''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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बहुत संभल कर 'आना' बिटिया

>> Tuesday, April 10, 2012

बहुत संभल कर 'आना' बिटिया
बिगड़ा इधर ज़माना बिटिया

बहलाने वाले है ढेरों
अपनी राह पे जाना बिटिया

पग-पग पर हैं यहाँ छलावे
मन को मत भरमाना बिटिया

नयी हवा में बह मत जाना
अपनी राह बनाना बिटिया

तुम भी हो कल की निर्माता
सबको यह समझाना बिटिया

दादी-नानी की 'पोटलियाँ'
उसको नहीं गुमाना बिटिया

(ब्लॉगर शिखा वार्ष्णेय  द्वारा अपनी बेटी के जन्मदिन पर लिखी गयी कविता को पढ़ने के बाद)

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ग़ज़ल, / करते अपनी औलादों पर अक्सर ही अफसोस पिता....

>> Sunday, January 15, 2012

पहले बहुत मुखर रहते थे, भर देते थे जोश पिता
अब तो बस खोए-खोए-से,
रहते हैं खामोश पिता

जिनको पाला-पोसा वे सब, निकले नमकहराम बड़े
ऐसी औलादों पे अक्सर, करते हैं अफसोस पिता

काश हमेशा बच्चे रहते, बने यहाँ हम डैडी क्यों
अपने में ही मस्त-मस्त हैं, दूर हुए कई कोस पिता

इनका भी इक दौर था सबसे कितना ये बतियाते थे
अब तो है केवल तन्हाई, किसको दे फिर दोष
पिता

बचपन में जब गिर जाता था, कितना रोया करता था,
चुप होता था उसी घड़ी जब, लेते थे आगोश पिता

दुनिया अपने ढर्रे पर है, कल कितना अच्छा था वो
रिश्तों में बढ़ती खुदगर्जी, रहे बैठ कर कोस पिता

कभी नहीं फरमाइश करते, पढ़ सकते तो पढ़ लो मन
जितना भी मिल जाये उसमें, कर लेते संतोष पिता

अपने सुख को काटा-पीटा, माँ भी रही अभावों में
लेकिन बच्चों की खातिर तो हरदम अक्षय-कोष पिता

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कोई मुझसे लिखवाता है / वरना मुझको क्या आता है......

>> Friday, January 6, 2012

कोई मुझसे लिखवाता है
वरना मुझको क्या आता है
सृजन-कर्म की बात निराली
भीतर कोई है...गाता है
आँसू भी रचते है कविता
अनुभव तो यह बतलाता है
कविता ने जोड़ा है सबको
दुनिया से अपना नाता है
रचना की प्यारी दुनिया में
कौन पराया रह पाता है
रचते-रचते मन भी अपना
रचना जैसा बन जाता है
सोई दुनिया जागे सर्जक
शब्दों से जिसका नाता है
कविताओं के सुंदर घर में
केवल सुंदर-मन आता है
सर्जक को तो ईश्वर आ कर
अपने दर्शन करवाता है
ओ कविते तव दर्शन से ही
अंतर्मन यह सुख पाता है
गीत अगर गीता बन जाये
'कृष्ण' तभी मुस्का पाता है
लिखे-पढ़े तो पंकज अनपढ़
धीरे-धीरे तर जाता है

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नई ग़ज़ल / मरते नहीं जो लोग वो किरदार था अदम ....

>> Sunday, December 18, 2011

ग़ज़ल की इक धार था, तलवार था अदम
साहित्य की दुनिया में अवतार था अदम

बाहर निकाला हुस्न की चर्चा से गज़ल को
कविता की सही राह या विचार था अदम

जैसा लिखा वैसा ही जिया था बड़ा कमाल
कविता के गले का वो इक हार था अदम

उसकी कमी पूरी कभी भी हो नहीं सकती
सबसे अलग, सबसे जुदा फनकार था अदम

इंसानियत कहते हैं किसे उसने बताया
कविता का नया बिलकुल औजार था अदम

जो ज़िंदगी सच था बेबाक कह दिया
जो दब न सका वो इक अखबार था अदम 

यादों में वो हमेशा ही महकेगा हमारे
मरते नहीं जो लोग वो किरदार था अदम

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नई ग़ज़ल / दर्द किसी को भी बतलाना ठीक नहीं....

>> Friday, December 16, 2011

हमने माना यार ज़माना ठीक नहीं
फिर भी ये सब झूठ-बहाना ठीक नहीं

जहाँ हमारे जाने से बेचैनी हो
वहाँ कभी भी आना-जाना ठीक नहीं

दिल देने से पहले सोच लिया होता
बाद में फिर बैठे पछताना ठीक नहीं

कुछ उसूल होते हैं यारो महफ़िल के
बिन बोले यूं छोड़ के जाना ठीक नहीं

लूटा और खसोटा अपने लोगों को
पाप है ऐसी दौलत पाना ठीक नहीं

सुनकर मन ही मन खुश होते लोग यहाँ
दर्द किसी को भी बतलाना ठीक नहीं

जितना भी कुछ पाया उसमें मगन रहो
रोज़-रोज़ का रोना-गाना ठीक नहीं

अपने तो हैं लेकिन काम नहीं आते
खाली-पीली नाम गिनाना ठीक नहीं

कहते हो तो करके भी दिखलाओ ना
बस यूं ही उपदेश पिलाना ठीक नहीं 

हम बंजारे ठहरे यायावर हैं हम
अपना कोई एक ठिकाना ठीक नहीं

अगर गिरा है कोई उसे उठा लेना
उस पर हँसना या मुसकाना ठीक नहीं

प्यार अगर है तो हमसे तुम बोलो ना
दिल में क्या है इसे छिपाना ठीक नहीं

पोल पोल होती है इक दिन खुलती है
अच्छाई का स्वांग रचाना ठीक नहीं

सबसे मिलना प्यार-मोहब्बत से पंकज
क्या अपना औ क्या बेगाना ठीक नहीं   

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नई ग़ज़ल / जुबां खामोश रहती है इशारे बोल उठते हैं.....

>> Wednesday, August 31, 2011

जुबां खामोश रहती है इशारे बोल उठते हैं
हम अक्सर बस इसी के ही सहारे बोल उठते हैं

रखोगे कब तलक बंदिश में सच को पूछता हूँ मैं
हमारे होंठ तो ये बिन पुकारे बोल उठते हैं

हमें अपनों से क्या लेना कहाँ ये काम आते हैं
मगर जो गैर होते हैं वो प्यारे बोल उठते है

तुम्हारा हाल कैसा है तुम्हारा मूड क्या कहता
रहो तुम मौन लेकिन ये नज़ारे बोल उठते हैं

यहाँ वे लोग दण्डित हो रहे जो सत्य कहते हैं
जो दिखता है हकीकत में बेचारे बोल उठते हैं

भंवर में फंस न जाना तुम भले तैराक हो पंकज 
नदी खामोश रहती है किनारे बोल उठते हैं
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और चलते-चलते आज के हालात पर एक शेर
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बहुत खामोश रहते है यहाँ लाखों मगर सच है
समूचा देश जागे जब ''हजारे'' बोल उठते हैं

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दुखी मन से दो गीत / अपनी असफलता पर हाय, लोकतंत्र शर्मिन्दा है.....

>> Friday, August 12, 2011

पुणे में हत्यारी पुलिस तीन लोगों की जान ले लेती है. इसी तरह के मंज़र कहीं भी देखे जा सकते हैं. मन विचलित हो जाता है यह सब देख कर. हम १५ अगस्त को अपनी आज़ादी की वर्षगाँठ मनाएंगे, लेकिन क्या सचमुच आज़ाद हो गए है? नंगे घूमने के लिए आजाद हैं, घोटाले लिए करने के आज़ाद हैं,  लेकिन सत्ता अगर गलत कर रही है, तो उसका विरोध नहीं कर सकते. और कहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा हैं. अन्ना हजारे धरना देना चाहते हैं तो पूरी दिल्ली में धरा १४४ लगा दी जाती है. क्या यह है लोकतंत्र? यह शोक्तंत्र है. बहरहाल,दो गीत
 (१)

बंद करो यह गोलीबारी 
कुरसी क्यों हो गई हत्यारी.

जनता का दुःख-दर्द न समझे, बस गोली से बात करे.
लोकतंत्र का जो है चाकर, वही लोक पर घात करे? 
कहने को गाँधी के चेले,हत्यारे हैं खद्दरधारी...

क्या सोचा था कैसा है ये देश, हमें दुःख होता है
राजघाट पे बैठा गाँधी, रोजाना ही रोता है.
भारत माता भी रो-रो कर,
नेताओं से अब तो हारी...
बंद करो यह गोलीबारी..
----------
हक़ जो मांगे उनको डंडे या फिर जेल दिखाते है.
क्यों जनता के लोग यहाँ, इतने निर्मम हो जाते है.
जनता राजा थी लेकिन अब, हो गई है बिलकुल बेचारी.
बंद करो यह गोलीबारी ..........
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सच कहना अब पाप हो गया, चुप्पी का अभिनन्दन है,
छद्मश्री  को  पद्मश्री है, सच के हिस्से  क्रंदन है.
किसको दोष यहाँ दे बोलो, अपनी ही गलती है सारी.
बंद करो यह गोलीबारी
कुरसी क्यों हो गई हत्यारी.

(2)

कैसा है ये लोकतंत्र, हम  गोली खा कर मरते हैं .
पहले से बदतर भारत को देख लोग अब डरते है.

वो था जनरल डायर जिसने, नंगा नाच दिखाया था
जलियांवालाबाग़ में जालिम ने तब लहू बहाया था..
लेकिन अब उस डायर के काले वंशज मंडराते है.
लोकतंत्र की छाती को ये उफ़ छलनी कर जाते हैं
भारत माता के वसनो को कदम-कदम ये हरते हैं.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम  गोली खा कर मरते हैं .
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जनहित में हर उठा हाथ अब, यहाँ झुकाया जाता है
हिंसा के बलबूते पर ही  तंत्र चलाया जाता है.
कहने को आज़ाद हो गए, मगर सत्य यह ज़िंदा है
अपनी असफलता पर हाय, लोकतंत्र शर्मिन्दा है.
सुविधाओं के लिये लोग अब, सच कहने से बचते है
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं
------------------
गाँधी, क्या ये देश तुम्हारा, फिर गुलाम हो जाएगा?.
लोकतंत्र का सुंदर चेहरा, दूर कहीं खो जाएगा.
असफल सरकारों के हाथों, देश लुटा अब जाता है.
किसको हम चुन लेते है ये, देख लोक पछताता है.
अपने ही हाथो हारे हम, खुद ही आहें भरते हैं.
कैसा है ये लोकतंत्र, हम गोली खा कर मरते हैं .
----------
ये विकास का दानव अब तो निगल रहा है गांवों को
शहरों को बर्बाद कर दिया, नष्ट कर रहे छांवों को
वो धरती अब छिनती जाती, जिसमे अन्न उगाते हैं
गोली से मरते किसान अब, हाय-हाय चिल्लाते है,
सीधे-सादे लोग मरे नित, कैसा भारत गढ़ते है.

कैसा है ये लोकतंत्र, हम  गोली खा कर मरते हैं
पहले से बदतर भारत को देख लोग अब डरते है.
....

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नई ग़ज़ल/ जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है

>> Monday, August 8, 2011

जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है
जो हैं झूठे वहां खुशियों की चादर झिलमिलाती है

बड़ी तकलीफ होती है जहां झूठे ही बसते हैं
सच्चाई तो दुबक कर के वहां आंसू बहाती है

ये मेरे लोग ही मुझको पराये-से लगें अब तो
अगर सच बोलता हूँ तो जुबां ये लड़खड़ाती है

अगर इंसान है ऊंचा तो अपना दिल बड़ा कर ले
जहां बौने हों दिल से लोग वह बस्ती सताती है

मैं वैसा मुल्क चाहूंगा जहां सच पे न हों पहरे
अभी तो बंदिशों में आत्मा ही छटपटाती है

कोई तो आये बोले खुल के अपनी बात रख दे तू
यहाँ हर एक कुर्सी रंग सामंती दिखाती है

यहाँ भगवान भी पत्थर से बाहर आ नहीं पाता
उसी के सामने इज्ज़त कोई अपनी गंवाती है

ज़रा सोचो न इतराओ चलो इनसान बन जाओ
अरे यह चार दिन की ज़िंदगी कब लौट पाती है

न जाने कब सुगन्धित दौर आएगा यहाँ पंकज
अभी तो हर तरफ नाली यहाँ पर बजबजाती है

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नई ग़ज़ल / हर सिम्त खुल रहे हैं बदन देख रहे हैं

>> Sunday, July 31, 2011

मत पूछिए हम कितना पतन देख रहे हैं
हर सिम्त खुल रहे हैं बदन देख रहे हैं

ये कैसी नयी सभ्यता है कैसा नया दौर?
कम हो रहे लोगों के वसन देख रहे हैं

पहले हजारों लोग मरे देश के लिए
अब उनको खोजता है वतन देख रहे हैं

इंसान हूँ अन्याय को सहने की हद भी है
कब तक के कर सकेंगे सहन देख रहे हैं

अपने कहे से रोज मुकर जाए सियासत 
पल-पल में बदलते हैं कथन देख रहे हैं

रिश्ते न टूट जाएँ वो खुदगर्ज़ हैं बड़े
कोशिश में हमीं कर के जतन देख रहे हैं

विश्वास था माली इसे महकाएगा ज़रूर 
लेकिन यहाँ उजड़ा ये चमन देख रहे हैं

ये 'तंत्र' बड़े प्यार से सौंपा था हमीं ने
उन हाथों में अपने लिए 'गन' देख रहे हैं

हमने जिन्हें उठा के बिठाया था फलक पर
वे हमको दिखाते हैं ठसन देख रहे हैं

सूरज न जाने कब इधर आएगा क्या पता
फिलहाल रात है ये गहन देख रहे हैं

जिसके लिए हम जान लुटाएं, दगा करे
धोखाधड़ी है अब तो चलन देख रहे हैं

पापों का हाल ये है इधर पूछ न पंकज 
पापी ही रोज करते हवन देख रहे हैं

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ग़ज़ल / हर शख्स कहे क्या बात कही कुछ ऐसी अपनी बात रहे

>> Wednesday, July 13, 2011

शुभ रात रहे, शुभ प्रात रहे
घायल न कोई जज़्बात रहे

सब रहें प्यार से जीवन में
क्यों घात रहे, प्रतिघात रहे

हर शख्स कहे क्या बात कही
कुछ ऐसी अपनी बात रहे

हम तोड़ें अपनी चुप्पी को
भावों की मधुर बरसात रहे

मंजिल से पहले रुकें नहीं
अपनी ऐसी शुरुआत रहे

यह जीवन अपना हो सुन्दर
इस दुनिया को सौगात रहे

सब एक रहें सब मानुष हैं
क्यों धर्म, जात औ पात रहे

जो अपने हैं उन सब का ही
बस जीवन भर का साथ रहे

जो बिछुड़े हैं मिल जाएँ वे
क्यों  नैनन में बरसात रहे


हों भले काम, उनके पीछे-
अपना भी थोड़ा हाथ रहे

हर च
हरे पर मुस्कान रहे
यूं खुशियों की बारात रहे

बस हमें आपका प्यार मिले
पंकज की इतनी बात रहे

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नई ग़ज़ल/ वे इतने बिंदास हो गए वैचारिक संडास हो गए ....................

>> Friday, July 8, 2011

यह समय कई बार विचित्र किन्तु सत्य जैसा लगता है. फिल्मो में गालियों का इस्तेमाल  हो रहा है, यथार्थ के नाम पर साहित्य में भी गालिया और अश्लीलता खुलेआम नज़र आती है. समलैंगिकता को प्रगतिशील आचरण समझा जा रहा है. हर वर्जित चीज़ों को लोग प्रगतिशील बन कर जायज़ ठहराने पर तुले हैं. इस पर कुछ अलग से लिखूंगा. फिलहाल कुछ शेर अभी बने हैं, इसी मानसिकता पर, सो, प्रस्तुत हैं.

वे इतने बिंदास हो गए
वैचारिक संडास हो गए
 

प्रोग्रेसिव बनने की खातिर
फ़ौरन बिना लिबास हो गए
 

गाली देना कला बन गयी
भजन यहाँ बकवास हो गए


सबको दो कौड़ी का समझा
खुद ही गुम इतिहास हो गए
 

सुविधाओं के चक्कर में कुछ
सज्जन भी बदमाश हो गए
 

भ्रष्ट यहाँ नायक दिखते हैं
अच्छे सभी उदास हो गए
 

सच-सच बोल दिया तो उनके
पैरों की हम फास हो गए
 

बोल न पाए बातें सच्ची
क्या वे ज़िंदा लाश हो गए
 

जाने का ये नाम न लेते
दर्द हमारे ख़ास हो गए
 

पढ़-लिख कर कुछ फेल हो गए
बिना पढ़े कुछ पास हो गए

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नई ग़ज़ल / अपनी हिम्मत से मौसम बदल जाएगा

>> Tuesday, May 31, 2011

बहुत दिनों के बाद आना हुआ. हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह सुकून देने वाला भी हो कि बोर करने वाली रचनाओं से तो बच गए. लेकिन हम भी कम नहीं, लीजिये, फिर आ गए हैं, एक नई ग़ज़ल के साथ...

वक़्त जैसा भी है यह संभल जाएगा
अपनी हिम्मत से मौसम बदल जाएगा

वक़्त आया तो उसको पकड़ लीजिए
वरना मुट्ठी से अपनी फिसल जायेगा

मुद्दतों बाद आया है दिन प्यार का
देर की तो मुहूरत ये टल जायेगा

चलते चलते चलो रात बीतेगी ये
अपना सूरज वो प्यारा निकल जाएगा

नन्हा बच्चा खिलौने से कुछ कम नहीं
खेलते ही रहो दिल बहल जायेगा

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नई ग़ज़ल / मेरा देवता राम भी है तो....वही कभी रहमान हो गया

>> Saturday, May 21, 2011

फिर से लहूलुहान हो गया
फिर तेरा अहसान हो गया

दिल के बेहद छोटे थे वे
किनके घर मेहमान हो गया

कुर्सी क्या पाई उनको तो
खुद पर बड़ा गुमान हो गया

ठोकर खाई बार-बार तो
दुनिया क्या है ज्ञान हो गया 

अपना समझा था जिस घर को
वहीं मेरा अपमान हो गया

मुझे देख वो ना मुस्काया
उसके मन का भान हो गया

अपनी शक्ति को पहचाना
लो मैं भी भगवान् हो गया

निंदक मुझको नहीं डराते
मैं उनसे अनजान हो गया

जिसके मन में करुणा जागी
वही शख्स इंसान हो गया 

झलक दिखा कर छिप जाते हो
प्रिय तुमसे परेशान हो गया

कीचड फेंको, गाली भी दो
यह कितना आसान हो गया

मेरा देवता राम भी है तो
वही कभी रहमान हो गया 

माँजा है हालात ने पंकज 
हर संकट वरदान हो गया

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ग़ज़ल / दिल में हो गर प्यार तो कोई क्यों हमको अनजान लगे

>> Monday, May 16, 2011

पहली बार मिले हैं लेकिन बरसों की पहचान लगे
दिल में हो गर प्यार तो कोई क्यों हमको अनजान लगे

तुम आए तो इस जीवन में फिर बहार-सी आई है
उजड़ा-उजड़ा गुलशन मेरा हरा-भरा उदयान लगे

अगर प्यार-करुणा ना होगी केवल हो खुदगर्जी तो
कैसा भी हो ज्ञान मुझे वह ज्ञान नहीं अज्ञान लगे

रोजाना जो दुखीजनों की सेवा करता रहता है
सच बोलूँ तो शख्स मुझे वो धरती का भगवान् लगे

जहां न कोई आए-जाए पाबंदी हो, बंदिश हो
आलीशान भले हो कितना घर वो कब्रिस्तान लगे

जहां कद्र ना हो प्रतिभा की चापलूस दरबारी हों
वहाँ अदब के ''डान'' मिलेंगे और सभा शमशान लगे

अगर हौसला है भीतर तो चिंता काहे की पंकज 
हर मुश्किल हो चाहे जितनी हमको तो आसान लगे

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नई ग़ज़ल / हमको हर सपना भरमाया करता है

>> Thursday, May 5, 2011

हमको वह विश्वास जिताया करता है
अक्सर जो भीतर से आया करता है

पत्थर की मूरत तो पत्थर है बिलकुल
ईश्वर का अहसास बचाया करता है

मैंने दोनों से यारी अब कर ली है
दुःख आता है, सुख भी आया करता है

जख्म मिले हैं अपनों से मिलते ही हैं
वक़्त हमारे घाव मिटाया करता है

अहसानों से दबा हुआ है बेचारा
उफ़ वो कितने बोझ उठाया करता है

उन पर ज्यादा यकीं नहीं करना अच्छा
हमको हर सपना भरमाया करता है

वह मेरा दुश्मन है लेकिन प्यारा है
मेरे ही गीतों का गाया करता है

इक दिन इस दुनिया में प्यार ही जीतेगा
रोज़ मुझे यह स्वप्न लुभाया करता है

पंकज इक राजा है अपनी दुनिया का
सदभावों को रोज लुटाया करता है

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जब-जब सच कहना चाहा है अपनी जान पे बन आई है

>> Thursday, April 21, 2011

सच के हिस्से तन्हाई है
वक़्त बड़ा ये हरजाई है

मित्र समझ कर बात कही थी
अब दोनों में रुसवाई है

जब-जब सच कहना चाहा है
अपनी जान पे बन आई है

दौलत ने दो फाड़ कर दिया
कौन यहाँ किसका भाई है

किसने सच का साथ दिया है
झूठों की तो बन आई है. 

सुख को पकड़ रहा था मैं भी
पता चला वह परछाई है

हम न झुकेंगे रहेंगे भूखे
मरने की फितरत पाई है

पंकज रहना सुखी अकेले 
बस्ती में हाथापाई है

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नई ग़ज़ल / आओ थोड़ा रूमानी हों ये मौसम भी कुछ कहता है

>> Sunday, April 17, 2011

अपने चेहरे पर रीझा है
जीने का यह ढंग अच्छा है

हरदम ऐठे-ऐठे रहना
वो इंसां जाने कैसा है

मुसकाना तो मुफ़्त मिला है
क्या इसमें लगता पैसा है

अपने से जो कर ले यारी
कभी नहीं रहता तन्हा है

दुःख में डूबा है वो लेकिन
दुनिया के आगे हँसता है

क्यों मानूं हैं लोग पराए
हर कोई अपना लगता है

प्यार कभी था इस दुनिया में
सचमुच यह सुन्दर किस्सा है

देख के दुनिया हँसता-रोता
हम हैं भ्रम में वो बच्चा है

आओ थोड़ा रूमानी हों
ये मौसम भी कुछ कहता है

मंज़िल उस तक चल कर आती
जो हरदम चलता रहता है

दुश्मन का भी दिल जीतेंगे
पंकज का अपना फंडा है

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नई ग़ज़ल / जो दगा देते हैं उनको प्यार क्यों करना

>> Wednesday, April 13, 2011

दस दिन बेहद परेशान रहा. सड़क खुदाई के कारण केबल कटा और नेट बंद. शिकायत की मगर सरकारी काम तो लखनवी अंदाज़ में ही होता है न. आराम के साथ हुआ. आज वह दिन आया और बेताबी के साथ अपने चाहने वालों के बीच फिर हाज़िर हूँ. मन की अभिव्यक्ति के इस मंच-ब्लॉग- के माध्यम से फिर एक ग़ज़ल पेश है- ('सुने न सुने कोई मेरी पुकार')

आँसुओं को व्यर्थ ही बेकार क्यों करना
जो दगा देते हैं उनको प्यार क्यों करना

दिल मेरा बिकता नहीं, ख्वाहिश नहीं कोई
खामखा इसको यहाँ बाज़ार क्यों करना

ज़िंदगी में जीत की संभावना है जब
हारने की बात को स्वीकार क्यों करना

पत्थरों के इस नगर में कौन सुनता है
दिल के अपने दर्द का इज़हार क्यों करना 

हम बुलाते ही रहे वे ही नहीं आए
इक यही है काम क्या हर बार क्यों करना 

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ग़ज़ल / प्यार में इनकार तो पहला कदम-सा है

>> Monday, April 4, 2011

प्यार की भाषा रहे मनुहार की भाषा
सच कहें तो है यही संसार की भाषा

नफरतों के वार से दुनिया नहीं बचनी
चाहिए हमको सदा इक प्यार की भाषा

जीतने का हौसला लेकर चले हैं हम
व्यर्थ क्यों बोलें हमेशा हार की भाषा

प्यार से जिनसे मिलो निकले सयाने वे 
हमसे ही कहने लगे व्यापार की भाषा

प्यार में इनकार तो पहला कदम-सा है
बाद में हो जाए वो इकरार की भाषा

जोड़ दे गर दो दिलों को है सही अलफ़ाज़
तोड़ दे रिश्ते तो है बेकार की भाषा

तोड़ कर के जो सभी सीमाएं बढ़ती हैं
दरअसल है प्यार ही व्यवहार की भाषा

ग्रन्थ कितने ही पढ़े हैं डिगरियां पाईं
ढाई आखर में छिपी थी 'सार' की भाषा

हमको आखिर क्यों मिले सम्मान सरकारी
बोलता पंकज कहाँ सरकार की भाषा

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ग़ज़ल / चेहरे से मुसकान नदारद क्यों उनसे बेकार मिले हैं

>> Thursday, March 31, 2011

हमको ऐसे यार मिले हैं 
जिनसे हरदम वार मिले हैं

दुश्मन भी शरमा जाएगा
कैसे रिश्तेदार मिले हैं

जिन हाथों ने प्यार दिया है
ऐसे भी दो-चार मिले हैं

लगता है पहचान पुरानी
जबकि पहली बार मिले हैं

जिसने संघर्षों को पूजा
उसको स्वागत-द्वार मिले हैं

चेहरे से मुसकान नदारद
क्यों उनसे बेकार मिले हैं

अब तक दिल से मिल न पाए 
मिलने को सौ बार मिले हैं

टुकडे-टुकडे बँटे हुए हैं
खुदगर्ज़ परिवार मिले हैं

लुटा दिया जनहित में सब कुछ
हाँ ऐसे दिलदार मिले हैं

मर गए लेकिन भीख न माँगी
कुछ महान खुद्दार मिले हैं

खाओ-पीयो मुँह मत खोलो
ये कैसे अधिकार मिले हैं

नंगापन ही बड़ी ख़बर है
हमको वे अख़बार मिले हैं

नफ़रत, साजिश और ये आँसू
उफ कितने उपहार मिले हैं

कथनी-करनी में है अंतर
ढोंगी रचनाकार मिले हैं

बिछ गए सत्ता की चौखट पर
नए-नए फनकार मिले हैं

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सुनिए गिरीश पंकज को

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