''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
Showing posts with label सवक्तव्य-गीत. Show all posts
Showing posts with label सवक्तव्य-गीत. Show all posts

अभियान-गीत/लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे....

>> Monday, January 10, 2011

          है कश्मीर हमारा सुंदर... इसको नहीं गवाएंगे
          लालचौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे
 किसी भी राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक है उसका ध्वज, उसकी भाषा, उसका राष्ट्र-गान. दुनिया में भारत ही वह अनोखा उदारवादी देश हैजहाँ दिन दहाड़े संविधान  जला दिया जाता है. ध्वज का अपमान होता है. बेचारी राष्ट्र भाषा की हालत क्या है, ये सब जानते है. अपने यहाँ तो कोई भी देशविरोधी बातें कर देता है और उस पर कार्रवाई नहीं होती. इसी उदारता का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि कश्मीर में देश विरोधी लोग तिरंगा न फहराने की घोषणा कर देते है. इसलिये  अगर कुछ लोगों  ने २६ जनवरी को कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की ठान ली है तो उनकास्वागत होनाचाहिए.  यह पहल केवल भारतीय जनता पार्टी के युवा लोग कर रहे है. जबकि यह सर्वदलीय अभियान होना चाहिए. इसमे देश भर के युवको  को शामिल होना चाहिए. राष्ट्र ध्वज केवल भाजपा का नहीं है. यह कांग्रेस का भी है औ दूसरे दलों का भी. लेकिन देश का यही दुर्भाग्य है कि यहाँ देश की अस्मिता का सवाल भी घटिया और टुच्ची राजनीति का शिकार हो जाता है. होनातो यह चाहिए था कि २६ जनवरी को एक सर्वदलीय मोर्चा बनाता और सारे राजनीतिक दल के लोग मिलजुल कर लाल चौक पर तिरंगा फहराते. पता नहीं हमारा देश राष्ट्रीयता के सवाल पर कब एकजुट होगा.  मै भाजपा कार्यकर्त्ता नहीं हूँ. न कभी हो सकता हूँ. मगर लाल चौक पर तिरंगा फहराने के अभियान का मैं खुल कर उनका समर्थन करता हूँ. मैं वहाँ नहीं जा पाऊँगा. लेकिन मेरी भावनाए वहां जायेंगी. मैं २६ जनवरी के लिये एक अभियान-गीत लिखा है. यह गीत उस भावना को समर्पित है, जो देश की शान के लिये अपनी जान लुटाने  का भी संकल्प लेती है. उम्मीद है यह गीत केवल दल विशेष का गीत नहीं बनेगा वरन हर देशवासी इसे दिल से गायेगा. क्योंकि केवल कश्मीर ही अमर नहीं है. इस देश का चप्पा-चप्पा हमारा है. हम कहीं भी जा कर तिरंगा फहरा सकते है. हमें  कोई नहीं रोक सकता. जो रोकेगा मतलब वह देशद्रोही है. जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर का यह बयान कितना हास्यास्पद है कि लाल चौक पर तिरंगा फहराने से कश्मीरी नाराज हो जंगे और वे भड़केंगे. अलगाववादी नेता यासीन मालिक ने भी चुनौती दी है, कि हम देखते है,कि लाल चौक पर कैसे फहराता है तिरंगा. हद है इस मानसिकता की. इस मानसिकता को चुनौती देने जो लोग निकल रहे है,. उनकाखुल कर स्वागत करनाचाहिये देश विरोधी लोगों से निपटना हमारा परमपुनीत कर्तव्य है. क्योंकि सवाल है देश का..किसी पार्टी का नहीं. प्रस्तुत है वन्दे मातरम के जय घोष के साथ यह अभियान-गीत----

युवा- शक्ति ने ठान लिया है, आगे कदम बढ़ाएंगे.
लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम...

नहीं डरेंगे गोली से हम, लाठी-पत्थर खाएंगे,
वीरों के जो वंशज है वे, कभी नहीं घबराएंगे.
है कश्मीर हमारा सुंदर, इसको नहीं गवाएंगे.
लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम...

बहुत हो चुका अब न सहेगे, गद्दारों की बातें.
भारत में रह कर जो करते, देशविरोधी घातें.
देशद्रोहियों को जा कर हम, अब तो  सबक सिखायेंगे...
लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे..
युवा- शक्ति  ने ठान लिया है, आगे कदम बढ़ाएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम...

हम उदार है इसका मतलब, हमें न कायर जानो.
हम है कट्टर देशभक्त बस, तुम हमको पहचानो.
जिन्हें मुल्क से प्यार नहीं हैं, वे न यहाँ टिक पाएंगे..
लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे.
युवा- शक्ति ने ठान लिया है, आगे कदम बढ़ाएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम...

बढ़ो-बढ़ो ओ वीर सपूतों, यह कश्मीर हमारा है.
चप्पा-चप्पा इस भारत का, हमें जान से प्यारा है.
देश हमारा, धरती अपनी, हम परचम लहरायेंगे..
युवा- शक्ति ने ठान लिया है, आगे कदम बढ़ाएंगे.
लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम...

जय-जय भारत वर्ष हमारा, अमर शान है तेरी.
तेरे लिये अगर जाती है, धन्य जान है मेरी.
बढ़े कदम माँ की खातिर अब, पीछे नहीं हटायेंगे.

 लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम...


युवा- शक्ति ने ठान लिया है, आगे कदम बढ़ाएंगे.
लाल चौक पर राष्ट्र-ध्वजा हम, जा करके फहराएंगे.
वन्दे मातरम...वन्दे मातरम..

Read more...

गीत / धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार,

>> Sunday, January 9, 2011

११ जनवरी को सीखो के महान गुरू गुरु गोबिंद सिंह जी की जयन्ती है. पिछले साल मैंने गुरु गोबिंद जी पर एक चालीसा भी लिखी थी. साहित्य लेखन के साथ-साथ मेरा मन करता है कि समाज को गढ़ाने वाले नायको के बारे में भी कुछ लिखा जाये इसलिये कभीकभी कालम चल जाती है. एक गीत पेश है गुरु गोबिंद सिंह जी पर....

धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार,
किया आपने अन्यायों का, कदम-कदम प्रतिकार..
आपकी दुनिया में जयकार...

महाकवि और महान योद्धा, सच्चे संत-सिपाही,
पूरा जीवन रहा आपका, इसकी नेक गवाही.
मारा हर पापी को लेकिन दुखियों से था प्यार.
धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार..

तेगबहादुर जी के सुत ने, अपना फ़र्ज़ निभाया,
अत्याचारी मुगलों के, सम्मुख ना शीश झुकाया.
सवा लाख से एक लड़ाने, हरदम थे तैयार..
धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार..

'दुष्टदमन' ने नए रूप में, जन्म लिया था सुंदर,
'नीलेवाला'', 'बालाप्रीतम' पर 'दशमेश' प्रलयंकर.
'पंथखालसा' स्थापित कर, रचा नया संसार.
धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार...

जात-पात का भेद मिटाया, ऊँच-नीच को तोड़ा,
दलितजनों को गले लगा कर, युग के बोध को मोड़ा.
'पंजपियारे' खोज निकाले, चमकी जब तलवार.
धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार..

तोड़ा मुगलों के गुरूर को, किया 'वंश' का दान,
अन्यायी से लड़े मगर थी, चेहरे पर मुस्कान.
झुक न पाए, टूट न पाए, थे महान किरदार..
धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार...

गुरू बनाया ग्रन्थ साहिब को, पंथ नया दिखलाया,
व्यक्ति नहीं, विचार को पूजो, सबको यह समझाया.
देश-धर्म हित किया आपने, न्योछावर परिवार.
धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार...

अनुपम योद्धा, ज्ञानी नायक की है गजब कहानी,
जब तक जीए सिंह सरीखे, हार कभी ना मानी.
चार दशक का जीवन लेकिन, सदियों तक विस्तार.
किया आपने अन्यायों का, कदम-कदम प्रीतिकार..

धन्य-धन्य गुरु गोबिंदसिंघ जी, धन्य-धन्य अवतार,
किया आपने अन्यायों का, कदम-कदम प्रतिकार..
आपकी दुनिया में जयकार...
आपकी दुनिया में जयकार.

Read more...

निशक्त हमारे ही परिजन है, इनका हम सम्मान करें,,,,,

>> Friday, December 3, 2010

एक लेखक होने के नाते मुझे लगता है कि मैं समाज के लिये अधिकाधिक उपयोगी बन सकूं. इसलिये साहित्य-सृजन के साथ-सथान्य सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की कोशिशे करता हूँ. फिर वह शराबबंदी का आन्दोलन हो, गोरक्षा की बात हो, अंधश्रद्धा निर्मूलन हो, या कुछ और. एक लेखक के नाते मै सामाजिक बदलाव मे अपनी गिलहरी-भूमिका की कोशिश करता रहा हूँ. इस बीच मैं ''अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद्'' नामक संस्था से जुडा. यह संस्था विकलांगों की सेवा में लगी है. इस संस्था की ओर से ४-५ दिसंबर को रायपुर में राष्ट्रीय संगोष्ठी भी हो रही है. इसमे देश भर के अनेक लेखन आयेंगे और विकलांगों के पक्ष मे लिखे जा रहे  साहित्य पर चर्चा करेंगे. इस संस्था के बारे में कभी सविस्तार लिखूंगा. संस्था के लिये मैंने एक प्रेरणा-गीत लिखा है--''निशक्त हमारे ही परिजन है, इनका हम सम्मान करें''.मेरा सौभाग्य है कि परिषद् के बड़े आयोजनों में यह गीत गाया जाता है. ''विकलांग दिवस'' पर उस गीत का अंश यहाँ दे रहा हूँ. दृष्टिबाधित बंधुओं के लिये भी एक गीत लिखा था, उसका अंश भी दे रहा हूँ. हम सब सृजनधर्मी मन वाले है. मै जानता हूँ, कि आपने भी निशक्तों के लिये कुछ न कुछ लिखा ही होगा. आज मेरे कुछ विचार देखें...


निशक्त हमारे ही परिजन है, इनका हम सम्मान करें
अपने जीवन के जैसा ही इन सबका उत्थान करे.

जाने कब किसके जीवन में, ये विपत्ति आ जाये,
हँसते-गाते काल-खंड में, दुःख-बदली छा जाये.
बड़ी कृपा ऊपर वाले की, उसने हमें बचाया.
लेकिन एवज में हमने क्या, निज कर्त्तव्य निभाया.
है कर्त्तव्य निशक्तों का हम, बिन बोले कल्याण करें.

निशक्त हमारे ही परिजन है, इनका हम सम्मान करें
अपने जीवन के जैसा ही इन सबका उत्थान करे.

एक गीतांश दृष्टिबाधितों के लिये...


नयन में ज्योति नहीं पर, दिलहमारा देखता है,
उसकी मुट्ठी में है दुनिया जो स्वयं का देवता है.

सृष्टि की रचना कहीं से जब ज़रा अनगढ़ हुई,
हम मनुष्यों की समस्या, तब अचानक बढ़ गई.
पर नहीं हारा समय से, जिसने खुद को गढ़ लिया,
और अपने कर्म की पुस्तक को पूरा पढ़ लिया.
वो विफलता के किले को, हौसले से भेदता है.
उसकी मुट्ठी में है दुनिया जो स्वयं का देवता है. 

नयन में ज्योति नहीं पर, दिलहमारा देखता है,
उसकी मुट्ठी में है दुनिया जो स्वयं का देवता है.

Read more...

भक्ति-गीत / तुम्हारे प्यार में मीरा ने विष का पी लिया प्याला

>> Tuesday, August 31, 2010

कल जन्माष्टमी है. बंशीबजैया भगवान् कृष्ण का जन्मोत्सव. 
मेरे एक प्रख्यात गायक मित्र है. भारती बन्धु. कुछ महीने पहले वे मेरे घर आये और कहा कि 'आपको एक भक्ति-गीत लिखना है'. मैं भक्ति-गीत नहीं लिखता. भक्ति या पूजा-पाठ में मेरी कोई रूचि भी नहीं. मैंने उन्हें टालना चाहा लेकिन मित्र है. उनका आग्रह मानना ही पडा उन्होंने एक पंक्ति दी-''हम आयेंगे, हम आयेंगे कन्हैया मिलने आयेंगे''.  बस, इसी पंक्तिको विस्तार दे कर गीत लिखना है. उन्हें गीत किसी समारोह में प्रस्तुत करना था. गीत की धुन वे बता चुके थे. (''जो हमने दासतां अपनी सुनाई आप क्यों रोए'') मित्र-आग्रह के कारण मन को कृष्ण-भक्ति में डुबाना पडा. आखिरकार एक गीत तैयार हो गया. वही गीत आपके सामने भक्ति-भाव के साथ प्रस्तुत है. आशा है,आपका स्नेह इस गीत को भी मिलेगा...

हम आयेंगे, हम आयेंगे कन्हैया, मिलने आयेंगे,
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..

ये अखियाँ है बड़ी प्यासी, इन्हें कुछ भी नहीं भाए,
जहाँ देखूँ वही तेरी मुझे सूरत नज़र आये.
अगर दर्शन न तेरे कर सके हम, मर ही जायेंगे.
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..

तुम्हारा नाम ले कर ही हमारा वक्त कटता है,
तेरे दर्शन की खातिर बावरा-मन ये भटकता है.
कहाँ छिप कर के बैठा तू वहीं धूनी रमाएंगे.
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..

तुम्हारे प्यार में मीरा ने विष का पी लिया प्याला,
तेरी धुन में मगन होकर के नाचे ब्रज की हर बाला.
तुम्हीं हो सबके मनमोहन तुम्हें कैसे भुलायेंगे.
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..

तुम्हारे बिन यहाँ अपना कोई ना इक सहारा है,
पडी है जब मुसीबत दिल ने बस तुमको पुकारा है.
तुम्हारा प्यार पाने हम कहाँ किस दर पे जायेंगे.
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे.. 

अगर मर्जी तुम्हारी हो तो बेड़ा पार हो जाये. 
कृपा तेरी मिले तो पंगु पर्वत लाँघ कर आये. 
हमें भी दो सहारा गीत हम तेरे ही गायेंगे.
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..


चलो अब हो चुका छिपना जरा तुम सामने आओ,
बजाओ बाँसुरी अपनी छवि सुन्दर दिखा जाओ.
तुम्हें देखे बिना कैसे अरे हम मुक्ति पाएंगे.
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..

हम आयेंगे, हम आयेंगे कन्हैया, मिलने आयेंगे,
चले आओगे तुम दौड़े तुम्हें इतना सतायेंगे..

Read more...

गीत / हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला ...

>> Tuesday, June 15, 2010

गाय... कहने को मनुष्येतर जीव है. लेकिन देखा जाये तो वह अपनी माँ से बढ़कर है. माँ का दूध हम दो साल तक पीते हैं लेकिन गाय कादूध जीवन भर. गाय से बनी चीज़ें भी हमारे साथ जीबव भी चलती है,. दही, मठा, छाछ, खीर, मलाई, रसगुल्ला. गुलाब जामुन, आदि न जाने कितनी चीज़े है, जिनके बिना जीवन अधूरा-सा लगता है. ऐसी पुन्यकोटि  गाय को हम जीवन से बहिष्कृत करते जा रहे है. गाय कभी हमारे जीवन के केंद्र में राही है, लेकिन आधुनिकता काऐसा खुमारचढ़ा कि हमने गाय को गोमांस के लिए पालना शुरू कर दिया. अब तो लोग गाय को चारा नहीं माँस खिला रहे है,ताकि वो मोटी-ताज़ी हो सके. अपने समाज में ऐसे अनेक नीच मिल जायेंगे जो गाय की ह्त्या को सही ठहरा सकते है.खैर, लिखते-लिखते इस विषय पर लंबा लेख लिखा जासकता है. इधर मैंने गाय की दुर्दशा पर सवा दो सौ पेज का एक उपन्यास ही लिख लिया है. उस पर कभी चर्चा करूंगा. अपने ब्लॉग में मै इसके पहले भी दो-तीन लिख चुका हूँ. मैं नास्तिक हूँ. पूजा-पाठ नहीं करता, मंदिर नहीं जाता,लेकिन मै गाय को प्रणाम करता हूँ, क्योकि उसका क़र्ज़ है मुझ पर.कर्ज़दार को तो झुकना ही पड़ता है. क़र्ज़ भी पटाना पड़ता है इसीलिए गाय पर कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ. एक बार फिर यह गीत सहन कीजिये....

हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला,
ऐसा गर हो जाये तो फिर भारत किस्मतवाला. 

गाय हमारी माता है यह, नहीं भोग का साधन.
इसकी सेवा कर लें समझो, हुआ प्रभु-आराधन.
दूध पियें हम इसका अमृत, गाय ने हमको पाला.
हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला...

गाय दूर करती निर्धनता, उन्नत हमें बनाए,
जो गायों के साथ रहे वो, भवसागर तर जाए.
गाय खोल सकती है सबके, बंद भाग्य का ताला.
हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला...

'पंचगव्य' है अमृत यह तो, सचमुच जीवन-दाता.
स्वस्थ रहे मानव इस हेतु, आई है गऊ माता.
गाय सभी को नेह लुटाये, क्या गोरा क्या काला.
हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला....

गाय बचाओ, नदी और तालाब बचाओ ऐसे,
'गोचर' का विस्तार करें हम अपने घर के जैसे.
बच्चा-बच्चा बने देश में, गोकुल का गोपाला.
हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला...

गौ पालन-गौसेवा से हो, मानवता की सेवा,
गौ माता से मिल जाता है, बिन बोले हर मेवा.
कामधेनु ले कर आती है जीवन में उजियाला..
हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला...

Read more...

अभियान-गीत/ मेरी जात है हिन्दुस्तानी,

>> Monday, June 14, 2010

इस वक़्त देश में जातीय आधारित जनगणना को लेकर खूब चर्चा हो रही है. मैंने अपने एक लेख में पिछले दिनों लिखा था-''जाति न पूछो साधु की''. कबीर छः सौ साल पहले कह गए है. मैंने भी तीन दशक पहले -जब होश संभल रहा था, अपनी जाति विलोपित कर दी थी. मुझे भी लगता है, कि जाति नहीं, व्यक्ति की योग्यता को मान्यता मिले. हम सब भारतीय है, हिन्दुस्तानी है, यह सोच बड़ी है. देश में इन दिनों मेरी जाति हिन्दुस्तानी की लहर चल रही है. इस अभियान को अपना समर्थन करते हुए पेश है मेरा यह नया अभियान-गीत..

मेरी जात है हिन्दुस्तानी,
मैं तो हूँ इसका अभिमानी...

मै हिन्दू ना मुस्लिम हूँ मै,
ना हूँ सिख-ईसाई.
देश हमारा सबसे पहले,
हम आपस में भाई.
खून सभी का लाल यहाँ पर,
सब पीते नदियों का पानी.

मेरी जात है हिन्दुस्तानी...

जाति-धर्म के झगड़े कब तक,
अब तो बंधन टूटे.
कब तक हमको लड़वा कर ये,
दुष्ट सियासत लूटे.
समझदार हम हो जाये फिर,
लिक्खें मिलकर नयी कहानी.

मेरी जात है हिन्दुस्तानी... 

हिन्दुस्तान में रहने वाला,
है केवल हिन्दुस्तानी.
बने रहेंगे कब तक आखिर,
हम जातिगत अभिमानी.
मिलजुल कर इस महादेश को,
करें आज हम सच्चा ज्ञानी.

मेरी जात है हिन्दुस्तानी... 

बना रहेगा आखिर कब तक,
खंड-खंड ये सुन्दर देश.
गाँधी ने जो भारत चाहा,
नहीं बना है वो परिवेश.
नवभारत निर्माण करें हम,
हो करके अब नव-विज्ञानी..

मेरी जात है हिन्दुस्तानी,
मैं तो हूँ इसका अभिमानी...

Read more...

कानपुर के अभिषेक को समर्पित एक गीत

>> Thursday, May 27, 2010


आज एक समाचार पढ़ा कि जूता पालिश करने वाले पिता के मेहनतकश बेटे ने लालटेन की रौशनी में पढ़ाई करके 'आईआईटी'की परीक्षा पास की.पिछले दिनों एक और खबर आई थी, कि एक मजदूर का लड़का कलेक्टर बन गया.समय-समय पर इस तरह की प्रेरक खबरे उन बच्चों का हौसला बढ़ाती है जो तनिक-सी परेशानियों से घबरा जाते है. आज बहुत से संपन्न परिवार के लड़कों को तमाम तरह की सुविधाएँ चाहिए, तब तो उनका पढ़ने का मूड बनाता है. दूसरी तरफ ये बच्चे है, जो अपना इतिहास खुद लिखते है. अँधेरे के खिलाफ लड़ने वाले इन युवको को केवल नमन किया जा सकता है. ये ही सच्चे नायक हैं. भारत जैसे विकासशील देश में जब कोई अभावग्रस्त युवक सफल हो कर चमकता है तो संतोष होता है,कि अभी भी संभावना जिंदा है. वरना जैसा माहौल है, उसे देख कर तो लगता है कि सारा उजाला एक वर्ग विशेष के हिस्से में ही चला जा रहा है. लेकिन कानपुर के अभिषेक की मेहनत ने साबित कर दिया है, कि अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है..हम भी औरों की तरह अपना चेहरा चमका सकते है. बस, इसी खबर ने आज मन में हलचल पैदा कर दी और यह गीत बन गया, देखें.... 

गीत.....
   
अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है, 
भले मौसम हो कैसा भी, कली यह खिल ही जाती है.

कहाँ तकदीर लिखती है, उजाला सबके हिस्से में,
कहाँ खुशियाँ नज़र आती हैं, अक्सर अपने किस्से में.
मगर मेहनत कड़ी कर लें, खुशी तब मुस्कराती है.
अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है...

कहा था ईश ने हमको, करो संघर्ष जीवन में,
तभी मै दे सकूंगा ओ मनुज, उत्कर्ष जीवन में.
इसी के वास्ते संघर्ष, अपनी आज थाती है..
अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है..

अँधेरे से लड़े हैं हम, उजाला तब मिला हमको,
चले आओ कि हम भी बाँट दें, उजियार कुछ तुमको.
जो हैं श्रम के पुजारी, रौशनी उनको सुहाती है...
अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है...

नहीं मिलता यहाँ कुछ भी, सरलता से कभी साथी,
अगर हम चाहते हैं रोशनी, जल जाये बस बाती.
सफलता साधको के द्वार पर झाड़ू लगाती है.

अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है,
भले मौसम हो कैसा भी, कली यह खिल ही जाती है.

Read more...

अगर बचाना है भारत को, गऊ को आज बचाएं हम

>> Friday, May 14, 2010


एक लेखक के नाते सामाजिक सरोकारों से जुडा रहता हूँ. सामाजिक मोर्चे पर लेखक को एक नागरिक की तरह तैनात रहना चाहिए लेकिन कुछ लोग केवल लेखन तक सीमित रहते है. मै विनम्रतापूर्वक आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ. वैसे घोर नास्तिक हूँ, फिर भी गौ-सेवा के लिए खुलकर सामने आ जाता हूँ. मै हिंदूवादी भी नहीं हूँ, लेकिन गाय के सवाल पर अगर कोई मुझे हिंदूवादी या दकियानूस भी समझे तो मुझे फर्क नहीं पडेगा. गाय हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है. ऐसा कौन अभागा होगा जिसने गाय का ढूढ़ न पीया हो? हम तो अपनी माँ दूध दो साल तक पीते है, लेकिन गो-माता का दूध मरते दम तक पीते हैं. खैर....जो लोग माँस या गो-मांस खाने के शौकीन है, उनको यह जानकर दुःख होगा, कि मैंने गाय की दुर्दशा पर एक उपन्यास पूर्ण कर लिया है. उसका नाम है-''देवनार के दानव'' लगभग दो सौ पृष्ठों के अपने इस चौथे उपन्यास में मैने भारत में बढ़ते जा रहे कसाईखाने, गौ शालाओं की दुर्दशा पर फोकस किया है. मैंने यह भी बताया है कि मुस्लिम शासनकाल में लगभग सभी शासकों ने गो-ह्त्या पर रोक लगा दी थी. कुरआन में भी गोवंश की हिंसा पर रोक है. आज भी देश के अनेक मुस्लिम भाई गो-रक्षण के काम में लगे हुए है. उपन्यास पता नहीं कब आएगा, कभी उपन्यास अंश भी दिया जा सकता है लेकिन वह बहुत बड़ा हो जाएगा. मुझे लगता है ब्लॉग में छोटी-छोटी चीज़े ही आनी चाहिए. पाठको पर अत्याचार न हो. इसीलिए शायद अंश भी न दू. हाँ, उपन्यास को आनलाईन पढ़ने के लिए ज़रूर उपलब्ध कराऊंगा. खैर, ये तो बाद की बात है. आज गाय पर एक गीत सूझ गया तो उसे दे रहा हूँ.

गीत

अगर बचाना है भारत को, गऊ को आज बचाएं हम,
गो-वंश की रक्षा कर के, निज कर्तव्य निभाएं हम..

कितनी हिंसा प्यारी हमको, इसका ही कुछ भान नहीं,
आदिमयुग से निकले हैं हम, क्या इसका भी ज्ञान नहीं?
सभ्य अगर हम कहलाते हैं, कुछ सबूत दिखलाएं हम.
अगर बचाना है भारत को गऊ को आज बचाएं हम...

एक जीव है इस दुनिया में, जो पवित्र कहलाता है,
'पंचगव्य' हर गौ माता का, हमको स्वस्थ बनाता है.
दूध-मलाई, मिष्ठानों का, कुछ तो मूल्य चुकाएँ हम.
अगर बचाना है भारत को गऊ को आज बचाएं हम...

जिस तन में सब देव विराजें, उस गायों को करें नमन,
भूले से वो कट ना पाए, मिलजुल कर हम करें जतन.
वक्त पड़े तो माँ के हित में, अपनी जान लुटाएं हम.
अगर बचाना है भारत को गऊ को आज बचाएं हम...

एक गाय भी अगर पले तो, हमको करती है खुशहाल,
गो-धन बढ़े निरंतर हम सब, होते जाते मालामाल.
गाय हमारी पूँजी इसको, कभी नहीं बिसराएँ हम.
अगर बचाना है भारत को गऊ को आज बचाएं हम...

माँस हमारा प्रिय भोजन क्यों, ऐसी क्या लाचारी है,
सोचे ठन्डे दिल से भाई, घर-घर हिंसा जारी है.
करुणा, प्यार-मोहब्बत वाला अपना देश बनाएँ हम.
अगर बचाना है भारत को गऊ को आज बचाएं हम...

उठो-उठो सब भारतवासी, सुनो गाय की करुण-पुकार,
कटता है गो-वंश कहीं तो बढ़ कर रोकें अत्याचार.
स्वाद और धनलोभी-जन को, गो-महिमा बतलाएं हम.
अगर बचाना है भारत को, गऊ को आज बचाएं हम...

भटक रही भूखी माँ दर-दर, पालीथिन, कचरा खाए,
कैसे हैं गो सेवक उनको, लज्जा तनिक नहीं आए.
मुक्ति मिलेगी, इन गायों को पहले मुक्ति दिलाएँ हम.
अगर बचाना है भारत को, गऊ को आज बचाएं हम...

गैया, गंगा, धरती मैया, सब पर संकट भारी है,
हम ही अपने माँ के शोषक, बुद्धि की बलिहारी है.
माँ बिन कैसे हम जीएंगे, पुत्रों को समझाएँ हम...

अगर बचाना है भारत को गऊ को आज बचाएं हम,
गो वंश की रक्षा कर के, निज कर्तव्य निभाएं हम..

Read more...

जननायक स्वर्गीय रामकुमार अग्रवाल जी को समर्पित

>> Sunday, April 4, 2010


रामकुमार अग्रवाल जी को बहुत से लोग शायद न जानते हो. श्री अग्रवाल रायगढ़ में रहते थे.पिछले दिनो उनका निधन हो गया वे.८३ वर्ष के थे. यह तो उनका सामान्य परिचय है. असली परिचय यह है कि समाजवादी सोच से संपृक्त जननायक श्री अग्रवाल रायगढ़ की अस्मिता के प्रतीक थे. सही मायने में जननायक थे. रायगढ़ सेठों की नगरी है.श्री अग्रवाल उस नगरी में रहते हुए भी कभी धन कमाने के फेर में नहीं पड़े. वे जनसेवा को समर्पित रहे अंतकाल तक. वे रायगढ़ से विधायक भी रहे. लेकिन सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बाद वे जनसमस्याओं को सुलझाने के लिए संघर्ष करते रहे.वयोवृद्ध होने के बावजूद जब कभी रायगढ़ के विकास को आहत पहुंचाने का कोई मसला सामने आया, या फिर रायगढ़ को प्रदूषित करने वाले कारखानों का सवाल आया, श्री अग्रवाल सबसे पहले सामने आये और विरोध करके बता दिया कि इस बूढ़ी काया में अभी भी दम बाकी है. श्री अग्रवाल जीवन भर लड़ाई लड़ते रहे.बिना उनके रायगढ़ में कोई भी बड़ा आन्दोलन सफल नहीं हो सका. उनके जाने के बाद अब रायगढ़ का क्या होगा, भगवान् ही जाने. क्योंकि फिलहाल ऐसा कोई नेता नज़र नहीं आता, जो श्री अग्रवाल की भरपाई कर सके. बहरहाल, श्री अग्रवाल के जाने के बाद मन में एक गीत उमड़ा. गीत में उनके अवदानो की चर्चा है. सुधी पाठक समझ सकेंगे कि आखिर कैसे थे जननायक रामकुमार जी अग्रवाल.
गीत
अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल,
अमर रहा है, अमर रहेगा, रायगढ़ का लाल।।

जहाँ कहीं अन्याय दिखा तो, किया सदा प्रतिकार,
लोकतंत्र की इक ताकत थे, सचमुच रामकुमार।
सत्ता पर टूटा करते थे, बनकर के वह काल ।
अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल।।

थे जवान तब अंगरेजों से लडऩी पड़ी लड़ाई,
आजादी के बाद यहाँ अपनों की बारी आई।
शोषण-अत्याचार जहाँ था, वहाँ गए हर हाल।।
अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल।।

स्वस्थ और सुंदर हो अंचल, शोषण का हो अंत,
यही लक्ष्य लेकर निकले थे सर्वोदय के संत।
किया आपने ऊँचा हरदम सबका ऊँचा भाल।।
अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल।।

नहीं रहे वो वीर-पुत्र पर याद हमेशा आएगी,
घोर तिमिर में संघर्षों की अकसर जोत जलाएगी।
रामकुमार इक नाम नहीं है, वो है एक मिसाल।
अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल।।

उठो, उठो धनवालों सीखो क्या होता बलिदान,
माटी का ऋण चुकता करना सबका फर्ज महान।
यही सिखाया जननायक ने, सचमुच थे 'अग्र'वाल।
अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल।।

उनके जैसा हुआ न दूजा, और न अब आएगा।
उनके अद्भुत क्रांति-कर्म को हर कोई गाएगा।
जन्मजात ही क्रांतिवीर थे, करते रहे कमाल।


अन्धकार में जले हमेशा, बन कर एक मशाल,
अमर रहा है, अमर रहेगा, रायगढ़ का लाल।।

Read more...

कहने को आज़ाद हो गए किन्तु..

>> Saturday, April 3, 2010

पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने हिम्मत का काम किया और पूरे देश को विचार के लिए एक रास्ता भी दिखा दिया. उन्होंने भोपाल के एक दीक्षांत समारोह के दौरान अपना गाउन को उतार फेंका और दो टूक कहा कि ''यह औपनिवेशवाद का प्रतीक है. हमें इससे मुक्त होने की ज़रुरत है''. लेकिन मंत्रीजी, सिर्फ इसी चोंगे से ही मुक्त होने की ज़रुरत नहीं है, और भी चीज़ें है,जिसकी ओर आपको और देश को देखना है. 'नाटक-नौटंकी' से बात बनाती नहीं, हाँ, चर्चा ज़रूर हो जाती है. अभी भाषा के मसले में हमलोग गुलामी के चरम शिखर पर है. पुलिस के मामले में देखें तो यह अब तक अंगरेजों की बाप है. और हर तरह के अफसर...? कलंक है, धब्बे हैं, लोकतंत्र के माथे पर. रही बात जनप्रतिनिधियों की, तो इनमे फिरंगियों की आत्मा ही समा गयी है. इन सबने मिल कर लोकतंत्र को लूटतंत्र में तब्दील कर दिया गया है, ऐसे भयावह दौर में अगर एक मंत्री दीक्षांत समारोह का अपना काला लबादा उतारता है, तो इसका मतलब साफ़ है, कि उसके मन में परिवर्तन की ललक है. लेकिन यह ललक हर मोर्चे पर दिखनी चाहिए.तभी सच्चे लोकतंत्र का आगाज़ होगा. अभी जो लोकतंत्र है, वह लोकतंत्र का आभास-सा कराता है.सच्चा लोकतंत्र तो उस दिन आएगा, जब शरीफ लोग पुलिस के भय से मुक्त होंगे और गुंडे भयभीत रहेंगे. अभी उल्टा हो रहा है. गुंडे ऐश कर रहे है और शरीफों को जेल मिल जाती है.हक माँगने वाले लाठियां खाते है या गोलियां. इसलिए जयराम रमेश के बहाने हम लोग एक बार फिर सोचे, कि हम कहाँ खड़े है. इसी भाव-भूमि पर पेश है एक गीत...
 
कहने को आज़ाद हो गए किन्तु गुलामी जारी है
अपनी ही सरकार है लेकिन निर्मम-अत्याचारी है.

अभिव्यक्ति पर सौ-सौ पहरे, सच कहना दुश्वार हुआ.
जिसने भी प्रतिवाद किया है, उस पर अत्याचार हुआ.
लाठी, गोली, धाराएं सब, इक-इक बंधन भारी है...
कहने को आज़ाद हो गए किन्तु गुलामी जारी है..

चले गए अंगरेज़ मगर हम अंगरेजी के दास बने.
हो गए है आज़ाद मगर हम क्यों काले इतिहास बने.
मुक्त नहीं हो पाए कैसी ये अजीब बीमारी है.
कहने को आज़ाद हो गए किन्तु गुलामी जारी है.

मंत्री-संत्री पाखंडी सब, लूट-पाट करवाते हैं,
पुलिस यहाँ हड़काती रहती, अफसर मौज मनाते है.
जनता के हिस्से में केवल आँसू-नदिया खारी है.
कहने को आज़ाद हो गए किन्तु गुलामी जारी है.

जो प्रतीक हैं अंगरेजों के, उनको आज उतारें हम,
लोकतंत्र का सुन्दर चेहरा, मिलकर चलो संवारें हम.
सच्ची आजादी की खातिर, व्याकुल हर नर-नारी है.
अपनी ही सरकार है लेकिन निर्मम-अत्याचारी है.

कहने को आज़ाद हो गए किन्तु गुलामी जारी है
अपनी ही सरकार है लेकिन निर्मम-अत्याचारी है..

Read more...

चार दिनों का है यह जीवन.....

>> Thursday, March 18, 2010

इधर मैंने भी इक्का-दुक्का  ऐसे ब्लॉग देखे, जहाँ खुले आम ज़हर फैलाया जा रहा है. जब मै ब्लॉग की दुनिया में आया था, तो लगा था, कि कोई बड़ा तीर मार रहा हूँ, लेकिन इतने महीने बाद यह देख रहा हूँ, कि यहाँ भी जाति -धर्म  की टुच्चई  चल रही है.धर्म-जातियों के आधार पर  भी ब्लॉग बन गए. वैसे ये लोग नहीं के बराबर है, लेकिन एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है. एक प्रदूषित हवा पर्यावरण को विकृत कर देती है. एक परमाणु बम मानवता का विनाश कर देता है. एक घटिया सोच, एक हलकी-कुंठित टिपपणी सद्भावना का खात्मा कर देती है. लेकिन हम लोग बेबस है. देखते रह जाते है. फिर भी पागल-सनकी लोगों के विरुद्ध लिखा जाना चाहिये. हो सकता है ये सुधारने की प्रक्रिया से गजरे. ये नहीं तो इनके बच्चे सुधर जाये. इस दिशा में निरंतर कदम बढाने की ज़रुरत है. सद्भावना का पुल बने. इस पुल बनाने में एक गिलहरी जैसा योगदान मेरा भी रहता ही है. इसी कड़ी में आज फिर 

गीत
 ------
चार दिनों का है यह जीवन क्यों  नफ़रत में काट रहे.
मानव को मानव रहने दो धर्मो में हम बाँट रहे .

धरती पर आये हम केवल बन कर के इनसान,
लेकिन हमें लड़ा देते है कुछ शातिर हैवान.
धर्म नहीं इनका  धंधा है, लेकिन यह भी गन्दा है. 
इनके कारण प्यार-मोहबत को लग जाता फंदा है.
जीवन ऐसा प्यारा हो कि सदा प्यार की  ठाठ रहे.
मानव को मानव रहने दो क्यों धर्मो में बाँट रहे?

बहुत हो गया अब धर्मो की आड़ यहाँ पर बंद हो,
केवल मानव धर्म चले बस, इसकी यहाँ सुगंध हो. 
मेरा धर्म है सबसे अच्छा, यह भी कोई बात है,
दूजे की निंदा करना तो केवल आतमघात है.
यही बड़े हत्यारे हरदम  इनके नकली पाठ रहे.
मानव को मानव रहने दो क्यों धर्मो में बाँट रहे?

धर्म, जात, भाषा के झगड़े करते पागल लोग,
इनका हो उपचार यहाँ पर इन्हें लगा है रोग.
जो सच्चा इनसान रहेगा, सबकी बाते मानेगा. 
अपने जैसा ही दुनिया को वह भी अपना जानेगा. 
पागल, बहशी, अनपढ़ सारे, ज्यों मखमल में टाट रहे.
चार दिनों का है यह जीवन क्यों  नफ़रत में काट रहे.
मानव को मानव रहने दो धर्मो में हम बाँट रहे .

Read more...

बुरा न मानो होली है

>> Wednesday, February 24, 2010

होली तो अब आ ही रही है. पिछले दिनों मैंने कुछ फागुनी दोहे लिखे थे, आज एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ. ''बुरा न मानो होली है''. होलिका में बुराइयों को डाल दिया जाता है. इस गीत में मैंने भी समाज के विभिन्न वर्ग में सक्रिय बुरी प्रवृत्तियों को याद किया है. इसी विश्वास के साथ कि इस होली में इन लोगो की सारी बुराइयां नष्ट हो जायेंगी. तभी एक खुशहाल समाज स्थापित हो पायेगा. पता नहीं ऐसा कभी होगा कि नहीं. मैंने तो व्यंग्य-गीत लिख ही दिया है. अब यह जहाँ तक भी पहुंचे...
(और हाँ, रचनाओं को सुधीपाठको की सराहना मिल रही है, इससे उत्साह बढ़ा है. सबका आभार...)
व्यंग्य-गीत 

बुरा न मानो होली है...... 

कपडे में है नेता लेकिन, हरकत से वह नंगा है,
इसके कारण शहर-गाँव में अकसर होता दंगा है.
इसने नफ़रत फैलाने की, बड़ी 'शॉप' इक खोली है.
बुरा न मानो होली है......

वर्दी में ये कौन खड़ा है, लगता कोई गुंडा है,
मुफ्तखोर कहते हैं इसको, खा-पी कर मुस्टंडा है.
रात में दारू पीता है यह, सुबह भंग की गोली है.
बुरा न मानो होली है......

ये लेखक है, अफसर भी है, अंत-शंट कुछ लिखता है,
छप जाती है पुस्तक-फुस्तक, माल धडाधड बिकता है.
शातिर है भीतर से लेकिन, चिकनी-चुपड़ी बोली है.
बुरा न मानो होली है......

हीरोइन है सुन्दर लेकिन, रोज़ सितम यह ढाती है,
खुला-खुला जीवन है इसका, ये मॉडर्न कहाती है.
कपड़ा खोज रहो हो तन पर? गायब इसकी चोली है.
बुरा न मानो होली है......

जेबें काटी हैं गरीब की, महल-दुमहला तान लिया,
दान-पुन्न थोड़ा-सा कर के, बहुत अधिक सम्मान लिया.
सेठों की खातिर नैतिकता, केवल हंसी-ठिठोली है.
बुरा न मानो होली है......

ये साधू-संन्यासी है, प्रवचन देने में माहिर है,
कितना इसने माल बंटोरा, अब तो ये जग-जाहिर है.
मन ही मन हंसता है पट्ठा, जनता कित्ती भोली है.
बुरा न मानो होली है......

फटे हुए परिधान यहाँ पर, अब फैशन कहलाते हैं,
जिसके तन पर कपडे कम हैं, वही सभ्य बन जाते हैं.
कंडोमी-कल्चर में घर से, केवल आँख-मिचौली है.
बुरा न मानो होली है......

रिश्ते सारे नष्ट हो गए, खून-खून से दूर हुआ,
बस पैसा ईमान बन गया, उफ़ ये तो नासूर हुआ.
बेईमानी हंसती है ससुरी, स्वारथ की मुंहबोली है.
बुरा न मानो होली है......

पद्मश्री कौवे ने पायी, कोयल रोती है चुपचाप,
कैसा है यह दौर यहाँ पर, खलनायक रहता है टॉप.
दुर्जन मालामाल सु-जन की, फटी हुई अब झोली है.
बुरा न मानो होली है......

बहुत हो गया काला-काला, अब सफ़ेद की बारी है,
रंग सुनहरा केवल चमके, इच्छा यही हमारी है.
झूठों का मुंह काला हो, सच्चे को अक्षत-रोली है.
बुरा न मानो होली है......

Read more...

. लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है...

>> Sunday, January 24, 2010


पिछले दिनों दिल्ली प्रवास पर था. चाह कर भी अपने ब्लॉग पर कोई कविता पोस्ट नहीं कर पाया. उत्तरप्रदेश में पिछले दिनों प्रशासन में बठे अधिकारसंपन्न निर्लज्ज अधिकारियों  ने जो कुछ किया, उस पर पूरे देश में ठंडी-सी प्रतिक्रियाएँ  हुई. है.देश में व्यापक प्रतिक्रया  नहीं हुई. जबकि होनी चाहिए थी. कश्न्मीर से कन्याकुमारी तक एक देश है.एक संवेदना है. एक दर्द है. लेकिन अफसोस..बात आयी-गयी हो गयी? शर्म आती है यह दृश्य देखकर. डीआईजी औरत पर डंडे चलाता है, कलेक्टर अदने-से कर्मचारियों पर थप्पड़ बरसाता है.यह है लोकतंत्र? क्या यही है लोकतंत्र..? अगर अपने देश में लोकतंत्र है, तो कायदे से दोनों अफसरों को निलंबित कर दिया जाना चाहिए. नहीं-नहीं..... इनको बर्खास्त करना चाहिए. अरे, कहीं तो हम यह साबित करें, इस देश में जनता का राज है, अफसरों का नहीं. जनता की सरकार है यहाँ. अंगरेजों का ज़माना नहीं है, कि किसी के भी साथ बदसलूकी हो रही है.कलेक्टर लखनऊ की अकड तो देखो...कह रहा था-''मेरे जैसे आदमी को गुस्सा दिलाता है...मुंह में जुबां नहीं है...?'' 'मेरे जैसे आदमी' का क्या मतलब..? तुम कितने बड़े तोपचंद हो..? और तुमको बनाया किसने..? जनतंत्र ने. ही न .? इस लायक किसने बनाया कि तुम कलेक्टर बन सको..? इस समाज ने. मिस्टर कलेक्टर... उस आदमी के पास ज़बान भी है. जब वह बोलता तो तुम परेशानी में पड़ जाते. तुमने उस ग़रीब को जेल भिजवा दिया. टीवी पर छाये रहे. तुमको लग रहा है, तुम हीरो बन गए, लेकिन पूरा देश तुमको जीरो समझ रहा है. दुःख इस बात का है, कि अब जो लोकतंत्र हम देख रहे है, वह बनावटी है, छल से भरा हुआ है. वरना क्या मजाल थी कि जनता पर मतलब लाठी बरसाने वाला अफसर कुर्सी  पर बना रहता. लेकिन जिस देश में राजनीति और प्रशासन मिल कर जनता का दमन करने पर तुले हों, उस देश में ऐसा ही होगा. और अगर देश के लोग नहीं जगे तो उन्हें सज़ा भोगने के लिए, इस तरह पीटने के लिए ही तैयार रहना चाहिए. अगर हमारे देश में वैचारिक नपुंसकता इसी तरह बनी रही तो हो सकता है, कि हम भविष्य में भी इसी तरह का नकली लोकतंत्र झेलने के लिए अभिशप्त रहेंगे. मै इसे लोकतंत्र ही नहीं मानता. लोकतंत्र तो तब है, जब लखनऊ के सरकारी कर्मचारी को थप्पड़ मारने वाले कलेक्टर पर भी  धारा लगे, वह गिरफ्तार हो. हम लोकतंत्र में एक उदाहरण तो पैदा करे..दिखाए देश को, कि ये है लोकतंत्र...देखो,  कलेक्टर को, डीआइजी को हाथ उठाने और डंडे चलाने वाले को भी हम दण्डित करते है. इन विवेकहीन लोगों को अधिकार किसने दे दिया.? ये लोग अभी तक अपने-अपने पदों पर बैठे क्यों है, मेरे लिए तो अचरज इसी बात का है, कि पूरे देश के सरकारी कर्मचारी चुप क्यों है? वे आंदोलित क्यों नहीं है.? क्या इस भीषण ठण्ड में हमारे लोकतंत्र को पाला मार गया है..? शर्मशार हूँ मै. कब इस देश के लोग अपनी ताकत पहचानेंगे, और निरीह लोगो पर वर्दी  का आतंक फैला कर राज करते रहेंगे.? कब तक ..? बहरहाल, यह कवि-मन सिवाय अपनी पीड़ा को अभिव्यक्क्त करने के, और क्या कर सकता है.?बहुत कुछ और लिख सकता हूँ मै, लेकिन लिख कर फायदा क्या..? कौन सुनेगा मेरी पीड़ा..? क्या कोई परिवर्तन होगा.? नई. फिर भी कई बार मै लिखता हूँ, यही सोच कर कि कल लोकतंत्र सचमुच का लोकतंत्र बन जाएगा. अत्याचारी अफसर सरेआम दण्डित होंगे. बहरहाल, अपनी पीड़ा को, गुस्से को एक गीत की शक्ल में ढाल कर पेश कर रहा हूँ. आम आदमी पढ़े न पढ़े, कुछ लेखक या चिट्ठाकार तो पढ़ेंगे ही. खैर, पढ़ें न पढ़े, मुझे तो लिखना ही है.

लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

वर्दी में शैतान छिपे है, कुर्सी पर मक्कार बहुत.
जनता को ये रौंद रहे है, देखो बारमबार बहुत.
कहीं पे डंडा चलता है तो कही पे थप्पड़ भारी.
लोकतंत्र की छाती पर अब ये कुर्सी हत्यारी.
नीच हो गयी नीक व्यवस्था, घायल श्वेत परिंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

खुले आम अब लोग पिट रहे, कैसा है जनतंत्र
जनता ही मारी जाती है, रोज़ नया षड्यंत्र .
अफसर जालिम बन बैठे है, अंगरेजी संतानें.
इनको हम ही पाल रहे , कोई माने या ना माने.
जनता का हर इन्कलाब भी इनको लगता निंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

उठो-उठो मुर्दे मत बनना, अब थोड़ा चिल्लाओ तुम.
जहाँ पराजित लोकतंत्र हो, बिलकुल शोर मचाओ तुम.
देश में अफसर नही देश की जनता का ही शासन है.
हाय अभी तक यहाँ हंस रहा, दुर्योधन-दुशासन है.
लोकतंत्र का हर हत्यारा, अफसर नहीं दरिंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है...


Read more...

अरे-अरे.ये मेरा शतक..? सधन्यवाद...

>> Wednesday, December 23, 2009

अरे-अरे...? देखते ही देखते मैंने शतक मार लिया...? यह मेरी सौवीं पोस्टिंग है. वैसे इन पांच महीनों में मैंने लगभग दो सौ  से ज्यादा रचनाये प्रस्तुत की है, लेकिन एक पोस्ट में तीन रचनाए हो या एक, पोस्ट एक ही मानी जाती है. इस लिहाज से यह मेरी सौवीं पोस्टिंग या सन्देश है. 6 अगस्त. जी हाँ,  इसी दिन मैंने  ब्लॉग की  दुनिया में पहला कदम रखा था, जैसे कोई प्यार की  दुनिया में रखता है. डरते-डरते, कि पता नहीं अल्ला जाने क्या होगा आगे, मौलजाने क्या होगा आगे? लेकिन-
जो हुआ अच्छा हुआ
हर तरफ चर्चा हुआ. 
हर कोई आया इधर 
स्वागतम  कहता हुआ  

रचनात्मकता मेरा पहला प्यार है. मेरे शुभचिंतक तो लगातार बोलते रहे, लेकिन मै  लापरवाह ही बना रहा. किन्तु जब घर पर नेट लगा तो मन नहीं माना .बना ही लिया ब्लॉग. बेटे साहित्य ने फ़ौरन  सहयोग कर दिया. अरे...पल भर के काम के लिए लंबा समय लगा दिया था मैंने. पहले सोचता था कि ब्लॉग बनाना बड़ा कठिन काम है,लेकिन बाद में समझ आया कि ऐसा कुछ नहीं है. बहुत से टेम्पलेट तो यहाँ पहले से ही रखे हुए है, कुछ और बेहतर करना हो तो तकनीकी सहयोग वाले भी मिल जाते है. ब्लॉग बनने तक तब तक मुझे तकनीकी ज्ञान बिलकुल ही नहीं था.  (सच कहूं तो आज भी नहीं है) लेकिन कहा गया है न, कि ''करत-करत अभ्यास के जड़मती होत सुजान''. हम भी सुजान बनने की कोशिश करते रहे. (वैसे सच तो यही है, कि अब तक नहीं बन पाए है) लेकिन काम चलाने लायक थोड़ी-सी जानकारी मिल गयी है. अंतरजाल की दुनिया में एक से एक महारथी नज़र आते है. उनको देखता हूँ तो अच्छा लगता  है कि इन्होने तकनीकी ज्ञान अर्जित किया. मै तो अब तक साहित्य की दुनिया में ही रमा रहा. लेकिन पश्चाताप  होता है कि दो साल पहले से ही क्यों न सक्रिय हुआ. खैर, जब जागे, तभी सवेरा. आज मेरे कितने चाहने वाले है. देश में, विदेश में. कितने लोगों से  मेरा जीवंत रिश्ता बन गया है. ब्लाग के बहाने विश्व - ग्राम की अवधारणा साकार रूप ले रही है. जिनसे मेरा कभी परिचय नहीं हुआ, जिनको हमने कभी देखा नहीं था, जिनको हम पहले जानते ही नहीं थे, वे सारे अच्छे लोग मुझसे जुड़ रहे हैं, और मै उन लोगों से जुड़ रहा हूँ. यह बड़ी सुखद बात है. मेरे लिए सन २००९ की उपलब्धि यही है. यह ठीक है,कि सही चीजों पर कई बार गलत लोग भी काबिज़ हो जाते है, लेकिन अच्छे लोगो की बहुलता ही मूल्यों को बरक़रार रखती  है.ब्लॉग की  दुनिया में भी मैंने अच्छे विचारो से परिपक्व लोग देखे है. माफिया किस्म के लोग  भी होंगे लेकिन मै गिलास को आधा भरा देखने का आदी हूँ. इस दृष्टि से मुझे संतोष है, कि मैंने ब्लाग की दुनिया में कदम्र रख  कर गलती नहीं की. मेरा स्वागत ही हुआ है. मेरा रचानात्मक परिवार बढ़ा है. अभी यह संख्या बहुत ही कम है, लेकिन चिंता की बात नहीं, अभी तो पांच महीने भी नहीं हुए है. इतनी जल्दी भी क्या है. अभी तो ये अंगडाई है...आगे और चढ़ाई है.. मुझे सहयोग करने वाले कुछ नाम मुझे याद आ रहे  है . सबसे पहले मेरी बाल कविताओ का ब्लॉग जयप्रकाश मानस ने बनाया. मानस के कारण अंतरजाल की दुनिया में कई जगह मेरी उपस्थिति दर्ज होती चली गयी. मानस तो ३-४ साल से ही पीछे पड़े थे कि  आप भी अपना ब्लॉग बना लें.  बेहद सक्रिय  अनुजवत ब्लागर ललित शर्मा  ने तो घर पहुँच सेवा दी. बहुत -सी बाते बताईं, समझाई. ये है सदाशयता. ''आरम्भ ''वाले संजीव तिवारी ने भी सहयोग का वचन दिया. ''साहित्य वैभव'' के संपादक डा. सुधीर शर्मा  और ''यायावर'' ब्लॉग वाले  रमेश शर्मा उन लोगों में है, जिसने कहा- अब आपका ब्लॉग बन ही जाना चाहिए. और आखिर बन ही गया. वैसे मेरी  सक्रियता का सुफल भी मिला. परिकल्पना वाले भाई रविन्द्र प्रभात की मुझ पर नज़र पड़ी और उन्होंने मुझे दशावतार में शामिल कर  दिया. यह उनका बड़प्पन है. शहरोज़ ने मेरे ब्लॉग को देखा तो मेरी कविताओ को अपने ब्लॉग में ससम्मान जगह दी. ''अभिव्यक्ति '' की पूर्णिमा बर्मन और ''लेखनी''वाली शैल अग्रवाल का भी स्नेह मिला.  बहरहाल अपनी सौवीं पोस्ट से अभिभूत हूँ, शतक मारने की खुशी है.  पता नहीं कब तक चलेगा यह सिलसिला. बहरहाल मैं  अपनी ही एक ग़ज़ल के कुछ शेर फिर पेश करना चाहता हूँ, जो मैंने इसी मौके के लिए ही कहे और अक्सर कहता रहता हूँ, कुछ मित्र भी इन पंक्तियों का उल्लेख करते रहते है.  देखें-- 
आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं 
हारने का अर्थ यह भी जानिए
जीत की संभावनाएं  साथ हैं 
इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम
रौशनी की कुछ कथाएँ साथ हैं 

Read more...

सुनिए गिरीश पंकज को

  © Free Blogger Templates Skyblue by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP