''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है...

>> Tuesday, August 3, 2010

 कहावत है, कि ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है. मेरे साथ यही हुआ. पहले ''ईटिप्स'' ब्लॉग के मित्रों ने मुझे सम्मानित किया और कल ''परिकल्पना'' के रविन्द्र प्रभात भाई और उनकी टीम ने मुझे सम्मानित कर दिया. जब  कभी मै ऐसे किसी सम्मान से नवाज़ा जाता हूँ, जिसके बारे में मुझे अचानक ही कोई सूचना मिलती है, तो समाज में बची-खुची नैतिकता पर मुझे गर्व होता है. आज का दौर माफियाओं का है. पुरस्कार-सम्मान चेहरे देख कर दिए जाते है. किसी को अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है, तो सम्बंधित व्यक्ति को सम्मानित कर दिया जाता है, लेकिन यहाँ तो न ईटिप्स वाले को हम से कोई सम्मानवाला कोई लाभ होना है, न 'परिकल्पना'वाले रविद्रजी को ही कोई अपेक्षा है. ऐसे लोग मेरे लिये प्रणम्य है, जो किसी प्रत्याशा में किसी को सम्मानित नहीं करते. वरन एक ईमानदार पर्यवेक्षक की तरह लोगों को देखते है, और उनके कार्यों की सराहना करते हैं. दरअसल ऐसे ही सद्भावीजनों के कारण समाज में मूल्य ज़िंदा है. जो लोग अच्छा काम कर रहे हैं उनका हौसला भी बढ़ता है. यह विश्वास भी पुख्ता होता है, कि अभी भी यह दुनिया अच्छे लोगों से भरी हुई है. अपने प्रति लोगो का स्नेह देखता हूँ तो ख़ुशी होती है. लोगों की पैनी नज़र है मेरे काम पर. भारत हो या दूसरे देशों में रहने वाले मेरे मित्र हों, जब वे शुभकामनाएँ देते है, तो मुझे लगता है, और ज़िम्मेदार हो कर लेखन करना है. एक बार फिर मैं अपने शुभचिंतकों का धन्यवाद करना चाहता हूँ, जो मेरे लेखन पर अपना स्नेह लुटा रहे हैं. यह कृपा बनी रहे, बस इसी आशा के साथ आज बस इतना ही. अपने दो शेरों के साथ, कि

आपका अहसान हो जाये
ज़िंदगी आसान हो जाये
आपकी मानिंद ही बस 
हर कोई इनसान हो जाये.

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एक मार्मिक अपील ललित शर्मा से...

>> Friday, April 9, 2010

मैं ये क्या देख-सुन रहा हूँ ललित..?  

कई बार तुम मज़ाक करते हो, इसलिए समझ में नहीं आ रहा कि तुम इस बार मज़ाक कर रहे हो या गंभीर हो.. तुम्हारे जैसा जिंदादिल और भविष्य का प्रतिभाशाली ब्लागर अगर ब्लागिंग को अलविदा कह देगा तो यहाँ बचेगा ही क्या..? मै असहज हो गया हूँ यह पढ़ कर कि ललित शर्मा ने ब्लागिंग से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी है. यह दुखद खबर है और ब्लागिंग-जगत के लिए शुभ संकेत भी नहीं है. ऐसे वक्त में जब ब्लागिंग में कुछ ऐसे मसखरे लोग घुस आये हों, जिनमें प्रतिभा नहीं, जोड़तोड़ का हुनर हो, और जो अपनी आपराधिक भावनाओं के कारण समाज-बहिस्कृत-से हो, ऐसे लोगो को 'रिप्लेस' करने के लिए ललित शर्मा जैसे फ़ौजी की ही जरूरत है. लेकिन ललित खुद इतनी जल्दी टूट जाएगा, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी. वैसे ब्लागजगत के कुछ टुच्चेपंन को मैंने भी महसूस किया. और मेरे मन में भी यही बात अकसर आती रही है, कि मुझे भी ब्लागिंग बंद कर देनी चाहिए. इस ब्लागिंग के कारण मेरे दो उपन्यास अब तक अधूरे पड़े है. अपनी सर्जनात्मकता का कुछ श्रेष्ठ देने की विनम्र कोशिशो के बाद कोई बेहतर प्रतिसाद मिला ही नहीं. वही जिनके पास विचारों का खासा अकाल है, उनके पास समर्थक-टिप्पणियों की भरमार है. ये कैसे लोग है जो असली और नकली सिक्के की पहचान नहीं करते. दुःख होना स्वाभाविक है. फिर भी मुझे संतोष है. यह सोच कर कि एक-दो लोग भी अगर मेरी रचनात्मकता से प्रभावित हो कर कुछ बेहतर सोचने-करने के मार्ग पर चलते है, तो लेखन सार्थक हो जाएगा. ललित के लेखन में हल्कापन नहीं रहा. उसकी कविता हो, संक्षिप्त विचार हो, सब के सब दमदार और जीवंत थे. ललित की ब्लाग-चर्चा हो. पान दूकान पर चर्चा हो, शिल्पकार हो, जितने भी ब्लाग है, सबके सब सामाजिक सरोकार से भरे हुए. ऐसे सक्रिय ब्लागर ने अगर ब्लागिंग से सन्यास लेने की घोषणा की है, तो ज़रूर कोई बड़ी बात हुई है. कुछ ऐसा हुआ होगा कि उसका दिल दुखा है. किसी ने उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने की हरकत की है. ललित....तुम तो फ़ौजी हो, बहादुर हो... इतनी जल्दी निराश हो कर पीछे कदम हटा लोगे तो मेरे जैसे  उन तमाम लोगों का क्या होगा, जो तुम्हारे कारण ही 'मैदानेब्लागिंग' में डटे हुए है. क्या वे भी पलायन कर जाएँ,..? बोलो..? इसलिए मेरा आग्रह है, मेरा क्या हजारों लोगो  का आग्रह है कि तुम हिम्मत न हारो, मेरा शेर है
हो मुसीबत लाख पर यह ध्यान रखना तुम
मन को भीतर से बहुत बलवान रखना तुम
और भी 
आपकी शुभकामनाएं साथ हैं
क्या हुआ गर कुछ बालाएं साथ हैं. 
हारने कार्थ यह भी जानिए
जीत की संभावनाएं साथ हैं 
इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम
रौशनी की कुछ कथाएं साथ हैं
तो....हिम्मत से काम लो, और लौट आओ. वरना मै भी असमय संन्यास ले लूँगा. तुम को लगे रहना चाहिए. जब बुरे लोग ब्लागिंग में घुस कर तथाकथित रूप से गुट बनाकर  अपना कुत्सित खेल कर रहे हो, तब दुःख होना स्वाभाविक है. खोटे सिक्कों की यही तासीर होती है, कि वे अच्छे सिक्कों को चलन से बाहर करने में सफल हो जाते हैं. कहीं तुम्हारे साथ भी तो ऐसा कुछ नहीं हुआ? अन्दर की कहानी या साजिश से मै नावाकिफ हूँ. बात जो भी हो, तुम हिम्मत न हारो. अपने ललित-विचारों से ब्लागिंग रूपी बाग़ को महकाते रहो. यही मेरी....हम सब की प्रार्थना है. 
                                                                                    तुम्हारा भाई
                                                                        गिरीश पंकज

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