''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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नई ग़ज़ल/ छल से छलके नैन हमारे , आज हमारा जगराता है

>> Saturday, July 17, 2010

हम सबका जीवन विविधताओं से भरा हुआ है. अनुभव, स्थितियां सबके अनेक रंग हैं. दुःख है तो सुख भी है. दुःख आया है तो सुख की संभावना भी बनी हुई है. कई बार मै भी घबरा जाता हूँ, लेकिन मुझे अपनी ही पंक्तियाँ समझने लगाती है. परम्परा में भी बहुत सी कविताएँ हैं, उक्तियाँ है. ये सब हमें हौसलादेती हैं. यह सच है, कि खोटे सिक्के भी चलते है, लकिन कभी-कभी. अक्सर खरे सिक्के ही चलते है. अच्छे लोग ज्यादा दिन तक दबे नहीं रह सकते. प्रतिभा सामने  आती ही है. सर्जक को सर्जक मिलता ही है. और तब उसकी रचना सार्थक हो जाती है. और भी बहुत-सी बातें है. प्रस्तुत ग़ज़ल के हर शेर में इस दौर के हालात का बयान करने की  कोशिश है. अभी की, और आने वाले समय की स्थितियों को भी देखने की विनम्र कोशिश की गयी है. सुधी पाठक मेरी ताकत है. उनसे अपेक्षा है, कि हमेशा की तरह इसे भी दिल से पढ़े---

दुःख के पीछे सुख आता है
अनुभव हमको बतलाता है 

अंधकार ये मिट जाएगा 
सूरज हमको समझाता है

'जीने' का जो हुनर जानता 
'मरने' से वह बच जाता है 

जिसने खुद को सदा सँवारा 
इस दुनिया में छा जाता है.

धीरज रक्खो, सोचो थोडा 
चंचल मन तो उकसाता है

सर्जक के मन के भावों को
बस सर्जक ही पढ़ पाता है.

अंधों की बस्ती में ही बस
खोटा सिक्का चल पाता है

दुनिया को दिखलाने खातिर 
दिल रोता है पर गाता है

जब तक हो तुम नेक करो कुछ
यह जीवन फिर कब आता है

नया दौर है कौन यहाँ पर 
माँ-बाप से घबराता है

छंद साधना से बनता है
अब तो कुछ भी चल जाता है

तुझे देख कर खुश होता हूँ
कुछ ना कुछ गहरा नाता है

छल से छलके नैन हमारे 
आज हमारा जगराता है
 
असफलताएँ, आँसू, सपने 
पंकज का अपना खाता है.

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और क्या देंगे सभी को हौसला देते रहें ...

>> Monday, April 19, 2010


पांच-छः दिन बाद प्रवास से लौट कर फिर शुभचिंतको के सामने हूँ. होशंगाबाद गया था. वहां पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता पर बोलना था. खैर, जो सूझा, वो बोल दिया. यह कोई बड़ी बात नहीं, जो मै बताऊँ. बड़ी उपलब्धि तो यह रही कि माँ नर्मदा की गोद में अठखेलियाँ करने का अवसर मिला. न जाने कितने...कितने ही वर्षों के बाद नर्मदा नदी में तैरने का आनंद लिया. इस पावन अनुभूति पर बहुत जल्द ही मै कुछ लिखूंगा. बहरहाल, वहां से लौटा तो ब्लॉग के लिए कुछ लिखना था. क्या लिखूं समझ में नहीं आया, तभी एक पंक्ति कौंधी ''और क्या देंगे सभी को हौसला देते रहे'', बस कुछ शेर बन गए. सुधीजन देखें...

और क्या देंगे सभी को हौसला देते रहें
प्यार का, सद्भावना का सिलसिला देते रहें

दे नहीं सकते हैं दौलत हैसियत भी है नहीं
मुफ्त की इक चीज़ है दिल से दुआ देते रहें

ज़िंदगी छोटी है इसको प्रेम से जी लें सभी
इस तरह इन्सानियत का हम पता देते रहें
 

खामखाँ इतरा रहे जैसे खुदा ही बन गए
आदमी हैं आदमी को रास्ता देते रहें.

सब चलें मिलकर
चलें ये है सलीकेकारवां
जो भटक जाये उसे बढ़कर 'सदा' देते रहें


पोछ डालें आंसुओं को गर कहीं बहता दिखे
दर्द को हम प्यार की हर-पल दवा देते रहें


चार दिन की ज़िंदगी हमको मिली पंकज यहाँ 
रौशनी बाँटें सभी को यह सिला देते रहें

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सुनिए गिरीश पंकज को

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