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महंगाई डायन के नाम एक खुला ख़त
>> Saturday, January 15, 2011
नईदुनिया, रायपुर में १५-१-२०११ के अंक में प्रकाशित व्यंग्य.......
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गिरीश पंकज
पुरुषों के लिए ''छिनाला'' शब्द...
>> Wednesday, August 4, 2010
कभी 'नया ज्ञानोदय' जैसी पत्रिका की अपनी गरिमा हुआ करती रही. लेकिन अब इसकी गरिमा गिरती जा रही है. कभी 'बेवफाई विशेषांक', कभी ”'सुपर बेवफाई विशेषांक' निकाला जा रहा है. हिंदी के नए तथाकथित 'सुपर' संपादक के संपादन में निकलने वाली पत्रिका के अगस्त अंक में विभूतिनारायण राय का साक्षात्कार छपा है. एक जगह उन्होंने कहा कि ''लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिये कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है.'' किसी लेखिका का हवाला या संकेत दे कर अगर विभूतिनारायण राय अपनी बात कहते तो तो मामला शायद इतना गर्म नहीं होता. लेकिन उनका कथन तो समस्त लेखिकाओं पर चस्पा हो रहा है. (हद है, कि राय यह भी भूल गए, कि उनकी सगी पत्नी भी लेखिका हैं और जिस संपादक ने साक्षात्कार छपा है, उनकी पत्नी भी एक लेखिका हैं. अखबार या पत्रिका में क्या छप रहा है, यह देखना संपादक का ही काम होता है). स्वाभाविक है कि लेखिकाएँ भड़कती. राय को कुलपतिपद से हटाने की बात हो रही है. लेकिन 'नया ज्ञानोदय' के संपादक की बात कोई नहीं कर रहा है. ‘नया ज्ञानोदय’ में साक्षात्कार छापने के लिये संपादक भी उतना ही दोषी है. ज्ञानपीठ पुरस्कार देने वाली संस्था द्वारा प्रकाशित पत्रिका के निरंतर पतन को साहित्य के पाठक देख रहे हैं. हिन्दी को नया ज्ञानोदय के संपादक ने कितना दरिद्र कर दिया है, वह इसी से समझ में आ जाता है, कि उन्हें 'सुपर' शब्द का इस्तेमाल करना पड़ता है. 'सुपर बेवफाई विशेषांक'. ऐसे समय में जब देश अनेक संकटों से घिरा हुआ है, एक साहित्यिक पत्रिका पहले प्रेम विशेषांक और बाद में बेवफाई विशेषांक निकालती है. ''ज्ञानपीठ'' जैसा उत्कृष्ट सम्मान देने वाली संस्था में अब कैसे-कैसे संपादक कुण्डली मार कर बैठ गए हैं. एक प्रेम अंक से इनका मन नहीं भरा तो, बेवफाई-अंक पर उतर आये. इससे भी आत्मा तृप्त नहीं होती तो महाविशेषांक निकाल देते है. ''महा'' शायद कमजोर शब्द है. इसलिए संपादक ने ”सुपर” शब्द का उपयोग किया. जीवन में बेवफाई एक चरित्र है. लेकिन अब हमारे साहित्यकार, संपादक साहित्य के साथ भी बेवफाई कर रहे हैं. अपने समय के अन्य जीवंत सरोकारों से कट कर अन्य विषय उठाना अपराध है. जब रोम जले और नीरो बांसुरी बजाये तो उसका चरित्र समझा जासकता है. जब अपना देश हिंसा और साम्प्रदायिकता जैसे सवालों की आग से झुलस रहा है, तब एक पत्रिका प्रेम और बेवफाई मे डूब कर लेखिकाओं के चरित्र पर कीचड उछालने का काम कर रही है. लोग हैरत में है, कि ज्ञानपीठ जैसी संस्था में ऐसे असंगत, अनुपयोगी, कालातीत, गएगुजरे संपादक को बर्दाश्त कैसे किया जा रहा है? अगर लेखिकाओं को ”’छिनाल” कहने वाले कुलपति को हटाने की माँग हो रही है तो नया ज्ञानोदय” के संपादक को हटाने की माँग भी उठनी चाहिए थी. लेकिन लोगों को पता है,कि न कुलपति हटेंगे, न संपादक. इन दिनों शातिरो की जुगलबंदी सलामत रहती है.भले लोग बाहर कर दिए जाते हैं, और चालाक लोग डटे रहते है. जोड़तोड़ करके तथाकथित ऊंचे पदों तक पहुँचाने वालों की पकड़ भी तो मजबूत होती है.
सवाल यही है,कि ऊंचे पद पर बैठने वाले लोगों को क्या निम्नस्तरीय बातें करने का लाईसेंस भी मिल जाता है? यह स्वीकार किया जा सकता है, कुछ लेखिकाएं चर्चा में बनी रहने के लिये अश्लील लेखन कर रही है. उनका लेखन सबके सामने है. लेकिन ऐसी इक्का-दुक्का लेखिकाएँ ही है. अधिकाँश लेखिकाएं मूल्यपरक कहानियाँ लिख रही है. इन पर साहित्य को गर्व है. मलयाली में बालामणि अम्मा थी, बांग्ला में आशापूर्णादेवी थी. हिन्दी में शिवानी जैसी कथालेखिका थी.बहुत पहले महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान जैसी लेखिकाएं भी हो चुकी हैं. अभी मालती जोशी हमारे बीच है. बांग्ला की महाश्वेता देवी भी है, जो नारी-विषयक सवालों को उठती रही है. अन्य कई नाम और हो सकते है. ऐसी अनेक लेखिकाएँ हैं, जो स्त्री के सम्मान के लिये लड़ती रही है. और खुद भी नैतिक है. उन लेखिकाओं की तरह नहीं है, जो अश्लीलता परोस कर स्त्री-विमर्श करती हैं. वे लेखिकाएं हमारी शान है, जो स्त्री के सम्मान को बढ़ा रही है. यहाँ नाम गिनना मकसद नहीं. मकसद यह है, कि अच्छी लेखिकाएँ भारी-पडी है, लेकिन उनका ज़िक्र न करते हुए यह सामान्यीकरण करते हुए समूची लेखिका-बिरादरी के लिये अभद्र शब्दों का उपयोग कर देना क्या एक पुरुष की 'छिनाल-प्रवृत्ति' नहीं है. औरतों के लिये 'छिनाल' शब्द है, तो इस पुरुष के लिये भी 'छिनाला' शब्द है, जिसका अर्थ होता है-'व्यभिचार'. एक कुलपति अगर घटिया शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह एक तरह का 'व्यभिचार' ही करता है. और विभूतिनारायण राय तो अपने को लेखक भी कहतें है., वे हैं भी. लेकिन लेखक होने का मतलब यह तो नहीं, कि आप कुछ भी कहने के लिये स्वतन्त्र हैं? मर्यादा भी कोई चीज़ है. क्या समाज में कुछ ऐसी व्यवस्था हो गयी है, कि आदमी ऊंचे पद पर बैठ कर अनर्गल प्रलाप करने के लिये स्वतन्त्र है? क्या वह थूक कर चाटने का भी काम कर सकता है? सुबह गाली दी, और शाम को माफी माँग ली..? वाह, क्या चालाकी है? पद बना रहने के लिये अपनी ”थूक” को चाटने की अभिनव प्रविधि है यह तो. साहित्य और समाज में ऐसे विभूतिया कम नहीं हैं. लेकिन जो बात निकल गयी, तो निकल गयी. बात निकलती है तो दूर तलक जाती है. उसकी अनुगूंज देर तक रहती है.
विभूतीनारायण राय का स्त्री-विरोधी कथन लम्बे समय तक चर्चा में बना रहेगा. जो लेखिकाएं उनके कथन से आहत हुई है, वे धरने पर बैठे, राष्ट्रविरोधी प्रदर्शनों का आयोजन करे, और यह आन्दोलन तब तक जारी रहे, जब तक राय अपने पद से इस्तीफा नहीं देते. कहीं तो कोई पश्चाताप नज़र आये..उम्मीद की जानी चाहिए, कि इस मुद्दे पर देशव्यापी आन्दोलन होगा.इसमे केवल लेखिकाएँ ही शरीक हों, यह ज़रूरी नहीं, सामाजिक संगठनों की महिलाएं भी शरीक हो सकती है. आखिर यह नारी अस्मिता से जुडा सवाल भी है. विभूतिनारायण राय को भी आत्म-मंथन करना चाहिए. अगर वे अपने को लेखक कहते है, तो उन्हें भी अपना धर्म निभाना चाहिए और फ़ौरन इस्तीफा दे देना चाहिए. वरना पुरुषों के लिये अब स्त्रियों को भी 'छिनाला' शब्द का खुलकर इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि समूची लेखिका-बिरादरी को गरियानेवाली ''विभूतियों'' को ''छिनाला'' कहकर हम ज़रा उनके चरित्र को भी तो स्पष्ट करें.
------------------------------------------------------- (मैंने अपना यह लेख ''प्रवक्ता.काम'' पर भी दिया है. इस लेख मे कुछ और विस्तार है. मुझे लगा, कि अपने कविता वाले ब्लॉग पर यह लेख देनाचाहिये. क्योंकि मेरे अपने कुछ विशेष पाठक हैं, जिन तक ये विचार पहुँचने चाहिए.)
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गिरीश पंकज
लेख
>> Monday, November 9, 2009
इस बार कविता नहीं, केवल एक टिप्पणी..
स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश...
.प्रभाष जोशी जी के निधन पर मैंने एक लिखा जो, मोहल्ला लाइव में भी छपा. उस लेख में एक जगह मैंने जोशी जी द्वारा एक सती काण्ड की प्रशंसा के सन्दर्भ में यह लिखा था कि 'उन्होंने औरत की उस भावना की तारीफ की थी कि वह पति से कितना प्यार करती थी'. इसमे कोई बुराई नहीं. मैंने जोशी की इस बात का समर्थ करते हुए एक बात कही कि यह घटना ''उन महिलाओं के लिए एक सबक जैसी है, जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” इसमे भी मैंने कोई गलत बात नहीं कही. ऐसी बात लिखने के लिए एक लेखक ने प्रतिक्रिया दी कि मुझे शर्म आनी चाहिए क्योंकि यह स्त्री- विरोधी बात है. मित्रो, मै स्त्री-विरोधी नहीं हूँ, वरन उसकी दिशाहीनता का सख्त विरोधी हूँ. शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए, जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश भी की है कि 'यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है'.ये है मानसिकता. क्या यही है आधुनिकता..? साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल जायेगी तो वो मूल्य कहाँ जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? यह सफाई देने की बात नहीं है कि मै प्रगतिशील सोच वाला हूँ लेकिन प्रगतिशीलता और व्यभिचार में अंतर है. प्रभाष जी वाले लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह लेख के सन्दर्भ को आगे बढ़ाने वाली बात है. मैंने लिखा है- ''उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” सबके लिए यह बात नहीं है. हो भी नहीं सकती, अच्छी औरते अभी भी बची हुई है, जो पति के साथ सती होना पसंद करती है, यह उनकी अपनी भावना है. सती प्रथा का मै समर्थक नहीं हूँ.हो भी नहीं सकता लेकिन मै उस भावना को नमन करता हूँ जो भावना औरत को बड़ा बनाती है. अगर पत्नी-वियोग में कभी कोई पति भी जान दे दे तो वह भावना भी प्रणम्य है.
एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है...? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. किसी को चिता में जबरन बिठाने का कोई अग्यानी ही समर्थन करेगा. जोशी जी ने साथ-साथ जीने-मरने की उसी भावना का सम्मान किया था, जो अब लुप्त होती जा रही है. मै भी इस भावना का सम्मान करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे कि 'ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा रहा है? छिः...इसे तो मध्य युग में होना था', लेकिन मै हूँ और अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ. स्त्री-शक्ति पर मेरी अनेक कवितायेँ है जो बताती है कि मेरी सोच क्या है, चिंतन क्या है. मेरा ब्लॉग देख ले, मेरी रचनाये देख ले, तो शायद दृष्टी खुल जाये, लेकिन ऐसे लोगो की दृष्टी कुछ ज्यादा ही खुल जाती है. बहरहाल, स्त्री के प्रति मेरा नजरिया क्या है, इसे समझाने के लिए अपनी ही ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ-
सुन्दर, कोमल कली लडकियां
होती अकसर भली लडकियां
कितना मीठा मन रखती हैं
ज्यों मिसरी की डली लडकियां
मत बंधो पैरो में बंधन
अन्तरिक्ष को चली लडकियां
लड़के जब नाकारा निकले
मान-बाप को फली लडकियां
गिरी हुयी दुनिया दिखलाती
ससुरालों में जली लडकियां
शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश भी की है कि 'यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है'. ये है मानसिकता. साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल जायेगी तो वो मूल्य कहाँ जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? मै अच्छी और बुरी औरतों के बारे में लिखता रहता हूँ, जैसे अच्छे-बुरे पुरुषों पर भी कलम चलता रहता हूँ. बीस-तीस साल पहले दिनकर जी की एक कविता कभी पढी थी, कि भूमि पर पैर टिकते नहीं तुम्हारे/ तुम उडी जा रही हो पवन की तरह/ भाईयो की तुमको न होगी कमी/ पर चलना तो सीखो बहन की तरह/ क्या यह कविता स्त्री-विरोधी है..? अच्छी बातों का स्वागत होना चाहिए, संकुचित नज़र से देखने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. हर लेखक का दायित्व है कि वह सच लिखे. जैसे कई लोग मुसलमानों की गलत बातों पर भी सिर्फ इसलिए चुप तरह जाते हैं कि लोग उन्हें सांम्प्रदायिक न करार दें
खैर, स्त्री -अस्मिता पर मै लिखता रहता हूँ. मेरी भावनाओ को वे न समझें तो न समझे. शर्मिन्दा वे लोग होते रहे जो पतन को उत्तर आधुनिकता समझ बैठे है, जो स्त्री के देह -स्वातंत्र्य को ही उसकी आधुनिकता का उत्स मान रहे है. उसे भड़का रहे है. प्रगति होती रहे, लेकिन मूल्य बने रहे, और यह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए है. खैर, इस मुद्दे पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है. फिलहाल इतना ही काफी है.
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