगड़ रहे हैं, नेट  पे नंगई, फूहड़ गाने।
ऊटपटांग कपड़ों को पहने, बने हुए पागल-दीवाने।
अपनी बुद्धि से ना चलते, जैसा फैशन, वैसा ठाने।
आदर भूल गए बूढ़ों का, कैसी नस्ल है ईश्वर जाने ।
(24)
वरदी में दिखते अपराधी।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे, वादी ही लगता प्रतिवादी।
ऐसा है गठजोड़ अनोखा, इधर है वरदी, उधर है खादी।
लूटपाट करते खाकी में, क्या इसको कहते आज़ादी।
हद है सब खामोश देखते, हिजड़ों जैसी है आबादी।
न्याय के ठेकेदार बन गए, फरजी मुठभेड़ों के आदी।
(25)
वो है आज बड़ा धनवान।
दिन में लूटे, रात लुटाए, गज़ब का उसका बना विधान।
अभिनंदन का खर्चा उसका, रोज खरीदे वो सम्मान।
भूखे को रोटी ना देता, कुरसी को बस करता दान।
कहे लूट को मेहनत अपनी, भली करेंगे बस भगवान।
पाप करे पूजा से काटे, बड़ा अनोखा उसका ज्ञान।
(26)
अफसर मतलब बड़ा लबारी।
काम-काज ना करता केवल, बस फाइल से झूठी यारी।
मंत्री जी का चम्मच ससुरा, जनता को देता है गारी।
बुद्धू रोज बनाओ सबको, घूमो-फिरो ऐश कर भारी।
ज्यादातर अफसर मिलते हैं, नंगे, लुच्चे औ व्यभिचारी।
बात कहूँ मैं खरी-खरी बस, हमको काहे की लाचारी। 
(क्रमशः )  

गिरीश पंकज 

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साधो यह हिजडों का गाँव-4

>> Thursday, October 29, 2009

व्यंग्य-पद
 (11)
साधो अब मसखरे पलेंगे।
व्यंग्य रखो अंटी में अपनी, मंचों पर चुटकुले चलेंगे।
जो नैतिक हैं उन लोगों से, लंपट-पापी बहुत जलेंगे।
सच्चे सदा रहेंगे वंचित, झूठे सुख में नित्य ढलेंगे।
चमचो के चेहरों पर लाली, अच्छे तिल-तिल रोज गलेंगे ।
तुमको ही अब टलना होगा, शातिर बिल्कुल नहीं टलेंगे।
(12)
मरे हुए को मिलता नाम।
जि़दा लोगों की बस्ती में, आखिर मुर्दों का क्या काम।
टुकड़े चाट रहे दरबारी, ले-ले कर के प्रुभ का नाम।
धन्य बाप तेरी ऊँचाई, बेटे के संग पीता जाम।
देख के दुनिया के छल-छिद्दर, भाग गए हैं अल्ला-राम।
जो शरीफ हैं उन पर कीचड़, फेंक रहे घोषित बदनाम।
(13)
अब तो सब कुछ खुला-खुला है।
क्या लड़का, क्या लड़की देखो, कौन यहाँ पर दूध धुला है।
नई सभ्यता बदन उघारो, यही प्रगित की आज तुला है ।
फटी पैंट में दिखते लड़के, लड़की का तन मिला-जुला है ।
कुरता और सलवार बाप रे, लड़की का मुँह फुला-फुला है।
क्या होगा अपने पूरब का, पश्चिम होने पर जो तुला है।

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साधो यह हिजडों का गाँव-2

>> Wednesday, October 28, 2009


 महान कान्तिकारी कवि कबीर  की युगांतकारी कवितायेँ हमें आज भी दिशा देती है, प्रेरित करती है, कि आज का कवि उनके जैसा लिख सके. अब तो नयी कविताओं का दौर  है. नयी कविता यानि गद्य- कविता. कविता के तत्व उनमे नहीं होते, हाँ, चिंतन ज़रूर होता है. लेकिन ये चिंतन लोगो कि स्मृतियों में नहीं बस पाते, क्यों कि वे गद्य में होते हैं. छंद-बद्ध होते तो याद राह जाते. मध्ययुगीन कवियों की  रचनाएँ आज भी लोगों को याद है. या फिर वे रचनाएँ जो छंद -बद्ध हैं, (और  उनमें दम भी है. छंद तो बहुतों ने लिखे हैं .) कबीर के दोहे औए उनके पदों का कोई मुकाबला नहीं. उनके जैसा लिखने की कोशिश बहुतों ने की, लेकिन कबीर के पास भी कोई नहीं फटक सका. लेकिन मेरी अपनी सोच है, कि उस परमपरा  को आगे बढ़ने की  कोशिश  होनी चाहिए. कबीर जैसे विद्रोही तेवर कविताओं में बरक़रार रहे. वक्त को यह तो महसूस हो कि वैसे महान कवि अब भले ही नहीं है, उनके चिंतन की लाईन पर चलने वालो लोग तो है. मै इस वक्त कबीर जी को याद कर समकालीन समय कि प्रवृत्तियों पर कुछ पद लिख रहा हूँ. इस तरह के पद कुछ अन्य कवियों ने भी लिखे है. मै भी प्रयास कर रहा हूँ. चिकनी चुपडी बातें करने का कोई मतलब नहीं. दो टूक बातें होनी चाहिए. और वह कविता में हो, छंद में हो तो और बेहतर. मैंने कोशिश कि है. बीच-बीच मेरा क्रम चलता रहेगा.  अन्य कविताओं या रचनाओं कि पोस्टिंग के साथ-साथ व्यंग्य-पद भी जारी रहेंगे. ब्लॉग कि दुनिया में जिस तरह कुछ बेहद बचकाने और अगंभीर किस्म के कुछ लोग नज़र आते है, उनसे तो खैर कोई अपेक्षा ही नहीं करता, लेकिन जो साहित्य के मर्म और गंभीर रचना-कर्म को समझते है, उनसे तो अपेक्षा  करता ही हूँ, कि  वे इन पदों को पढेंगे और संभव हो तो प्रतिक्रिया भी देंगे. 
 
व्यंग्य-पद
(गतांक से आगे..)
(4)
जोड़-तोड़ अब सच्चा फन है।
उसको और नहीं कुछ आता, इसी काम में नंबर वन है।
दरबारी सम्मानित होते, खुद्दारी को कंटकवन है।
कैसा लोकतंत्र है जिसमें, जनता की छाती पर गन है।
बेतुक वाले राज कर रहे, छंद यहाँ निर्वासित मन है।
जो सत्ता के गुण ना गाए, उसका बेमतलब जीवन है ।
(5)
धन पा कर के पशु इतराते।
छोटा समझें निर्धन को वे, खुद को अकसर बड़ा जताते।
लूटा है जनता का पैसा, उसको ही ये शान दिखाते।
दया-दान कुछ भी ना करते, नेताओ पर मगर लुटाते ।
तरह-तरह के चोर यहाँ पर, लेकिन हम कुछ समझ न पाते।
जो जितने ज्यादा सफेद हैं, उतने काले काम कराते।
(6)
साधो जात-धरम का चक्कर।
मूरख बन जाते हैं अकसर, इस चक्कर में बस घनचक्कर।
ईश्वर ने भेजा था तुमको, पागल केवल मनुज बना कर।
बँट गए जात-पाँत में काहे, सोचो इस पर थोड़ा रुक कर।
मैं-मैं करके बकरी हो गए, जीयो मत तुम इक पशु बन कर।
सब जातों  को गले लगाओ, तो फिर जीवन जैसे शक्कर।
(7)
हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई।
सभी जगह है ज्ञान के अंधे, कैसे रस्ता दे दिखलाई।
पूजा-आराधन करते हैं लेकिन उनके काज कसाई।
रटे हुए कुछ पद हैं सुंदर, जैसे दोहे अरु चौपाई।
लेकिन गोरखधंधे ऐसे, काम न आए कुछ समझाई।
दो कौड़ी की पूजा है गर, अर्जित करते पाप-कमाई। (क्रमशः )

गिरीश पंकज

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साधो यह हिजडों का गाँव-१२

>> Tuesday, August 11, 2009


(35)
खुल्ला खेल फ़रुक्खाबादी.
लूटेंगे हम जी भर कर के, पहन रखी है हमने खादी.
हम ही गुंडे, हम ही पोलिस,  क्या कर लेगी ये आबादी?
लोकतंत्र है, मिली हुई है, सबको यहाँ मस्त आजादी.
पतन देख लो हद है अब तो, होती है समलैंगिक शादी.
देख रहे है नंगाई सारे, टीवी पर अब दादा-दादी.
हम पाखंडी, मगर भक्त है, पूजा-पाठों के है आदी.
लूट रहे है पूँजीवाले, अब गरीब की रोटी आधी.
नंगापन अब सुर्खी बनता, भाए खबर न सीधी-सादी.
सही नही मिलते अब नेता, इसीलिए दिखती बर्बादी.
(36)
साधो नकली सिक्के चलते.
असली की पहचान नहीं है, इसीलिए सब हमको छलते.
सच की होती कहीं प्रतिष्ठा, झूठे सगरे बैठे जलते.
उल्लू के घर बुद्धिमान भी, देखा  मजबूरी में पलते.
शातिर जीत रहे है बाजी, सच्चे रह गए हाथ ही मलते.
कब होगी अच्छो की चर्चा,  दुःख में रोज बेचारे गलते.
(36)
रात को बैठ कबीरा रोता.
कौन यहाँ कुछ सोचे आखिर, लिख देने से क्या कुछ होता..?
मस्त लोग अपनी मस्ती में,  लगा रहे है सुख में गोता.
पाप करे कुछ लोग यहाँ पर,  कवि  बेचारा पीडा ढोता.
लिखना मतलब आहें-आंसू . इन सब को ही दे दो न्योता.
गाली देता यहाँ अघाया और मज़े से बन्दा सोता.
गिरीश पंकज

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सुनिए गिरीश पंकज को

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