''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
Showing posts with label सवक्तव्य-नवगीत. Show all posts
Showing posts with label सवक्तव्य-नवगीत. Show all posts

गीत बिना मर जाएंगे...

>> Friday, October 14, 2016

इस बार साहित्य का नोबेल पुरस्कार अमरीकी गीतकार और गायक बॉब डिलेन को मिला, यह खबर सकून देने वाली है, इसलिए कि दुनिया में गीत प्रतिष्ठित हुआ है। गीत के प्रति कुछ लोगों की तथाकथित आधुनिक-दृष्ठि अलगाववादी है. छंदमुक्त कविता के दौर में गीत को हाशिये पर डाला गया, जबकि गीत हमारी आत्मा का हिस्सा है. बॉब के अनेक गीत यू ट्यूब में हैं, उनको सुने तो हम पाते है, उनमे करुणा है, उल्लास है. लोकराग है. आधुनिक संस्पर्श भी. गीत जब लोगों के बीच बॉब डिलेन की तरह प्रस्तुत किया जाता है तो वह गीत सबका हो जाता है। बॉब डिलेन पर विस्तार के साथ लेख लिखूँगा।

प्रस्तुत है गीत पर एक गीत

गीत बिना मर जाएंगे।
पत्तों-सा झर जाएंगे।

गीत हमें ज़िंदा रखते हैं,
घावों को सहलाते हैं।
जब हम होते एकाकी तो -
गीत दौड़ कर आते हैं।
अगर गीत निकले जीवन से,
बाद में हम पछताएंगे।।
गीत बिना मर जाएंगे।

चारों तरफ गीत की दुनिया,
धरती को यह भाता है।
सुनें गौर से गाती नदियाँ,
पर्वत भी दुहराता है।
वृक्ष गुनगुनाते चिड़ियों संग,
हम भी मिलकर गाएँगे।।
गीत बिना मर जाएंगे।

जिसके मन में गीत नहीं है,
उसका कोई मीत नहीं।
हारेगा वह प्रतिपल जीवन,
यह तो कोई रीत नहीं।
बेतुक-छन्दहीन जीवन से,
हम तुक में कब आएँगे।
गीत बिना मर जाएंगे

Read more...

स्वारथ जब दिमाग पर छाया रिश्ते टूट गए...

>> Friday, May 7, 2010

इस क्रूर समय में अच्छे लोगों का जीना कठिन हो गया है, बाहर की क्या बात करुँ , अब तो घर-घर में नफ़रत और अलगाव का मंज़र नज़र आने लगे हैं. दुःख होता है देख कर, जब एक भाई दूसरे भाई की जान लेने पर आमादा हो जाता है,क्योंकि उसे संपत्ति में बंटवारा चाहिए. यह दौलत कितनी खतरनाक होती है कि दो दिल, दो खून अलग-अलग हो जाते है. अरबपति अम्बानी से लेकर अनेक आम मध्यमवर्गीय परिवार में भी आर्थिक मामलों में कोई संतुष्टि नहीं दिखती. एक भाई दूसरे भाई के लिए त्याग क्यों नहीं कर पाता..? क्या धन-दौलत में इतनी ताकत होती है, कि वह सगे लोगों को भी पराया बना देता है. हम भाई सौभाग्यशाली है कि अभी तक प्रेम से ही रहते है, और हमारे सामने ऐसी कोई नौबत भी नहीं आने वाली. आज की पोस्ट लिखने का कारण है. कल मै बहुत दिन बाद एक किराना दूकान पर समान लेने गया. बारह फुट चौड़ी दूकान को दो भाई मिल कर संचालित करते थे. कल देखा तो दंग रह गया कि वही दूकान दो भागों में बंटी हुई है. छः-छः फुट की दूकान...देख कर झटका-सा लगा. मैंने फ़ौरन नाराज़गी व्यक्त की कि ''ये क्या है भाई..?तुम लोग साथ-साथ नहीं रह सकते थे?'' बड़े भाई ने संकोच के साथ कहा-''क्या करे साब, छोटा नहीं माना.'' मैंने छोटे को देखा. वह मौन था. मुस्कराता रहा, बस. मैं क्या करता. कोई पंचायत तो था नहीं कि फैसला सुना देता कि कल से दोनों भाई एक साथ रह कर व्यवसाय करेंगे. दुखी मन से लौट आया. कल से ही सोच रहा था, कि इस विघट्नवादी-अलगाववादी प्रवृत्तियो पर कुछ लिखूंगा. यह जानता हूँ, कि मेरे लिखने से कुछ होने से रहा. हो सकता है उलटे लोग नाराज़ भी हो जाये, यह भी हो सकता है कुछ लोगों को मेरी बात ठीक लगे. बहुत संभव है कुछ भाइयों वे ऐसे बंटवारे का दर्द भोगा भी हो. बंटवारा घर का हो चाहे देश का, दुखद है. देश तो फिर भी भौगोलिकता के कारण स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन घर का टूटना आत्मा को छलनी करना होता है. दो लोग अलग होते है तो केवल दो लोग ही अलग नहीं होते, कितने लोग प्रभावित हो जाते है. प्रेम, सद्भावना, अपनापन सब ख़त्म हो जाता है. हम पशु बन कर जीते है, बस...खैर इस पर जितना लिखा जाये, कम है, अपनी भावनाओं को आज ग़ज़ल नहीं, एक नवगीत के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा हूँ.

नवगीत 
स्वारथ जब दिमाग पर छाया,
रिश्ते टूट गए..

घर-घर में बाज़ार घुस गया,
बन गए सब व्यापारी.
ऐसी आंधी चली बिखर गयी,
हरी-भरी सब क्यारी.
साथ-साथ चलने वाले क्यों
पीछे छूट गए..

दूर किताबों से जब थे हम,
तब था कितना प्यार.
जैसे-जैसे पढ़ना सीखा,
बिखर गया घरबार.
पढ़े-लिखे कुछ लोग स्वयं के,
घर को लूट गए...

धीरे-धीरे हरा-भरा 'यह,
बाग़' उजड़ता लागे.
समझ न पाऊँ इस तेज़ी से,
लोग कहाँ..क्यूं भागे?
खुशबू के ये देव अचानक,
क्यूं कर रूठ गए.

स्वारथ जब दिमाग पर छाया,
रिश्ते टूट गए..

Read more...

सुनिए गिरीश पंकज को

  © Free Blogger Templates Skyblue by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP