''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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इसको होली में लाल करें .......

>> Saturday, March 19, 2011

आओ कि ज़रा कमाल करें.
काला-काला यह जीवन है,
इसको होली में लाल करें.
आओ कि ज़रा कमाल करें                              

हरदम ही रोनी सूरत है,
अब मुस्काना भी याद नहीं?
मानव-शरीर में आये हैं,
पर मानव से संवाद नहीं?
जो अकड़ लिए फिरते उनको,
बातों से तनिक हलाल करें..
आओ कि ज़रा कमाल करें

पल भर का जीवन है प्यारे,
कब साँस कहाँ थम जायेगी.
दो घड़ी प्यार से जी लो तो,
दुनिया तेरे यश गायेगी. 
है पास खुशी की दौलत गर 
दुनिया को मालामाल करें.
आओ कि ज़रा कमाल करें

यह जीवन है सुन्दर कितना,
उसको गंदा-सा कर डाला.
नफ़रत, हिंसा की कालिख से,
जीवन को कितना भर डाला.
अब वक्त मिला है थोडा-सा,
धो कर के इन्हें निहाल करें...
आओ कि ज़रा कमाल करें
                                                       
गर भ्रष्ट बहुत रहताजीवन                                  
तकलीफ बहुत सहता जीवन
नंबर दो का है माल बहुत,
बस इसीलिये डरता जीवन.
कुछ दौलत अब बाहर निकले,
कंगालों को खुशहाल करें.
आओ कि ज़रा कमाल करें.....

भीतर में पाप भरा कितना,
बाहर से साफ बने बैठे.
हैं दो कौड़ी के लोग मगर,
फ़ोकट में खूब तने बैठे.
इन सबको लायें धरती पर,
कुछ ऐसा हम भूचाल करें.
आओ कि ज़रा कमाल करें.....                          

आओ कि ज़रा कमाल करें.
काला-काला यह जीवन है,
इसको होली में लाल करें..

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