''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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नई ग़ज़ल/ वे इतने बिंदास हो गए वैचारिक संडास हो गए ....................

>> Friday, July 8, 2011

यह समय कई बार विचित्र किन्तु सत्य जैसा लगता है. फिल्मो में गालियों का इस्तेमाल  हो रहा है, यथार्थ के नाम पर साहित्य में भी गालिया और अश्लीलता खुलेआम नज़र आती है. समलैंगिकता को प्रगतिशील आचरण समझा जा रहा है. हर वर्जित चीज़ों को लोग प्रगतिशील बन कर जायज़ ठहराने पर तुले हैं. इस पर कुछ अलग से लिखूंगा. फिलहाल कुछ शेर अभी बने हैं, इसी मानसिकता पर, सो, प्रस्तुत हैं.

वे इतने बिंदास हो गए
वैचारिक संडास हो गए
 

प्रोग्रेसिव बनने की खातिर
फ़ौरन बिना लिबास हो गए
 

गाली देना कला बन गयी
भजन यहाँ बकवास हो गए


सबको दो कौड़ी का समझा
खुद ही गुम इतिहास हो गए
 

सुविधाओं के चक्कर में कुछ
सज्जन भी बदमाश हो गए
 

भ्रष्ट यहाँ नायक दिखते हैं
अच्छे सभी उदास हो गए
 

सच-सच बोल दिया तो उनके
पैरों की हम फास हो गए
 

बोल न पाए बातें सच्ची
क्या वे ज़िंदा लाश हो गए
 

जाने का ये नाम न लेते
दर्द हमारे ख़ास हो गए
 

पढ़-लिख कर कुछ फेल हो गए
बिना पढ़े कुछ पास हो गए

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नई ग़ज़ल / इक दीप-सी जलती रही इरोम शर्मिला....

>> Wednesday, November 3, 2010

एक सत्याग्रह के दस साल होने पर.....
इरोम शर्मिला.....किसी परिचय की मोहताज नहीं है वह. इरोम शर्मिला क्रांति का प्रतीक है. अन्याय के खिलाफ एक आवाज़ है. अँधेरे के विरुद्ध रोशनी का गीत है..गान है. इरोम शर्मिला भारतीय अस्मिता कि पहचान है. आज के ही दिन दस साल पहले उसने मणिपुर मे पुलिस और सेना अत्याचार के विरुद्ध आमरण अनशन शुरू किया था. वहां सेना को विशेषाधिकार मिले है. जिसका फायदा उठा कर वह सामान्य लोगों पर जुल्म करती रहती है. कभी औरतों के साथ बलात्कार तो कभी किसी भी निर्दोष को प्रताड़ित करना, यही है वहां की सेना के कुछ् लोगों का चरित्र. जब पानी सिर से ऊपर बहाने लगा तो भुक्तभोगी शर्मिला ने आवाज़ उठाने के लिये २ नवम्बर २००० को आमरण अनशन शुरू कर दिया. उसकी एक सूत्री माँग है- मणिपुर मे सेना को जो विशेषाधिकार दिए गए है, वे वापस लिये जाये. आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने वाली सेना के आतंक का तो खात्मा कर नहीं सकी, उलटे वहां के लोगों पर आतंक फ़ैलाने लगी? हद है...मणिपुर की अनेक महिलाओं ने सेना मुख्यालय के बाहर पूर्णतः नग्न हो कर प्रदर्शन भी किया था. यह है अपना देश. शर्म आती है, मणिपुर ही नहीं, लगभग पूरे देश में सेना में घुसे कुछ पागल लोगों का अत्याचार अक्सर सहना ही पड़ता है. लेकिन कोई सामूहिक आवाज़ ही नहीं उठती. यह हमारा सौभाग्य है कि इसी देश में इरोम शर्मिला भी रहती है, जिसने सेना को मिले विशेषाधिकार के विरुद्ध आवाज़ उठाई. शर्मनाक बात यह है कि हमारी सरकार ने इस वीरांगना की कद्र नहीं की. अरे एक बार तो सरकार इरोम का कहना मान लेती. एक बड़ी लड़ाई का सम्मान करती. लेकिन जब नकली लोकतंत्र का खेल होता है तो ऐसे ही मंज़र सामने आते है. पता नहीं, वह दिन कब आएगा, जब इरोम शर्मिला की आन पूर्ण होगी. होगी भी या नहीं? क्या अधूरी खवाहिश लेकर ही शर्मिला इस संसार से चल देगी? पता नहीं, क्यों इस देश के नारी संगठन खामोश है. एक बार भी अगर देशभर की महिलाएं एक दिन के लिये भी इरोमशर्मिलाके समर्थन मे हड़ताल पर बैठ जाएँ तो सरकार को झुकाना पड़ेगा. लेकिन वह दिन आएगा कब? अभी तो बाज़ार का आकर्षण बहुत है. टीवी के दो-दो सौ चैनल है. सिनेमा है. फैशन है. किटी पार्टियाँ है. सुन्दर-सुन्दर पोशाके है. बदन से उतरते कपडे है.. अनेक पाखण्ड है. इन सबसे फुरसत मिले तब तो तथाकथित आधुनिक महिलाएं इरोम शर्मिला की ओर ध्यान दे. अभी तो बहुत-सी औरतों को इरोम शर्मिला के काम की जानकारी भी नहीं होगी. खैर, मन में आग है. कितना लिखूं...? लिखने से कुछ होता भी तो नहीं. फिर भी दिल मानता नहीं. आज फिर इरोम पर कुछ शेर कहें हैं. अपने बेहद आत्मीय होते जा रहे ख़ास पाठक-मित्रों के लिये प्रस्तुत है नई ग़ज़ल.. एक महान सत्याग्रह के दस साल होने पर- 
 

इक दीप-सी जलती रही इरोम शर्मिला
सबके लिये चलती रही इरोम शर्मिला

इक दिन यहाँ इन्साफ मिलेगा इसीलिये
हर दर्द को सहती रही इरोम शर्मिला

इस देश में बहाल नहीं लोकतंत्र क्यूं
सब से यहाँ कहती रही इरोम शर्मिला

जोखिम में जान डाल कर भूखी रही है वो
मिटती रही, बनती रही इरोम शर्मिला

रोके से रुक सकी नहीं कमाल कर दिया 
बन के नदी बहती रही इरोम शर्मिला

खुशियों के मकानात बनें इसलिए सुनो
हर पल यहाँ ढहती रही इरोम शर्मिला

निर्मम हमारे देश की सरकार क्या कहें
किस मुल्क में रहती रही इरोम शर्मिला

औरत पे जुल्म ढा रहे गुंडे हैं ड्रेस में
इस बात पे हंसती रही इरोम शर्मिला

खा-पी के अघाए हुए इस देश में पंकज
कुर्सी को ही खलती रही इरोम शर्मिला

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ग़ज़ल/ जब तिमिर बढ़ने लगे तो दीप को जलना पड़ेगा.......

>> Monday, November 1, 2010

बहुत दिनों के बाद आया हूँ . इस बीच बहुत-से अच्छे ब्लागर-मित्रों तक भी नहीं जा पाया. इसका मलाल है. उन सबको पढ़ाने का भी समय निकालूँगा. इधर अपने ब्लॉग पर  खुद कोई नई रचना भी पोस्ट नहीं कर पाया. आज समय मिला, सो दीपावली पर एक ग़ज़ल दे रहा हूँ. उम्मीद तो करता हूँ कि मेरे आत्मीय पाठकों को पसंद आनी चाहिए.आप जैसे मित्रों को ध्यान में रख कर यह रचना लिखी है.  हर कोई टिप्पणी करे, यह ज़रूरी नहीं, लोग पढ़े ज़रूर, यही ख्वाहिश है. मेरे विचार उनकी स्मृति में बने रहे, यह ज़रूरी है. 5 नवम्बर को दीपावली है. ज्यादा दूर नहीं है. तैयारी अभी से चल रही है. सबकी. खरीदी, घर की साफ़-सफाई.. नए कपडे, आदि-आदि. लेकिन कवि त्योहारों को भी चिंतन के साथ जोड़ कर देखता है. 

जब तिमिर बढ़ने लगे तो दीप को जलना पड़ेगा
दैत्य हुंकारें अगर तो देव को हँसना पड़ेगा 
 
दीप है मिट्टी का लेकिन हौसला इस्पात-सा
हमको भी इसके अनोखे रूप में ढलना पड़ेगा

लक्ष्य पाने के लिये आराधना के साथ ही
लक्ष्य के संधान हेतु पैर को चलना पड़ेगा 
 
रौशनी के गीत गायें हम सभी मिल कर यहाँ
प्यार की गंगा बहाने प्यार से बहना पड़ेगा
 
सूर्य-चन्दा हैं सभी के रौशनी सबके लिये
इनकी मुक्ति के लिये आकाश को उठना पड़ेगा

जिन घरों में कैद लक्ष्मी और बंधक रौशनी
उन घरों से वंचितों के वास्ते लड़ना पड़ेगा 
 
कब तलक पंकज रहेंगे इस अँधेरे में कहो
तोड़कर चुप्पी हमें अब कुछ न कुछ करना पड़ेगा

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नई ग़ज़ल/ निकलेंगे फिर जुल्म मिटाने

>> Sunday, September 12, 2010

जो प्रतिबद्ध हो कर लिखते है, उनके लिये रचना परिवर्तन का माध्यम होती है.कोशिश करता हूँ कि कुछ ऐसा लिखूं,कि लोग उसे कुछ समय तक तो याद रख सकें. लेकिन ऐसा सौभाग्य कम लोगों को ही मिल पाता है. फिर भी मेरा काम है लिखना. लिखते रहना. कभी कविता, कभी ग़ज़ल, कभी व्यंग्य. विधा कोई भी हो, लक्ष्य है वैचारिक परिवर्तन. बहरहाल, फिर कुछ दिन विराम के बाद हाजिर हूँ एक नई ग़ज़ल के साथ. पता नहीं ये आपको कितनी पसंद आती है.

फूल सरीखे अच्छे लोग
बन कर खुशबू बहते लोग

निकलेंगे फिर जुल्म मिटाने
ले सूरज के झंडे लोग

प्यार बाँटने वाले क्या हैं
हर युग में जो चमके लोग

वो सुगंध जो ख़त्म न होती
ऐसे भी कुछ रहते लोग

नेकी रहती सब पे भरी
बात पते की कहते लोग

धारा के विपरीत हमेशा
बहते हैं कुछ बहके लोग 

मर कर मर जाते हैं झूठे
जिंदा रहते सच्चे लोग

चुप रहते हैं अकसर देखा 
अपनों से दुःख सहके लोग

इक दिन मिल जायेगी मंजिल
सोच यही बस चलते लोग

मत घबराना संघर्षों से
बनते हैं कुछ तप के लोग

कायरपन की बात न पूछो 
वार करे हैं छिप के लोग

निर्मल मन वालों तक पंकज 
आ जाते है चल के लोग

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ग़ज़ल/ जख्म दिया करते हैं फिर थोड़ा मुसकाते हैं

>> Wednesday, September 8, 2010

पाँच दिन बाद फिर हाज़िर हूँ. यानी फिर वही दिल लाया हूँ. पेश है बिल्कुल नई ग़ज़ल.देखे शायद इन शेरों में सच्चे लोगों का दर्द उभरा हो शायद. भले लोगों को दुर्जन हमेशा तकलीफ ही देते है. लेकिन अनुभव यही बताता है कि दुर्जन नष्ट हो जाते हैऔर सज्जन महकते रहते है. अपने सद्गुणों के कारण बने रहते हैं. देखे कुछ शेर---

पहले जख्म दिया करते हैं फिर थोड़ा मुसकाते हैं
ऐसे ही कुछ लोग यहाँ केवल शैतान कहाते हैं. 

अपने दुर्गुण देख न पाए कोस रहे हैं दुनिया को
ऐसे ही नकारे इक दिन मिट्टी में मिल जाते हैं. 

तन से वह तो सुन्दर है पर मन से कितना काला है
तन-मन जिनका सुन्दर-निर्मल वे इंसां कहलाते हैं.

जो केवल निंदा करता है वह इक दिन मर जाता है
छुद्र नहीं, केवल सर्जक इक दिन इतिहास बनाते हैं.

पहले हम काबिल बन जाएँ फिर सबको पथ दिखलाएँ 
कैसी है वो बस्ती जिसमें अंधे राह दिखाते हैं

मैंने सच्ची बात कही है शायद कुछ कड़वी होगी
सेहत भली रहे इस खातिर कड़वी दवा पिलाते हैं

शब्दों के हम आराधक हैं अपनी राह बनाते हैं
खून सुखाया जाग-जाग कर फिर परसाद चढ़ाते हैं. 

निंदा ही जिनका जीवन है उनको माफ़ करो पंकज 
जो हैं दिल से बड़े वही दुनिया को प्यार लुटाते हैं.

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एक ग़ज़ल गाय पर / जब मरती गाय...

>> Friday, September 3, 2010

लेखन मेरे लिये अभियान है. छवि चमकने की मैंने कभी नहीं सोची. मुझे यही लगता है, कि कुछ ऐसा लिखूं कि लोकमंगल हो. मेरे लेखन से  किसी की सोच बदले. किसी का मन आनंदित हो. बहरहाल,क्या होता है, इसका पता नहीं. पर लिखना मेरा कर्त्तव्य है. यही मं कर लिखता जाता हूँ. कल जन्माष्टमी थी. खूब धूम से मनी यहाँ, कुछ लोगो ने गाय की पूजा की. उत्सव मनाया. लेकिन सैकड़ों गायें सड़कों पर लावारिस घूमती रही. कुछ हिन्दू ईमानदारी से काम नहीं करना चाहते. उनको पाखण्ड में ही बड़ा मज़ा आता है. यही कारण है कि जिस गाय की वे पूजा करते है, उसी गाय को भूखा भी रखते है. बहरहाल,गाय  पर एक ग़ज़ल पेश है. बहुत पहले दो पंक्तियाँ कहीं पढ़ी थी. जिए कौन जब मरती गाय/ मरे कौन जब जीती गाय. लगा इस  दो पंक्ति को आगे बढ़ाया जा सकता है, सो पेश है,

''मरे कौन जब जीती गाय
जिए कौन जब मरती गाय''

जीते-जी कितना कुछ देती
काम अनोखे करती गाय

बस केवल पापी हाथों से
रह-रह कर है बचती गाय

अंग-अंग जिसका फलदायी 
देवी बनी उतरती गाय 

उसको मालामाल करे है
जिसके घर में रहती गाय

दूध पियो और काटो उसको 
इसी भाव से डरती गाय

हमें संवारा हर पल उसने
खुद न कभी सवरती गाय 

कहाँ गया है उसका चारा
दर-दर आज विचरती गाय

पाल-पोस कर इसको देखो 
कष्ट सभी के हरती गाय

मेरी-तेरी सबकी माता 
लगती जैसे धरती गाय 

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नई ग़ज़ल/ अगर रोता है बच्चा छातियों में दूध आता है

>> Wednesday, August 18, 2010

माँ पर बहुत-सी कविताएँ लिखी गई है.सदियों से लिखी जाती रही है. शायद भविष्य में भी लिखी जायेंगी. माँ है ही ऐसी शख्सियत.. अपने ब्लॉग पर मैं इसके पहले भी माँ पर, धरती माँ पर और गौ माता पर कविताएँ लिखी है. मुझे लगता है, एक लेखक को कुछ इस तरह के काम भी करते रहने चाहिए. इस तथाकथित नए ज़माने में ''माँ-वां'' पर लिखना पिछडापन भी कहलाता है. फिर भी मै ''पिछड़ा'' हुआ बना रहना चाहता हूँ. और समय-समय पर हर माँ पर (यानी धरती, गंगा, गौ) लिखना चाहता हूँ. आज मै उस माँ पर फिर एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, जो मानव की जननी है. देखें, शायद कुछ शेर आपको पसंद आ जाएँ. 

इसे अम्मी कहो, मम्मी कहो माता तो माता है
ये है देवी कि जिसके सामने सिर झुक ही जाता है

बड़ी ''माडर्न'' हो जाए मगर माँ कब बदल पाई
अगर रोता है बच्चा छातियों में दूध आता है

वो रहती है हमारे साथ हरदम इक दुआ बन कर
लगे जब चोट कोई लब पे माँ का नाम आता है 

बड़ी तकदीर वाले हैं वो जिसके साथ माँ रहती
असल में माँ का बरकत से बड़ा दिलचस्प नाता है

कभी गैया, कभी गंगा, कभी धरती हमारी माँ
मगर सबसे बड़ी है वो जो अपनी जन्मदाता है

जो माँ का दूध पीकर के भी माँ की गलियाँ देता
न जाने किस जनम में किस तरह वो मुक्ति पाता है

अगर माँ को पुकारोगे बलाएँ टल ही जाएंगीं
ये है नुस्खा पुराना क्यों न तू भी आजमाता है

बड़ी तकदीर खोटी है कि जिसकी माँ नहीं पंकज 
बेचारा ठोकरें ही ठोकरें हर बार खाता है....

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नई ग़ज़ल/ है बड़ा भूखा सभी को एक दिन यह खाएगा...

>> Monday, August 16, 2010


जीवन के उतार-चढ़ाव को लेकर कई बार कुछ लोगों को निराशा होती है, लेकिन जो सच है, उसका सामनाकरना ही चाहिए. सफलता-असफलता आगे-पीछे होती रहती है. कभी कोई जीवन के केंद्र मे रहता है तो कभी हाशिये पर भी चला जाता है. हमेशा कोई शीर्ष पर नहीं रहता. एक दिन उसे किनारे भी लगना पड़ता है.जीवन के इसी रंग पर आज ही कहे (लिखे) गए कुछ शेर समर्पित हैं आज- देखे,

आज है जो दृश्य में नेपथ्य मे कल जाएगा
डूबता है सूर्य लेकिन वह दुबारा आएगा

हर घड़ी रहती नहीं सत्ता उजाले की यहाँ 
वह सुखी होगा जो अपने आप को समझाएगा

वक़्त है निर्मम बहुत यह मानता बिल्कुल नहीं
है बड़ा भूखा सभी को एक दिन यह खाएगा

जितना वैभव पा गया तू अब संजो कर रख ज़रा
और के चक्कर में बाकी क्या पता मिट जाएगा 

तूने जो बेहतर रचा है व्यर्थ नहीं हो पाएगा
है सृजन दमदार तो हर युग उसे दुहराएगा

ज़िंदगी का गीत गर सुन्दर बना तो देखना 
बाद में तेरे इसे पंकज कोई तो गाएगा.

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ग़ज़ल/ सारे तथाकथित....

>> Tuesday, August 10, 2010

यह ग़ज़ल उन मित्रों के लिये हैं जो बहुत अच्छे इनसान है मगर तथाकथित लोगों से हैरान-परेशान है. आज हम यही देख रहे है हर कहीं तथाकथित लोग ही नायक बने हुए है. फिर भी....मैं मानता हूँ कि एक दिन सच जीतता है. प्रतिभा का सम्मान मिलता है. तो....प्रस्तुत है.. आपके जैसे अच्छे लोगों के मन पीड़ा को स्वर देने वाले कुछ शेर.....

यहाँ-वहाँ अब छाये दिखते सारे तथाकथित
भरे हुए हैं सत्ता के गलियारे तथाकथित  

जाने कितने सपनों की हत्याएं कर डालीं
घूम रहे हैं मस्ती में हत्यारे तथाकथित  

नकली सिक्के यहाँ चल रहे ये कैसा बाज़ार 
असली हो गए है अब तो बेचारे तथाकथित

हमने तुमको प्यार किया पर तुम तो बदल गए
क्या मालूम था निकलोगे तुम प्यारे तथाकथित

मुझ तक आने से पहले उजियारे लुप्त हुए 
भेजे थे चन्दा ने हमको तारे तथाकथित

बहुत दिनों तक खून के आँसू रोई सच्चाई 
आखिर इक दिन वही हुआ कि हारे तथाकथित   

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नई ग़ज़ल/फ्लैटों, मालों का 'इंडिया' लेकिन अपना देश कहाँ?

>> Thursday, July 29, 2010

मैं स्वतन्त्र लेखक-पत्रकार हूँ. संघर्ष मेरे जीवन का पाथेय-सा बन गया है, क्या करुँ. किसी तरह अपना छोटा-सा दफ्तर बनाया है. जिसका मालिक, चपरासी, मैसेंजर सबकुछ मै हूँ. मैंने अपने कार्यालय में प्रख्यात चिन्तक 'सर एडवर्ड कोक' का एक कथन चस्पा करके रखा है, कि ''अपना स्वयं का कच्चा मकान भी व्यक्ति के स्वाभिमान की रक्षा एक किले की तरह करता है.'' दस साल से इस कथन को देख रहा हूँ, मगर आज कुछ ऐसी प्रेरणा जगी, कि कुछ शेर बन गए. आज अपने देश मे कितने ही लोग हैं, जो खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने पर मजबूर है. हर बड़े शहर में ये मंज़र देखे जा सकते है. पता नहीं इन लोगों का भविष्य क्या है. मगर बहुत से खुशकिस्मत ऐसे भी है, जो क़र्ज़ लेकर किसी तरह घर बना ही लेते है. कुछ अभागे जीवन भर किराये के घर मे ही रहने के लिये अभिशप्त रहते है. ऐसे ही अनेक लोगों की भावनाओं को स्वर देने वाले विभिन्न शेरो से बनी ये ग़ज़ल आपकी सेवा में हाज़िर है...

कैसा भी है कच्चा-पक्का जिसका एक मकान है
स्वाभिमान का रक्षक है ये, बिल्कुल किले समान है

होंगे सबके महल-दुमहले अपना ये छोटा-सा घर
तुम खुश हो तो अपने चेहरे पर भी इक मुसकान है

जितना अपने हिस्से आया प्रभु की प्रेम-प्रसादी है
लालच का तो अंत नहीं है, लालच इक शैतान है

वे हैं सचमुच किस्मतवाले जिनको छत मिल जाती है
जिनका घर फुटपाथ बना, उनका मालिक भगवान् है

मेहनत करके दौलत पाई फिर थोड़ा संतोष किया 
उसके जीवन में सुख रहता, अधरों पर मुस्कान है.

फ्लैटों, मालों का 'इंडिया' लेकिन अपना देश कहाँ?
बदहाली में जीने वाला भी इक हिन्दुस्तान है.

दौलत पा कर जो झुक जाये वह नायक बन जाता है
लेकिन वो खलनायक जिसमे रत्ती भर अभिमान है

कोई तरस रहा है घर को, और उधर यह आलम है 
किसी के हिस्से गाँव-शहर या पूरा इक बागान है. 

कोई तरस रहा रोटी को कोई फेंक रहा जूठन
भूखे को भी समझो भाई, वह भी इक इनसान है.

जमा किया गर हद से ज्यादा पंकज इक दिन जायेगा
कभी बीमारी कभी डकैती सब दिन कहाँ समान है

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ग़ज़ल / हँसना भूल गया बेचारा ...

>> Tuesday, July 13, 2010

बिना किसी भूमिका के फिर एक बिल्कुल नई ग़ज़ल. मैं जो कहना चाहता हूँ, शेर तो कह रहे है. शुभकामनाएं चाहिए, दुवाओं में याद करते रहें, बस....


पद क्या पाया मद है भाई
वैसे बौना कद है भाई 

हँसना भूल गया बेचारा 
इस कुरसी की हद है भाई

पैसे खातिर अपने छूटे 
फिर भी वो गदगद है भाई

सीखो ऊँचाई-शीतलता
उधर एक बरगद है भाई

परिचय है पर काम न होगा
नोटों की आमद है भाई

मारपीट औ गुण्डागर्दी 
अपनी ये संसद है भाई

अगर प्यार से मिलने आओ
फुरसत ही फुरसत है भाई

बाँटोगे गर खुशियाँ सबको
बरकत ही बरकत है भाई

कभी नहीं मै रुक पाता हूँ
सच कहना आदत है भाई

हिंसक हाथों में है पूजा 
उन सबको लानत है भाई

सच को पीट रहे हैं डंडे
उफ़ कैसी आफत है भाई

समझ सको तो कविता पंकज 
जीवन का इक पद है भाई

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ग़ज़ल/ लहू से तर रहे बस्तर हमें अच्छा नहीं लगता

>> Wednesday, June 30, 2010

बस्तर फिर लहूलुहान हो गया; लगता है हम छत्तीसगढ़ के लोग केवल लाशें गिनाते जायेंगे. आज हम गिन रहे हैं, पता नहीं कल हमें भी कोई गिनने बैठ जाए.सरकार असफल होती जा रही है और उधर नक्सलियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं. हर हत्याओं के बाद 'वे' अपनी सफलता पर जश्न मनातेहोंगे और अपनी किसी योजना या विचारधारा की राह पर ''लोगो को कुर्बान'' करने के बाद किसी भी अपराधबोध से मुक्त हो कर किसी ''नयी     योजनाओं'' में भिड जायेंगे. खैर, कितने आंकड़े गिनाऊँ, कुछ शेर देखिये.

  ग़ज़ल

लहू से तर रहे बस्तर..हमें अच्छा नहीं लगता 
ये छत्तीसगढ़ हैं आँसूघर..हमें अच्छा नहीं लगता 

ये नफ़रत एक दिन हमको अमानुष ही बना देगी
ये हिंसा का भयानक स्वर..हमें अच्छा नहीं लगता

तुम्हारी माँग है जो कुछ उसे तुम सामने रक्खो
ये कत्लेआम का मंज़र..हमें अच्छा नहीं लगता

अगर हम सभ्य हैं सचमुच तो उसका कुछ पता तो दो
न हो हम जंगली-बर्बर..हमें अच्छा नहीं लगता 

चलो मिलजुल के हम-तुम प्यार की दुनिया बसायेंगे
किसी भी हाथ में खंजर..हमें अच्छा नहीं लगता

इधर से गोलियाँ चलतीं उधर बारूद उठता है
ये खूनी सिलसिला बदतर..हमें अच्छा नहीं लगता

उठें अब लोग सारे सिरफिरों को जा के समझाएँ
उजड़ता देश यह सुन्दर..हमें अच्छा नहीं लगता

ये जलता देश इसको कौन है जो अब बचाएगा 
यहाँ तो सो रहे रहबर..हमें अच्छा नहीं लगता

अगर है प्यार की बोली तो गोली क्यों चले 'पंकज'
बहे आँसू यहाँ झरझर.. हमें अच्छा नहीं लगता

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तरही ग़ज़ल/ वो कहीं पर भी कामयाब नहीं...

>> Tuesday, June 22, 2010

बहुत पहले रायपुर में मेरे शायर मित्रों ने एक मिसरा दिया था-''वो कहीं पर भी कामयाब नहीं'' तरही मिसरा के बारे में सुधी पाठक जानते ही है, कि एक लाइन दे दी जाती है, फिर उसको शामिल करके कुछ शेर कहने पड़ते है. उर्दू साहित्य की इस रोचक-परम्परा के कारण अनेक ग़ज़लें तैयार हो जाती है. मैं भी कुछ कोशिशें करता रहता हूँ.''वो कहीं पर भी कामयाब नहीं'' को आगे बढ़ाने की कोशिश में कुछ शेर बन गए. एक सुखद संयोग देखिये, कि ''वो कहीं पर भी कामयाब नहीं'' की अगली पंक्ति मैंने लिखी ''जिसकी आँखों में कोई ख़्वाब नहीं'' मज़े की बात, जब नशिस्त(गोष्ठी) हुई, तो एक वरिष्ठ शायर राजा हैदरी भी बिल्कुल यही पंक्ति लिख कर लाए थे. सारे लोगों को अच्छा लगा कि दो लोगो, ने एक जैसा सोचा और एक जैसे शब्द भी लिखे. शेरोशायरी में रूचि रखने वाले मित्र भी शेर कहें. क्योंकि इसमे अभी भरपूर गुंजाइश है. रदीफ़ के लिए बहुत-से शब्द अभी बाकी हैं. बहरहाल, कई साल पहले कही गयी ग़ज़ल आज अचानक मिल गयी, सो उसे प्रस्तुत करने का मोह संवरण नहीं कर पाया. देखे....

ग़ज़ल

वो कहीं पर भी कामयाब नहीं
जिसकी आँखों में कोई ख्वाब नहीं 

ये जो शब है करूंगा पार इसे
हाथ दीपक है माहताब नहीं

हर सवालों का है ज़वाब यहाँ 
पर तेरे हुस्न का ज़वाब नहीं

रूखी-सूखी भी खा के मस्ती है
यार माना के हम नवाब नहीं

सबके हिस्से में बस रहें खुशियाँ 
आया अब तक वो इन्कलाब नहीं

वो भी इनसान है भला कैसा 
जिसके जीवन में गर सवाब नहीं

है मुकद्दर भरा ये खारों से 
मेरे हिस्से में इक गुलाब नहीं

ज़िंदगी है खुली किताब मेरी
आओ पढ़ लो कोई नकाब नहीं

फूल को अब निहारे क्यों दुनिया 
उसमें पंकज अगर शबाब नहीं

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एक जून ...दो ग़ज़ले...

>> Monday, May 31, 2010

एक जून... सुधी पाठक अनुमान लगा सकें तो लगा लें, मगर मैं बताऊंगा नही, कि आज के दिन क्या हुआ था. बस इतना ही कहूंगा कि, ज़िंदगी की राह पर अच्छा-खासा अकेला चला जा रहा था, कि कोई और साथ आ गया और बोला, ''अकेले-अकेले कहाँ जा रहे हो/ हमें साथ ले लो, जहाँ जा रहे हो'' लेकिन हम रुके नहीं, तो वह फिर मीठी आवाज में बोल पडा-'' बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभालना'' हम फिर भी नहीं रुके मगर उसने हार नहीं मानी और कहा-''जाइये आप कहाँ जायेंगे, ये नज़र लौट के फिर आयेगी. और...आखिर नज़र को लौटना ही पडा. हमने भी कहा- ''तुमने पुकारा और हम चले आये.'' नज़रे चार हुईं और 'अकेला' राही 'दुकेला' हो गया. वो खूबसूरत तारीख थी एक जून...उसी दिन को याद करते हुए कुछ रोमांटिक शेर पेश कर रहा हूँ अपनी फितरत के बिल्कुल विपरीत. क्या करे आज का दिन ही कुछ ऐसा है.वैसे आज बहुत शादियाँ है और आपको कहीं न कही किसी समारोह में जाना ही होगा. इसलिए अब वक्तव्य समाप्त......ज़्यादा मत सोचिये और समय निकल कर ये छोटी-छोटी ग़ज़ले पढ़ लीजिये.
(१)

तुम आते हो पास बहुत अच्छा लगता है
मिट जाते संत्रास बहुत अच्छा लगता है

जीवन के पतझर से जूझा.. बस तेरी
आँखों का मधुमास बहुत अच्छा लगता है

तुम ऐसी हो नदी कि जिसको पी कर के 
बढ़ जाती है प्यास बहुत अच्छा लगता है

तुमने संघर्षों में मेरा साथ दिया है
जीवन आया रास बहुत अच्छा लगता है

मेरी राह तका करते हो तुम अक्सर
मुझको यह अहसास बहुत अच्छा लगता है

साथ हमारा रहे सलामत बस पंकज 
हो चाहे बनवास बहुत अच्छा लगता है. 

(२)

जाने क्या है बात तुम्हारी आँखों में 
कट जाती है रात तुम्हारी आँखों में 

तुमको चाहा और भला क्या चाहूँगा
अनगिन है सौगात तुम्हारी आँखों में

दुनिया से हरदम खाया धोखा मैंने 
बस सच्चे ज़ज्बात तुम्हारी आँखों में.

तपते मौसम में भी शीतलता पाई 
इक रिमझिम बरसात तुम्हारी आँखों में
 
अन्धकार चहुओर नज़र आये लेकिन 
है ''मंजुल'' इक प्रात तुम्हारी आंखों में

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सुन्दर-प्यारे बस्तर में ये हिंसा भरे नज़ारे कब तक ..?

>> Monday, May 17, 2010

बस्तर में आज फिर नक्सलियों ने खूनी इतिहास लिखा. ३० से ज्यादा लोग एक धमाके में ही कल-कवलित हो गए. समझ में नहीं आता कि क्रांति की किस किताब में यह लिखा गया है, कि लोगों की जानें लो, तभी इन्कलाब आयेगा. यह बड़ा भ्रम है. जैसे कुछ लोग देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि देते है. मै समझ नहीं पाता कि ये कैसी देवी है जो किसी जीव की बलि से खुश हो सकती है. कभी नहीं. बस्तर में भी क्रांति-देवी को बलि चढ़ाने का काम कर रहे है नक्सली, लेकिन वे मुगालते में है. अपने ही भाइयों की हत्याएं करके वे केवल अपने खिलाफ नफ़रत ही पालने का काम कर रहे हैं.यह ध्यान रहे, कि हिंसा अंततः हिंसक को ही खाती है.नक्सली समझ लें और आत्म-मंथन करें. प्रेम से रहें, मुख्यधारा में आने की कोशिश करे. लोगों की बददुआएं न लें. मन की कुछ बाते कविता की शक्ल में भी प्रस्तुत है.
   
हत्या, चीख-पुकारें कब तक ?
ख़ू से सनीं बहारें कब तक ?

अरे अमन के नारे कब तक
जीएंगे हत्यारे कब तक? 

सुन्दर-प्यारे बस्तर में ये
हिंसा भरे नज़ारे कब तक
 
ये हैं माओवाद कहाँ का 
ये खूनी फौवारे कब तक?

इन्क्लाब ले कर आओगे 
लाशों के ही सहारे कब तक?

खूनी नक्सलवाद भयावह
बोलो सत्ता हारे कब तक

रोती है मानवता देखो
हँसेगे पापी सारे कब तक?

हिंसक भरे इशारे कब तक?
रहेंगे हम बेचारे कब तक?

बंदी ये उजियारे कब तक?
फिरेंगे मारे-मारे कब तक?

कोई एक दीप तो बारो 
रहे यहाँ अंधियारे कब तक?

शर्म करो ओ हिंसकवादी
सुनोगे उफ़ चित्कारें कब तक?

रो-रो कर अब बुरा हाल है
बिगड़ी कोई सँवारे कब तक?

हाय विधाता क्या नसीब है
रहे टूटते तारे कब तक ?

चलो करे कूच बस्तर को 
बचेंगे ये हत्यारे कब तक?

क्रांति नहीं है केवल ह्त्या
लगेंगे झूठे नारे कब तक?

''बुद्धिजीवी'' ह्त्यारों की ही 
और करें जय-कारे कब तक

शर्म, शर्म, अब शर्म करो तुम
ख़ून सने चौबारे कब तक ? 

मांएं रोती, बहन रो रही,
रोएंगे घर-द्वारे कब तक?

आखिर ये हत्यारे कब तक?
फिरेंगे मारे-मारे कब तक?
हत्या, चीख-पुकारें कब तक 
ख़ू से भरी बहारें कब तक ?

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माँ दिवस नहीं, ''माँ-शताब्दी'' मनाएं ..

>> Sunday, May 9, 2010


आज हमारी चार माताएं सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं. जन्म देनेवाली माता के साथ ही भारत माता, गंगा माता और गौ माता. सबकी दशा ख़राब है. इन सबके लिए अब एक दिन नहीं,पूरी ''माँ-शताब्दी'' मनाने की ज़रुरत है.लेकिन ऐसा होगा नहीं, क्योकि बहुत से तथाकथित आधुनिक कहेंगे इन सब के लिए हमारे पास टाइम ही नहीं है.11 सितम्बर 2009 को मैंने माँ पर एक ग़ज़ल दी थी. ''दया की एक मूरत और सच्चा प्यार है अम्मा/ है इसकी गोद में ज़न्नत लगे अवतार है अम्मा/ मुझे काँटा चुभा तो दर्द से वो रो पड़ी अकसर/ मेरे हर दर्द का पहला सही उपचार है अम्मा'' पता नहीं उस दिन क्या था. माँ को केवल एक दिन याद नहीं किया जा सकता. माँ के लिए एक दिन होना भी नहीं चाहिए लेकिन अब पश्चिम की संस्कृति दिमाग पर चढ़ती जा रही है. किसी को एक दिन याद करो और साल भर अपने में ही मस्त रहो. बहरहाल, आज माँ दिवस है. बहुत से ब्लोगों में अपने-अपने ढंग से माँ को याद किया गया है. यह सब पढ़कर मैं भी मन को रोक न पाया. फिर कुछ शेर बन गए. माँ की स्मृति में प्रस्तुत है कुछ शेर दुनिया की हर अच्छी माँ के लिए. अपनी पुरानी ग़ज़ल को आगे बढ़ाते हुए आज कुछ नए शेर बने है,
पुराना शेर हैं-
दया की एक मूरत और सच्चा प्यार है अम्मा
है इसकी गोद में ज़न्नत लगे अवतार है अम्मा 
कुछ आज बने शेर इस प्रकार हैं..
वो रहती है भले अनपढ़ मगर बेटा कलेक्टर है
कोई तो फन है उसके पास इक फनकार है अम्मा
दया, करुणा से लेकर त्याग या बलिदान जो भी है
इन्हें हम भूल जाएँ इन सभी का सार है अम्मा
दिया तुमने मुझे इतना कि तुमको और क्या दूं मै
मेरा जीवन है क्या यह तो तेरा उपकार है अम्मा
गढ़ा मुझको सुखाया खून तब तो मै बना हूँ कुछ
तेरी रहमत के आगे सब लगे बेकार है अम्मा

और एक बिल्कुल नयी ग़ज़ल जो आज ही कही है आप जैसे सुधी श्रोताओं के लिए.....

मंदिर में भगवान् बिराजे लेकिन घर में माँ का वास
इसीलिए मंदिर क्यों जाऊं देवी जब है अपने पास

लाख मुसीबत आन पड़े पर उसको फर्क नहीं पड़ता
पता नहीं किस मिटटी का है मेरी अम्मा का विश्वास

जब तक ज़िंदा थी तो उसकी कद्र नहीं कर पाया मै 
चली गयी तो रोता बैठा लौट के माँ आ जाती काश..

सबका दुःख हो जाये उसका, सुखी रहे सारा संसार 
इसीलिए जब देखो करती रहती है अक्सर उपवास

माँ, धरती, गंगा, गौ माता इन्हें बचना है अब तो
नयी सभ्यता की आंधी में ये न हो जाएँ इतिहास

उसके आँसू में बह जाता अक्सर मेरा सारा दुःख
माँ तेरे आँसू हैं अमृत कितनी इसमें भरी मिठास

दूध, खून, आँसू माँ तेरे जाने कितनी बार बहे 
तब जाकर इंसान बने हम कितनो को इसका अहसास

माँ को छू पाना तो पंकज इंसानों की बात नहीं
कद उसका है बेहद ऊंचा हम धरती है वो आकाश

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जब्बार ढाकवाला को याद करते हुए एक ग़ज़ल ..

>> Saturday, May 8, 2010

मेरे बेहद आत्मीय मित्र-लेखक जब्बार ढाकवाला और उनकी पत्नी ''तरन्नुम'' का चंबा के पास एक हादसे में कल ७ मई को निधन हो गया. उस भयानक हादसे की कल्पना कीजिये, कि उनकी कार पांच सौ मीटर गहरी खाई में जा गिरी. पल भर में जीवन का खेल ख़त्म....ढाकवाला जी के पर्स से उनका पता-ठिकाना मिला. फोन नंबर मिले तो वहां की पुलिस ने भोपाल उनके कुछ मित्रों को सूचित किया.फिर मध्यप्रदेश के राजकीय विमान से उनके शव आज अपरान्ह ३-४ रायपुर लाए गए. रात ९ बजे मौदहापारा के कब्रिस्तान में दोनों सुपुर्देखाक हो गए. केवल ४-५ लेखक मैयत में शरीक हुए. बाकी उनके रिश्तेदार आदि ही थे. मैं भी वही से लौटा तो जब्बार भाई का चेहरा बार-बार सामने आता रहा तो लगा कुछ शेर आकार ले रहे है. बस, बैठ गया, तो कलम चलने लगी. कल मैंने अपने एक और ब्लॉग ''सद्भावना दर्पण'' में जब्बार जी पर एक लेख लिखा था. समय मिले तो एक बार देख ले.खैर. अब दो लोग इतिहास हो गए. आज जब्बारजी पर लिखे गए कुछ शेर दे रहा हूँ. 

कहा अलविदा और छोड़ संसार अचानक चला गया..
सबके दिल में रहता था वो यार..अचानक चला गया
'ढांक' गाँववाला अपना जब्बार..अचानक चला गया

जब तक ज़िंदा था उसने बस प्यार लुटाया दुनिया को
कैसे अब पाएंगे हम जो प्यार..अचानक चला गया

'कोई गीत उदास नहीं रहते थे उसके पास' कभी
साथ ''तरन्नुम'' को ले कर फनकार..अचानक चला गया

कितना कुछ अब भी रचना था लेकिन अल्ला की मर्जी
कहा अलविदा और छोड़ संसार..अचानक चला गया


पहली बार लगा है दिल को यार किसे हम कहते हैं 
तुम क्या रूठे लगता है संसार..अचानक चला गया

क्या छोटे क्या बड़े सभी को गले लगाया था तुमने 
सचमुच था वो बहुत बड़ा दिलदार..अचानक चला गया

धर्म और मज़हब से उठ कर इंसानों की बात लिखी 
मस्तकलंदर, वो फक्कड़ किरदार..अचानक चला गया
-------------------------
जब्बार ढाकवाला  की नयी कविताओं का एक संग्रह कुछ साल पहले आया था, ''कोई उदास गीत नहीं है उनके पास''. मैंने एक शेर में उसी शीर्षक का जिक्र है, ''कोई गीत उदास नहीं रहते थे उसके पास कभी''

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दो ग़ज़लें / काले धंधे में डूबा है.... जितना सुख हिस्से में आया..

>> Monday, May 3, 2010

मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है,यह देख कर कि, कुछ लोग मुझसे जुड़ते जा रहे है. ये ''गिव एंड टेक'' वाले नहीं हैं. ये सब दिल से जुड़ रहे हैं. ये भले लोग है. इनमे विवेक है. भले-बुरे की समझ है. यही चाहता रहा हूँ कि मुझे कम लोग ही मिलें मगर वे सज्जन हों, उनका मन निर्मल हो. जब मेरी रचना कोई दिल में उतारता है तो सृजन की सार्थकता लगती है. मै उनसे कुछ सीखता हूँ, कोई मुझसे कुछ सीख पाए, ऐसी प्रतिभा मेरे पास नहीं है, लेकिन मुझसे जुड़ने वालों से मै बहुत कुछ सीखता रहता हूँ. मेरे चाहने वालों को मै अपनी आत्मा में बसाता हूँ. ''अच्छे पाठकों पर'' कभी अपना लेख भी आप तक पहुचाऊंगा. फिलहाल दो ग़ज़ले पेश कर रहा हूँ. देखें...

(१)

काले धंधे में डूबा वो उजियारे की बात करे
हत्यारा ही भोला बनकर हत्यारे की बात करे

चेहरे से अब हत्यारे को समझ नहीं हम पाएंगे
वो तो ईश्वर-अल्ला उनके जयकारे की बात करे

धरती को तो देख न पाया घर से बाहर गया नहीं
बैठे-बैठे सूरज-चंदा और तारे की बात करे

कविता दिल से बनती है वे दिमाग से लिखते हैं
अब तो भरे पेटवाला ही भुखियारे की बात करे

भला आदमी है बेचारा हरदम ठोकर खाता है
कोई तो इस बस्ती में उस बेचारे की बात करे

सच कहने वाले तो अक्सर क़त्ल हुए हैं पहले भी
पंकज उनका ही विरसा है अंगारे की बात करे

(२)

जितना सुख हिस्से में आया.. काफी है
मन को तूने ये समझाया.. काफी है  

अपनों से ज्यादा उम्मीदें मत रखना 
जिसने जितना साथ निभाया.. काफी है

हम तो सोच रहे थे वो क्या आयेगा
बहुत दिनों के बाद वो आया.. काफी है

दौलत तेरे हाथ कभी ना आ पाई
लायक बेटा एक कमाया.. काफी है 

सुबह खुली है आँख शाम मुंद जायेगी
जिसने भी इस सच को पाया..काफी है 

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मई दिवस पर विशेष ग़ज़ल/ मेहनत और पसीना...

>> Friday, April 30, 2010

एक मई.... मजदूर दिवस. श्रम की आराधना का दिन. पूजा का दिन. मै रायपुर श्रमजीवी पत्रकार संघ का दो बार अध्यक्ष रहा .अविभाजित मध्यप्रदेश में प्रांतीय महासचिव भी रहा. मैंने श्रमजीवी पत्रकारों के लिए लगातार संघर्ष किया. खतरे उठा कर अनेक आन्दोलन किये. उस वक्त के बिल्कुल नए पत्रकार मेरे साथ नारे लगाते हुए चलते थे. ख़ुशी होती है यह देख कर कि वे सब आज वरिष्ठ पत्रकार बन चुके है. समय जाते क्या देर लगती है.? सच कहूं, तब लगता था, कि हम मेहनतकश पत्रकार समाज के लिए कुछ कर रहे है, तो उन्हें बेहतर सुविधाएँ मिलनी चाहिए. लेकिन उस दौर में मालिको के दलाल सक्रिय रहते थे, और आन्दोलन की धार को भोथरी करने की कोशिश करते थे. फिर भी जब तक मेरे साथ कुछ जुझारू साथी थे, ऐसा कुछ नहीं हो पाया. तब पत्रकार संघ मतलब श्रमजीवी पत्रकारों के लिए हर वक्त संघर्ष के लिए तैयार रहने वाला मोर्चा लगता था. संघर्ष में ही मेरी रूचि थी, इसलिए कभी प्रेस क्लब का पदाधिकारी बनाने में रूचि ही नहीं दिखाई. चाहता तो वहा भी जा सकता था, लेकिन नहीं गया, क्योंकि प्रेस क्लब की भूमिका दूसरी है. लेकिन पत्रकार संघ मतलब सीधे-सीधे ''जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ''. इसलिए वही रास्ता चुना. खैर, यह सब अब अतीत की मधुरिम यादें हैं. आज अचानक एक मई मजदूर दिवस पर पुराने दिन याद आ गए. आज भी श्रमजीवी पत्रकारों की हालत बहुत अच्छी नहीं है. कुछ अखबारों में उच्चस्तर पर अच्छे वेतनमान मिल रहे हैं लेकिन जो लोग सचमुच अखबार के असली नायक है, उन श्रमजीवियों को अभी भी सम्मानजनक वेतन नहीं मिल पाता. यह दुःख की बात है कि दूसरों के लियेआवाज़ उठाने वाला श्रमजीवी पत्रकार अपने शोषण पर ही मौन रह जाता है. विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ, कि मै ऐसा कभी कर नहीं पाया, इसलिए अनेक अखबारों में रहा और लड़ते -लड़ते एक दिन बाहर कर दिया गया, मेरे समकालीन अनेक घटनाओं के गवाह रहे हैं. मै आज भी वैसा दौर चाहता हूँ. वैसा ही पत्रकार संघ. अब मै संगठन से दूर हूँ. मेरी अपनी स्वतन्त्र पत्रकारिता की राह है. लेकिन रास्ता श्रमजीवियों वाला ही है. अब रोज़ गड्ढा खोदो और पानी निकालो. पहले सेठों की मजदूरी की, अब अपने लिए करते है. खैर..क्रांतिकारी कवि पाश के शब्दों में कहूं तो ''हम लड़ेंगे साथी'' क्योंकि लड़ना ही हमें मनुष्य बनाता है. मेरा एक शेर है ''देख कर के जुल्म जब भी चीखता है/ आदमी तब खूबसूरत दीखता है''.कभी यह पूरी ग़ज़ल भी पेश करूंगा. फिलहाल अभी तो अचानक मन भावुक हुआ तो कुछ शेर बन गए हैं इन्हें ही प्रस्तुत कर रहा हूँ, केवल ''ईमानदार'' श्रमजीवी पत्रकारों और दुनिया के तमाम मेहनतकश सच्चे मजदूरों के लिए-

पसीना-ग़ज़ल
 
मुफ्तखोर सेठों का हँसना उनका क्या
मेहनत और पसीना अपना उनका क्या

हमने गढ़ी इमारत लेकिन क्या बोलें 
फुटपाथों पर हमको रहना उनका क्या 

इक दिन मेहनतकश की दुनिया भी होगी 
रोज़ देखते हैं ये सपना उनका क्या 

दिन भर तोड़ा पत्थर लेकिन पाया क्या
टूटन, कुंठा, आँसू बहना उनका क्या

खाई दर खाई ये बढ़ती जाती है
हमको ही पड़ता है सहना उनका क्या 

दौलत उनके पास पडी है शोषण की 
अपने हिस्से केवल छलना उनका क्या

अन्धकार फैला है इसे मिटाना है
हम हैं दीपक हमें है जलना उनका क्या

जितनी मेहनत की है उतना मिल जाये
एक यही है नारा अपना उनका क्या

हर ख़राब सूरत भी पंकज बदलेगी 
इन्कलाब का है ये कहना उनका क्या

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सुनिए गिरीश पंकज को

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