''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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साधो यह हिजड़ों का गाँव-1

>> Tuesday, October 27, 2009

व्यंग्य-पद-

(1)
साधो यह हिजड़ों का गाँव।
कोयल चुप है, कौवे हिट हैं, करते काँव-काँव बस काँव।
सच कहने से बेहतर है तुम, बैठो जा कर शीतल छाँव।
नंगों की बस्ती में आखिर, कैसे जीतोगे तुम दाँव।
बचकर रहना नदी में कीचड़, फँस जाएगी जर्जर नाँव।
अच्छा है परदेस निकल लो, वहीं मिलेगी तुमको ठाँव।
(2)
चलने दो बस ठकुरसुहाती।
सच मत बोलो फट जाती है...साहब, भैयाजी की छाती।
जिनके दुराचरण पर जनता, हरदम मंगल गीत सुनाती ।
उसको नमन सभी करते हैं, जिनके हिस्से कुरसी आती।
खुद्दारी के पाठ पढ़ो मत, इससे जिनगी ना चल पाती।
अगर मलाई चाहो खाना, दिखना चौखट पर दिन-राती।
(3)
यह मेरा भगवान नहीं है।
मंदिर में दिखते सवर्ण सब, दलितों का स्थान नहीं है।
जितने पापी उतने पूजक, साधक का सम्मान नहीं है।
झूठे को वर, सच्चे को भी, यह तो कोई विधान नहीं है।
समदर्शी का क्या है मतलब, जब तक न्याय महान नहीं है ।
रिश्वत देते हैं दाता को, क्या उसका अपमान नहीं है । (क्रमशः )

गिरीश पंकज

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