''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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इक किसान मर गया

>> Thursday, April 23, 2015


दिल्ली में आके कल मेरा भगवान मर गया
हाँ, ठीक ही समझा है इक किसान मर गया

सब लोग तमाशा खड़े बस देखते रहे ?
सबकी नज़र के सामने इंसान मर गया

मरते हुए इंसान की तस्वीर उतारी 
इस मीडिया का दोस्तो ईमान मर गया

जो है किसान वो हमारा अन्नदेव है 
क्योंकर हमारा ये महान ज्ञान मर गया

हर रोज मर रहे है इस देश में कृषक 
लगता है मुझे देश ये महान मर गया

गांव मर रहे, किसान-गाय भी मरे 
जो था मुझे प्यारा वो जहान मर गया

हम भूल गए हमको गाँवों ने बनाया 
कारन यही है 'पंकज' अहसान मर गया

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क्या से क्या होता जाता है मेरा हिंदुस्तान
जीने की सुविधाएं कम हैं मरना है आसान 

कहाँ गयी करुणा की बातें  कहाँ पुण्य औ दान 
अब तो मरते लोगों का ही दर्शक है इंसान

भाषण देने के आदी हैं अब सारे शैतान 
उनके सम्मुख मर जाता है 'धरती का भगवान'

अन्न उगने वाले मरते कैसा बना विधान
कर्जा लेकर डूब रहे हैं  'धरती के  दिनमान'

नायक यहाँ किनारे हो गए नालायक विद्वान 
लूटमार जिनके धंधे हैं वे है आज 'प्रधान'

कब तक मौन रहेगी जनता अब तो लें  पहचान 
कौन यहाँ पर खलनायक है कौन देश की शान  

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नई ग़ज़ल / मरते नहीं जो लोग वो किरदार था अदम ....

>> Sunday, December 18, 2011

ग़ज़ल की इक धार था, तलवार था अदम
साहित्य की दुनिया में अवतार था अदम

बाहर निकाला हुस्न की चर्चा से गज़ल को
कविता की सही राह या विचार था अदम

जैसा लिखा वैसा ही जिया था बड़ा कमाल
कविता के गले का वो इक हार था अदम

उसकी कमी पूरी कभी भी हो नहीं सकती
सबसे अलग, सबसे जुदा फनकार था अदम

इंसानियत कहते हैं किसे उसने बताया
कविता का नया बिलकुल औजार था अदम

जो ज़िंदगी सच था बेबाक कह दिया
जो दब न सका वो इक अखबार था अदम 

यादों में वो हमेशा ही महकेगा हमारे
मरते नहीं जो लोग वो किरदार था अदम

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नई ग़ज़ल / दर्द किसी को भी बतलाना ठीक नहीं....

>> Friday, December 16, 2011

हमने माना यार ज़माना ठीक नहीं
फिर भी ये सब झूठ-बहाना ठीक नहीं

जहाँ हमारे जाने से बेचैनी हो
वहाँ कभी भी आना-जाना ठीक नहीं

दिल देने से पहले सोच लिया होता
बाद में फिर बैठे पछताना ठीक नहीं

कुछ उसूल होते हैं यारो महफ़िल के
बिन बोले यूं छोड़ के जाना ठीक नहीं

लूटा और खसोटा अपने लोगों को
पाप है ऐसी दौलत पाना ठीक नहीं

सुनकर मन ही मन खुश होते लोग यहाँ
दर्द किसी को भी बतलाना ठीक नहीं

जितना भी कुछ पाया उसमें मगन रहो
रोज़-रोज़ का रोना-गाना ठीक नहीं

अपने तो हैं लेकिन काम नहीं आते
खाली-पीली नाम गिनाना ठीक नहीं

कहते हो तो करके भी दिखलाओ ना
बस यूं ही उपदेश पिलाना ठीक नहीं 

हम बंजारे ठहरे यायावर हैं हम
अपना कोई एक ठिकाना ठीक नहीं

अगर गिरा है कोई उसे उठा लेना
उस पर हँसना या मुसकाना ठीक नहीं

प्यार अगर है तो हमसे तुम बोलो ना
दिल में क्या है इसे छिपाना ठीक नहीं

पोल पोल होती है इक दिन खुलती है
अच्छाई का स्वांग रचाना ठीक नहीं

सबसे मिलना प्यार-मोहब्बत से पंकज
क्या अपना औ क्या बेगाना ठीक नहीं   

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नई ग़ज़ल / जो झुकता है बड़े अदब से सचमुच वो इनसान बड़ा है..

>> Tuesday, December 13, 2011

जिसे सीखने की है ख्वाहिश इक दिन वो परवान चढ़ा है
जो झुकता है बड़े अदब से सचमुच वो इनसान बड़ा है

जो बेमतलब तने रहेंगे इक दिन टूटेंगे आखिर

वही गिरा है बीच राह में बेतलब जो यहाँ अड़ा है

प्यार-मोहब्बत बाँटो सबको लेकिन ज़्यादा ज्ञान न दो

वही छलकता है कुछ ज्यादा खाली-खाली अगर घडा है


पत्थर था वो छेनी खा कर आज देवता बन बैठा
जो बचता है बेचारा वो धूल फाँकता दूर पडा है

कौन भला उसको रोकेगा उसकी जीत तो निश्चित है

दुनिया से पहले वो खुद से रोज़ाना ही खूब लड़ा है

अपनी झूठी शान में आ कर हमने देखा है पंकज

बरसों पहले जहाँ खडा था बंदा आखिर वहीं खडा है

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नई ग़ज़ल / जुबां खामोश रहती है इशारे बोल उठते हैं.....

>> Wednesday, August 31, 2011

जुबां खामोश रहती है इशारे बोल उठते हैं
हम अक्सर बस इसी के ही सहारे बोल उठते हैं

रखोगे कब तलक बंदिश में सच को पूछता हूँ मैं
हमारे होंठ तो ये बिन पुकारे बोल उठते हैं

हमें अपनों से क्या लेना कहाँ ये काम आते हैं
मगर जो गैर होते हैं वो प्यारे बोल उठते है

तुम्हारा हाल कैसा है तुम्हारा मूड क्या कहता
रहो तुम मौन लेकिन ये नज़ारे बोल उठते हैं

यहाँ वे लोग दण्डित हो रहे जो सत्य कहते हैं
जो दिखता है हकीकत में बेचारे बोल उठते हैं

भंवर में फंस न जाना तुम भले तैराक हो पंकज 
नदी खामोश रहती है किनारे बोल उठते हैं
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और चलते-चलते आज के हालात पर एक शेर
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बहुत खामोश रहते है यहाँ लाखों मगर सच है
समूचा देश जागे जब ''हजारे'' बोल उठते हैं

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नई ग़ज़ल/ जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है

>> Monday, August 8, 2011

जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है
जो हैं झूठे वहां खुशियों की चादर झिलमिलाती है

बड़ी तकलीफ होती है जहां झूठे ही बसते हैं
सच्चाई तो दुबक कर के वहां आंसू बहाती है

ये मेरे लोग ही मुझको पराये-से लगें अब तो
अगर सच बोलता हूँ तो जुबां ये लड़खड़ाती है

अगर इंसान है ऊंचा तो अपना दिल बड़ा कर ले
जहां बौने हों दिल से लोग वह बस्ती सताती है

मैं वैसा मुल्क चाहूंगा जहां सच पे न हों पहरे
अभी तो बंदिशों में आत्मा ही छटपटाती है

कोई तो आये बोले खुल के अपनी बात रख दे तू
यहाँ हर एक कुर्सी रंग सामंती दिखाती है

यहाँ भगवान भी पत्थर से बाहर आ नहीं पाता
उसी के सामने इज्ज़त कोई अपनी गंवाती है

ज़रा सोचो न इतराओ चलो इनसान बन जाओ
अरे यह चार दिन की ज़िंदगी कब लौट पाती है

न जाने कब सुगन्धित दौर आएगा यहाँ पंकज
अभी तो हर तरफ नाली यहाँ पर बजबजाती है

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नई ग़ज़ल / हर सिम्त खुल रहे हैं बदन देख रहे हैं

>> Sunday, July 31, 2011

मत पूछिए हम कितना पतन देख रहे हैं
हर सिम्त खुल रहे हैं बदन देख रहे हैं

ये कैसी नयी सभ्यता है कैसा नया दौर?
कम हो रहे लोगों के वसन देख रहे हैं

पहले हजारों लोग मरे देश के लिए
अब उनको खोजता है वतन देख रहे हैं

इंसान हूँ अन्याय को सहने की हद भी है
कब तक के कर सकेंगे सहन देख रहे हैं

अपने कहे से रोज मुकर जाए सियासत 
पल-पल में बदलते हैं कथन देख रहे हैं

रिश्ते न टूट जाएँ वो खुदगर्ज़ हैं बड़े
कोशिश में हमीं कर के जतन देख रहे हैं

विश्वास था माली इसे महकाएगा ज़रूर 
लेकिन यहाँ उजड़ा ये चमन देख रहे हैं

ये 'तंत्र' बड़े प्यार से सौंपा था हमीं ने
उन हाथों में अपने लिए 'गन' देख रहे हैं

हमने जिन्हें उठा के बिठाया था फलक पर
वे हमको दिखाते हैं ठसन देख रहे हैं

सूरज न जाने कब इधर आएगा क्या पता
फिलहाल रात है ये गहन देख रहे हैं

जिसके लिए हम जान लुटाएं, दगा करे
धोखाधड़ी है अब तो चलन देख रहे हैं

पापों का हाल ये है इधर पूछ न पंकज 
पापी ही रोज करते हवन देख रहे हैं

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नई ग़ज़ल / अपनी हिम्मत से मौसम बदल जाएगा

>> Tuesday, May 31, 2011

बहुत दिनों के बाद आना हुआ. हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह सुकून देने वाला भी हो कि बोर करने वाली रचनाओं से तो बच गए. लेकिन हम भी कम नहीं, लीजिये, फिर आ गए हैं, एक नई ग़ज़ल के साथ...

वक़्त जैसा भी है यह संभल जाएगा
अपनी हिम्मत से मौसम बदल जाएगा

वक़्त आया तो उसको पकड़ लीजिए
वरना मुट्ठी से अपनी फिसल जायेगा

मुद्दतों बाद आया है दिन प्यार का
देर की तो मुहूरत ये टल जायेगा

चलते चलते चलो रात बीतेगी ये
अपना सूरज वो प्यारा निकल जाएगा

नन्हा बच्चा खिलौने से कुछ कम नहीं
खेलते ही रहो दिल बहल जायेगा

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नई ग़ज़ल / आओ थोड़ा रूमानी हों ये मौसम भी कुछ कहता है

>> Sunday, April 17, 2011

अपने चेहरे पर रीझा है
जीने का यह ढंग अच्छा है

हरदम ऐठे-ऐठे रहना
वो इंसां जाने कैसा है

मुसकाना तो मुफ़्त मिला है
क्या इसमें लगता पैसा है

अपने से जो कर ले यारी
कभी नहीं रहता तन्हा है

दुःख में डूबा है वो लेकिन
दुनिया के आगे हँसता है

क्यों मानूं हैं लोग पराए
हर कोई अपना लगता है

प्यार कभी था इस दुनिया में
सचमुच यह सुन्दर किस्सा है

देख के दुनिया हँसता-रोता
हम हैं भ्रम में वो बच्चा है

आओ थोड़ा रूमानी हों
ये मौसम भी कुछ कहता है

मंज़िल उस तक चल कर आती
जो हरदम चलता रहता है

दुश्मन का भी दिल जीतेंगे
पंकज का अपना फंडा है

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नई ग़ज़ल / जो दगा देते हैं उनको प्यार क्यों करना

>> Wednesday, April 13, 2011

दस दिन बेहद परेशान रहा. सड़क खुदाई के कारण केबल कटा और नेट बंद. शिकायत की मगर सरकारी काम तो लखनवी अंदाज़ में ही होता है न. आराम के साथ हुआ. आज वह दिन आया और बेताबी के साथ अपने चाहने वालों के बीच फिर हाज़िर हूँ. मन की अभिव्यक्ति के इस मंच-ब्लॉग- के माध्यम से फिर एक ग़ज़ल पेश है- ('सुने न सुने कोई मेरी पुकार')

आँसुओं को व्यर्थ ही बेकार क्यों करना
जो दगा देते हैं उनको प्यार क्यों करना

दिल मेरा बिकता नहीं, ख्वाहिश नहीं कोई
खामखा इसको यहाँ बाज़ार क्यों करना

ज़िंदगी में जीत की संभावना है जब
हारने की बात को स्वीकार क्यों करना

पत्थरों के इस नगर में कौन सुनता है
दिल के अपने दर्द का इज़हार क्यों करना 

हम बुलाते ही रहे वे ही नहीं आए
इक यही है काम क्या हर बार क्यों करना 

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नई ग़ज़ल / छाँव देने फिर कोई आँचल नहीं आया

>> Monday, February 28, 2011

झेलता हूँ छल मगर यह छल नहीं आया
मैं भी इक शातिर बनूँ वह पल नहीं आया

कल हमारे दिन फिरेंगे बस यही सोचा
सोचता ही रह गया वह कल नहीं आया

प्यास जिसको भी लगी वो जल तलक पहुंचा
सच यही है प्यासे लब तक जल नहीं आया

सब्र करती ज़िंदगी की त्रासदी देखो 
सब्र का मिलता है मीठा फल..नहीं आया

खूब गरजे थे मगर वे फिर नहीं बरसे
लौट कर बस्ती में इक बादल नहीं आया

माँ तुम्हारे बिन अभी तक मैं झुलसता हूँ
छाँव देने फिर कोई आँचल नहीं आया

रोज़ वादे और नारे? यह सियासत है
नित समस्याएँ बढ़ीं पर हल नहीं आया

झूठ का 'पंकज' यहाँ सम्मान है कितना
सत्य की खातिर कोई पागल नहीं आया

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नई ग़ज़ल/ आज दिखता है जो बौना कल बड़ा हो जाएगा

>> Friday, February 18, 2011

चार दिन बाद दिल्ली से लौटा तो लगा, अपना ब्लॉगरूपी बाग़ सूना-सूना-सा है. कुछ नए विचार-सुमन फिर महकने चाहिए. और उसकी तैयारी विमान में ही हो गई थी. डेढ़ घंटे की उड़ान में क्या किया जाये.फ़िल्मी पत्रिका पढ़ने से बेहतर है कुछ सार्थक साहित्य पढ़ा जाये. बस, पढ़ने लगा गोपीचंद नारंग जी की नई पुस्तक उत्तरसंरचनावाद पर. उर्दू काव्यपरम्परा पर गंभीर पुस्तक है यह.इसे पढ़ते-पढ़ते अचानक दिमाग में हलचल-सी होने लगी और दिल ने कहा कुछ शेर बहार निकालने के लिए मचल रहे है, सो, हम शुरू हो गए. वही कुछ शेर आपकी सेवा में पेश है. देखे और स्नेह दें----

क्या खबर है ज़िंदगी में कल को क्या हो जायेगा
जिनसे है नफ़रत उन्हीं से प्यार-सा हो जायेगा

प्यार से मिलते रहो सबके यहाँ अपने शिखर
जो लगे छोटा वही कब काम का हो जाएगा

ये जो कुरसी है इसी ने गुल खिलाये हैं कई
आज दिखता है जो बौना कल बड़ा हो जाएगा

वह बहुत इतरा रहा है पद भी है पैसा भी है
बेखबर इस बात से वो कल फना हो जाएगा

पाप करने में मज़ा है हर कोई यह जानता
है किसे इसका पता सबको पता हो जाएगा

क्या करेंगे रख के इतना धन ज़रा मन खोलिए
आपकी दरियादिली से कुछ भला हो जाएगा

कौन-सा है रंज दिल में, गाँठ कैसी है बंधी
मुसकरा दे ज़िंदगी का हक़ अदा हो जाएगा

देखकर के ओहदे को क्यों झुके जाते हैं सब 
कल हटेगा तयशुदा है गुमशुदा हो जायेगा   

एक जो चेहरा है बाहर वो भी गर भीतर रहे
आदमी पल भर में पंकज देवता हो जाएगा

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नई ग़ज़ल / कायरों को ही मज़ा आता है छिप कर वार में

>> Sunday, February 6, 2011

मित्रो, बिना किसी भूमिका के फिर एक नई ग़ज़ल..क्योकि बात बोलेगी, हम नहीं.  आपका प्रेम बना रहे, इसी आशा के साथ...
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दर्द मेरे और तेरे ढल गए अशआर में
हम कहाँ से अब कहाँ तक आ गए हैं प्यार में

तुमसे है उम्मीद कितनी ज़िंदगी में हमसफ़र
छोड़ कर ऐसे ना जाना तुम कभी मँझधार में
 
ज़िंदगी में तब सुकूँ मिलता है सच्चा दोस्तो
नेकनीयत ही भरी हो गर किसी किरदार में 
 
सामने जो भी गलत है तुम इसे बदलो तुरत
युग यहाँ पर बीत जाते हैं किसी अवतार में
 
दौड़ना अच्छा है लेकिन हादसों का डर भी हो
कुछ तो काबू रख सकेंगे हर घड़ी रफ़्तार में 
 
ज़िंदगी में हर घड़ी बस एक गुंजाइश रहे
इसलिये तो जीत भी हम खोज लेते हार में
 
रोज़ हम देखा-सुना करते हैं वो भी चल बसे
क्यों किसी से हम करें नफ़रत यहाँ बेकार में 
 
तुम संभल कर के चलो क्योंकि समय बलवान है
कब कहाँ आवाज़ होती है समय की मार में 
 
खुद असल में चीज़ क्या है वो सभी को है पता
खोजता रहता है फिर भी गलतियाँ दो-चार में 
 
मर्द हो तो सामने आओ लड़ो कुछ बात है
कायरों को ही मज़ा आता है छिप कर वार में 

नफरतो की आड़ पंकज एक दिन गिर जायेंगी 
छेद इतने कर दिए है प्रेम से दीवार में

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नई ग़ज़ल/ दर्द ही अपनी धरोहर दर्द ही हम गा रहे हैं

>> Wednesday, January 5, 2011

आंकड़ें भरमा रहे हैं
यूं छले हम जा रहे हैं

पी रहे हैं ग़म बेचारे 
वायदों को खा रहे हैं 

हमने केवल सच कहा था
आप क्यों चिल्ला रहे हैं 

सत्य कितना है अपाहिज
झूठ को दौड़ा रहे हैं


जिनपे करते थे यकीं हम
लूट कर वो जा रहे हैं

लूटने कुछ लोग बस्ती
वेश धर कर आ रहे हैं 

आदमी की देख केंचुल
साँप भी शरमा रहे हैं

क्या गलत कुछ हो गया है
आप क्यूं घबरा रहे हैं

खुद तो करते ऐश हमको
ख्वाब ही दिखला रहे हैं

न्याय को सूली मिली है
पाप जी मुस्का रहे हैं 

तुमने दिल से है पुकारा
दिल लिये हम आ रहे हैं

एक नकली ज़िंदगी पर
लोग बस इतरा रहे हैं

साथ क्या ले जायेंगे वे
धन बंटोरे जा रहे हैं 

कुर्सियाँ कब तक टिकी हैं
उनको हम समझा रहे हैं 

दर्द ही अपनी धरोहर
दर्द 'पंकज' गा रहे हैं

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नई ग़ज़ल/ तलवारें है कागज की पर जुल्म मिटाने निकले हैं.....

>> Wednesday, December 22, 2010

तलवारें हैं कागज की पर जुल्म मिटाने निकले हैं
अपनी बस्ती मे देखो ये कुछ दीवाने निकले
हैं

अत्याचारों की ये लंका आखिर कब तक चमकेगी
पवनपुत्र-सी हिम्मत लेकर आग लगाने निकले हैं 

जहाँ कहीं अन्याय दिखे तो मुर्दे ही खामोश मिले
जिंदा लोगों को देखा है वे चिल्लाने निकले हैं

कैद नहीं होगा अब सूरज अंधियारों की बस्ती में
जब सूरज के बेटे उसको मुक्त कराने निकले है. 

मर जायेंगे लेकिन हरपल सच का साथ निभाएंगे
यानी के हम भी पागल हैं जान गँवाने निकले हैं.

अपने हैं अपनों की खातिर त्याग ज़रा करना सीखो
नादां-अंधे खुदगर्जो को यह समझाने निकले
हैं

सत्ता की चौखट पर जिनने खुद को ही नीलाम किया
 
हम ऐसे नाकारों के सिर ताज सजाने निकले हैं

सुख में डूबा जिनका जीवन वे दुक्खों की बात करें
कुछ शातिर-अफसर कवियों का पता लगाने निकले हैं

दुनिया छद्मों में जीती है इसीलिये इस बस्ती में 
दुःख का पर्वत लेकर के जबरन मुस्काने निकले हैं

वक़्त भला था जब तक सारे आगे-पीछे होते थे
बुरा वक़्त आया है तो अपने बेगाने निकले हैं 

इस बस्ती में लूट लिया है मानवता को लोगों ने
कहते हैं कुछ चेहरे तो जाने-पहचाने निकले हैं 

सबके हिस्से में उजियारा आये इस खातिर पंकज    
शब्दों के दीये हम लेकर मंज़िल पाने निकले हैं 

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फिर एक नई ग़ज़ल / पास हमारे आओ थोड़ा....

>> Sunday, December 5, 2010

पास हमारे आओ थोड़ा
दूरी ज़रा मिटाओ
थोड़ा
 
जीना भी तो एक कला है
पीड़ा में मुस्काओ थोड़ा
 
साफ़ दिखेगा तुम्हें नज़ारा
परदे जरा हटाओ थोड़ा

रूठेंगे अपने भी कब तक
जाओ उन्हें मनाओ थोड़ा

भूखे को रोटी दे दो तुम
ऐसे पुण्य कमाओ थोड़ा

ये दुनिया तो होगी अपनी
केवल हाथ बढ़ाओ थोड़ा

रौशन हो जाएगा जीवन
मन का दीप जलाओ थोड़ा

खुशियाँ हो जाती हैं दूनी
बेशक इन्हें लुटाओ थोड़ा

कैसा सुख मिलता बंजर में
कोई फूल खिलाओ थोड़ा

आँसू भी शरमा जायेंगे
गीत कोई तुम गाओ थोड़ा

तेरा इंतजार है कब से
अपना हमें बनाओ थोड़ा

जीवन है इक सुन्दर पुस्तक
पढ़ते रहो, पढ़ाओ थोड़ा

होगा परिवर्तन भी इक दिन
सोए लोग जगाओ थोड़ा

कौन दूध का धुला है पंकज
एक खोज कर लाओ थोड़ा 

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नई ग़ज़ल/ पास मेरे जंतर-मंतर है.....

>> Thursday, December 2, 2010

हृदयाघात के बाद से बेहद सक्रिय रहने वाले पिता जी बिस्तर पर है.उन पर ध्यान देना ज़रूरी है इसलिये पहले की तरह नियमित रूप से कुछ् पोस्ट करना संभव नहीं है. आज फिर समय निकाला है. एक ग़ज़ल पेश है..


अपनों से ही छलछंदर है
तब कैसे जीवन सुंदर है

गाँठ बाँध कर रखना हरदम
मतलब पाप कोई अन्दर है

जिसकी आँखें नम न होतीं
उसका दिल समझो पत्थर है

जहाँ न कोई आये-जाये
वह तो केवल उजड़ा दर है

पाक-साफ़ दिल जिसका देखो
उस दिल में अल्ला-ईश्वर है

खुदगर्जी ने मारा जिसको
वह नादाँ कितना बदतर है

जो आता अपना बन जाता
पास मेरे जंतर-मंतर है.

हों मजबूत इरादे तो फिर 
समझो अवसर ही अवसर है

हम तो ले कर फूल खड़े हैं
उसके हाथों में खंजर है

त्याग-साधना कर के देखो
यह सुख ही सब से बढ़कर है

पढ़कर पुस्तक मूरख सोचे 
महाज्ञान अपने अन्दर है

अपने को जो समझे ज्ञानी
वह अज्ञानी है...जोकर है

सच के साथ रहो तुम पंकज
वैसे राह बड़ी दुष्कर है

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नई ग़ज़ल/ खरी-खरी जो कहता होगा

>> Tuesday, November 16, 2010

बहुत दिनों के बाद फिर हाज़िर हूँ: एक नई ग़ज़ल के साथ. वैसे ग़ज़ल तो ग़ज़ल होती है. जो पुरानी पड़ जाये वो ग़ज़ल नहीं हो सकती. ग़ज़ल सदाबहार होनी चाहिए. मेरी कोशिश इसी तरह का कुछ लिखने की होती है. इस प्रयास में सफल नहीं हो पा रहा हूँ. पर प्रयास जारी रखना चाहिए. बहरहाल, देखे, और बताएं, कि कैसी है ग़ज़ल..

खरी-खरी जो कहता होगा
तन्हा-तन्हा रहता होगा

सीधा-सादा इंसां है वो
दुःख को भीतर सहता होगा

अहसानों का बोझ लदा है
इसीलिए वो झुकता होगा

जिसे चाहिए सुविधाएँ वो
सच कहने से डरता होगा

सच निर्वासित हो कर के अब 
झूठों के संग रहता होगा

हंसमुख पंकज के भीतर में 
दुःख का दरिया बहता होगा

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नई ग़ज़ल / क्यों हमें उल्लू बनाया जा रहा है

>> Monday, November 8, 2010

दीपावली बीत गई. सबने अपनी-अपनी हैसियतों के अनुसार त्यौहार मनाया.क्या गरी और क्या अमीर. दीवाली तो सबकी है. अब जीवन के कटु यथार्थ से रू-ब-रू होना है. जीवन अपनी गति से चलता है. मैं जीवन-दर्शन पर कुछ नहीं कहने जा रहा. बस, मन की कुछ बातें कहूंगा चंद शेरों के माध्यम से. शायद कुछ आपके मन की भी बात हो...देखें...  

सिर्फ दर्पण को सजाया जा रहा है
और चेहरे को छिपाया जा रहा है

झूठ को ही सच बताया जा रहा है
सत्य को लेकिन मिटाया जा रहा है

जो कहेगा सत्य वो मुजरिम यहाँ
कुछ नियम ऐसा बनाया जा रहा है

पेट खाली थे उन्हें कुछ ना मिला
तृप्त लोगों को खिलाया जा रहा है

रोज़ ही कहते हैं लाएँगे ख़ुशी
क्यों हमें उल्लू बनाया जा रहा है

जुर्म गर धनवान कर ले छूट है
बस गरीबों को सताया जा रहा है

हमने तो चेहरा दिखाया था मगर
हमको सूली पे चढ़ाया जा रहा है

दौर कैसा आ गया है आजकल
झूठ को सिर पे चढ़ाया जा रहा है

बेदखल कर के यहाँ अच्छाई को
जश्न अब पंकज मनाया जा रहा है

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नई ग़ज़ल/ बाप से भी ये घूस वसूलें......

>> Thursday, October 21, 2010

साहब....'शार्टकट' में ''साब जी'' भी. हमारे यहाँ ये शब्द व्यंग्य में भी कहा जाता है. बहुत पहले एक फ़िल्मी गीत लोकप्रिय हुआ था-''साला मैं तो साहब बन गया, साहब बनके कैसा तन गया''. साहब बन कर अक्सर लोग तन जाते है. ऐसे ही तनने वाले लोगो को समर्पित है आज कुछ शेर. मनुष्य मनुष्य बना रहे, इससे उसका क्या बिगड़ जाता है. ठीक है, कोई साहब बन गया तो क्या यह ज़रूरी है कि वह मनुष्य ही न रहे. खैर, बात लम्बी हो जायेगी. ब्लॉग के माध्यम से अपनी लघु रचनाएँ ही देना चाहता हूँ. लम्बी रचना पढ़ने का अवकाश कहाँ है. बहरहाल, पेश है नई ग़ज़ल. देखें, कुछ सुधी पाठको को जाँच जाये शायद....

बस कहने को बड़े साब जी
भीतर से पर सड़े साब जी 

निकल न पाएँगे पापों से
इतना भीतर गड़े साब जी

बात है सच्ची लेकिन जिद है
झूठ पे अपनी अड़े साब जी 

हमने सच क्या बोल दिया बस
डंडा ले कर चढ़े साब जी 

उनकी थाह नहीं पाओगे 
इतनी परतें मढ़े साब जी

मुफ्तखोर हैं, कामचोर हैं
फिर भी तो हैं बड़े साब जी 

देख-देख उनकी बेशर्मी 
लोग शर्म से गड़े साब जी 

ज्ञान की बूँदें टिक ना पाईं
ऐसे चिकने घड़े साब जी 

झूठों से हैं बड़े मुलायम 
सच्चों से हैं कड़े साब जी 

बाप से भी ये घूस वसूलें 
अगर वक़्त कुछ पड़े साब जी

लूट, झूठ सारे छलछंदर
कहाँ पाठ ये पढ़े साब जी 

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सुनिए गिरीश पंकज को

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